सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए आईआईटी खड़गपुर में पढ़ रहे आर्किटेक्चर के एक छात्र को मेडिकल आधार पर आईआईटी रुड़की ट्रांसफर करने की इजाजत दे दी। गंभीर मानसिक बीमारी से जूझ रहे छात्र की स्थिति को देखते हुए पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया।
जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने आईआईटी खड़गपुर को निर्देश दिया कि वह एक हफ्ते के भीतर छात्र को ट्रांसफर और माइग्रेशन सर्टिफिकेट सहित सभी आवश्यक दस्तावेज जारी करे, ताकि आईआईटी रुड़की में उसके दाखिले की प्रक्रिया पूरी हो सके।
विशिष्ट इलाज और अदालत के निर्देश
पीठ ने स्पष्ट किया कि यह फैसला याचिकाकर्ता की विशेष स्वास्थ्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुनाया गया है। छात्र बॉर्डरलाइन पर्सनालिटी डिसऑर्डर नाम की बीमारी से ग्रस्त है, जिसके इलाज के लिए माता-पिता की निरंतर देखरेख के साथ ‘रिपेटिटिव ट्रांसक्रैनियल मैग्नेटिक स्टिम्यूलेशन’ नामक गैर-आक्रामक थेरेपी की सख्त आवश्यकता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि न्याय के हित में छात्र का स्थानांतरण अनिवार्य था। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ कर दिया कि छात्र को आईआईटी रुड़की के नियमानुसार तय फीस ढांचे और अन्य सभी वित्तीय शर्तों का पालन करना होगा।
एम्स का मूल्यांकन और मामले की पृष्ठभूमि
इससे पहले की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को छात्र की मेडिकल स्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन करने का आदेश दिया था।
छात्र ने अपनी याचिका में कहा था कि आईआईटी खड़गपुर द्वारा ट्रांसफर रोकने की वजह से उसका जीवनरक्षक इलाज प्रभावित हो रहा था। याचिका में यह तर्क भी दिया गया था कि संस्थान ने इससे पहले भी गंभीर रूप से बीमार कुछ अन्य छात्रों को मेडिकल आधार पर इसी तरह के तबादले की अनुमति दी है।

