केरल हाईकोर्ट ने निजी क्षेत्र में कार्यरत और निर्धारित सीमा से अधिक आय व संपत्ति रखने वाले अभिभावकों के बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की ‘नॉन-क्रीमी लेयर’ (NCL) श्रेणी में शामिल करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने दो 17 वर्षीय छात्रों की उन याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिनमें आगामी प्रवेश परीक्षाओं में आरक्षण का लाभ पाने के लिए नॉन-क्रीमी लेयर प्रमाण पत्र जारी करने की मांग की गई थी।
आवेदनों को खारिज करने के मुख्य आधार
29 जुलाई को दिए फैसले में जस्टिस बीचू कुरियन थॉमस ने स्पष्ट किया कि यदि निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन और आय को जोड़ा जाता है, तो याचिकाकर्ताओं के परिवार क्रीमी लेयर की सीमा से बाहर नहीं आते। कोर्ट के अनुसार, जब तक निजी क्षेत्र के पदों को सरकारी नौकरियों के समकक्ष अधिसूचित नहीं किया जाता, तब तक व्यक्ति की पात्रता तय करने का एकमात्र आधार आय और संपत्ति का परीक्षण ही होगा।
अदालत के समक्ष आए दो मामलों में पहला मामला केरल इंजीनियरिंग आर्किटेक्चरल मेडिकल (KEAM) 2026 प्रवेश परीक्षा का था। इसमें एझवा समुदाय से आने वाली छात्रा के पिता की कुल संपत्ति वेल्थ टेस्ट के लिए निर्धारित 30 लाख रुपये की सीमा से काफी अधिक पाई गई। वहीं दूसरा मामला NEET UG 2026 का था, जिसमें छात्र के पिता अनिवासी भारतीय (NRI) हैं और उनकी वार्षिक आय लगभग 33 लाख रुपये है।
वेतन और संपत्ति की गणना पर कोर्ट का रुख
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम रोहित नाथन’ मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया था कि नॉन-क्रीमी लेयर की पात्रता तय करते समय अभिभावकों के वेतन को कुल आय में नहीं जोड़ा जाना चाहिए। हालांकि, राज्य सरकार ने इस तर्क का विरोध करते हुए कहा कि ऐसा करने से संपन्न वर्ग आरक्षण का लाभ उठा लेगा, जिससे इस व्यवस्था का मूल उद्देश्य ही निष्प्रभावी हो जाएगा।
हाईकोर्ट ने सरकार के तर्क को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि 1 जनवरी 2015 के सरकारी आदेश के तहत समकक्ष पदों की अनुपस्थिति में आय और संपत्ति परीक्षण लागू करना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि समृद्ध वर्ग को आरक्षण का लाभ लेने की अनुमति देने से वास्तविक जरूरतमंदों के अधिकार दब जाते हैं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि रोहित नाथन मामले का निर्णय आय या संपत्ति परीक्षण के उपयोग को प्रतिबंधित नहीं करता।
सुप्रीम कोर्ट का पिछला संदर्भ
केरल हाईकोर्ट का यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के इसी साल मार्च में आए एक निर्णय के आलोक में महत्वपूर्ण है। जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने माना था कि केवल मौद्रिक आय को ही अन्य पिछड़ा वर्ग में क्रीमी लेयर तय करने का एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि एक ही सामाजिक वर्ग के समान स्थिति वाले सदस्यों के बीच कृत्रिम भेदभाव या असमान व्यवहार करना संवैधानिक रूप से अनुचित है।

