इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि मध्यस्थता से जुड़े मामलों में सरकारी विभाग प्रशासनिक देरी या फाइलों की आवाजाही का हवाला देकर अपील में हुई देरी को माफ करने की मांग नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि समय-सीमा से जुड़े कानूनों के मामले में सरकारी संस्थाएं और निजी याचिकाकर्ता पूरी तरह से एक समान स्तर पर हैं।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति अवधेश कुमार चौधरी की पीठ ने लखनऊ स्थित कमर्शियल कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें रेल मंत्रालय की 28 दिन की देरी माफ करने की याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने रेल मंत्रालय की विशेष अपील को निरस्त करते हुए कहा कि देरी को माफ करना एक अपवाद है, न कि कोई सामान्य नियम। यह फैसला 13 जुलाई को सुरक्षित रखा गया था, जिसे 29 जुलाई को सुनाया गया और गुरुवार को ऑनलाइन अपलोड किया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह कानूनी विवाद रेल मंत्रालय और मेसर्स गैलेंट इस्पात लिमिटेड के बीच रेलवे साइडिंग के लिए आवंटित जमीन के लीज रेंट की दरों को लेकर शुरू हुआ था। दिसंबर 2023 में एक एकल मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए रेल मंत्रालय को लीज रेंट में संशोधन करने और लगभग 1.79 करोड़ रुपये की राशि आठ प्रतिशत ब्याज के साथ लौटाने का निर्देश दिया था।
कमर्शियल कोर्ट और हाईकोर्ट में सुनवाई
मध्यस्थता फैसले को चुनौती देने के लिए रेल मंत्रालय ने आर्बिट्रेशन एंड कॉनसीलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 34 के तहत कमर्शियल कोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि, यह चुनौती तय समय-सीमा बीत जाने के बाद पेश की गई थी। कमर्शियल कोर्ट द्वारा 28 दिन की देरी को माफ करने से इनकार करने के बाद रेल मंत्रालय ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुनवाई के दौरान गैलेंट इस्पात लिमिटेड की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा ने तर्क दिया कि रेलवे देरी की कोई ठोस या वैध वजह बताने में नाकाम रहा है, इसलिए वह किसी भी तरह की राहत का हकदार नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट भी अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुका है कि देरी को माफ करना एक अपवाद है। अदालत ने जोर देकर कहा कि सरकारी विभागों को देरी के लिए वास्तविक, पर्याप्त और प्रामाणिक कारण पेश करने होंगे। केवल दफ्तरी प्रक्रियाओं या फाइलों की आवाजाही का बहाना बनाकर राज्य की संस्थाएं कानूनी समय-सीमा से छूट नहीं पा सकतीं।

