मद्रास हाईकोर्ट ने कुंभकोणम धर्मप्रांत के बिशप के खिलाफ दर्ज एफआईआर और जारी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के नागरिक दस्तावेजों और चर्च के रिकॉर्ड में दर्ज नाम में भिन्नता होने मात्र से उस पर धोखाधड़ी या फर्जी दस्तावेज बनाने का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
जस्टिस आर. विजयकुमार ने 29 जुलाई को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि धार्मिक नेता के खिलाफ आपराधिक अभियोजन जारी रखना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
धोखाधड़ी और फर्जीवाड़े का कोई कानूनी आधार नहीं
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि बिशप को वर्ष 2003 में जारी हुआ जन्म प्रमाण पत्र ही उनके बपतिस्मा (बैपटिज्म) रजिस्टर को संशोधित करने का कानूनी आधार बना। आधिकारिक जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर बपतिस्मा रजिस्टर में सुधार करने को कानूनन धोखाधड़ी या फर्जीवाड़ा नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि यह संशोधन बिशप पद पर नियुक्ति पाने के लिए किया गया था। अदालत के अनुसार, पोप द्वारा जारी नियुक्ति पत्र में पहले से ही वही नाम दर्ज था जो बिशप के जन्म प्रमाण पत्र में है। ऐसे में यह कहना तर्कहीन है कि बपतिस्मा प्रमाण पत्र में बदलाव पद हासिल करने की मंशा से किया गया।
बिशप की जन्म तिथि में 2 अप्रैल 1962 और 20 जनवरी 1963 के अंतर पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि जब तक मामला किसी सरकारी नौकरी या ऐसे कानूनी दायरे का न हो जहां उम्र का सीधा प्रभाव पड़ता हो, तब तक इस तरह की भिन्नता का कोई कानूनी महत्व नहीं रह जाता।
मामले की पृष्ठभूमि और शिकायतकर्ता के तर्क
आपराधिक मामला 4 मार्च को दर्ज की गई एफआईआर से शुरू हुआ था। यह शिकायत कैथोलिक चर्च के ही एक सदस्य ने दर्ज कराई थी, जो बिशप को पिछले 17 वर्षों से जानता था। बिशप के 13 जनवरी 2024 को हुए अभिषेक के बाद शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि बिशप के शैक्षणिक रिकॉर्ड और चर्च के रजिस्टरों में अलग-अलग नाम दर्ज हैं।
शिकायतकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता वीरा काथिरवन ने तर्क दिया कि बिशप पद पर नियुक्ति से पहले होने वाली अनिवार्य गोपनीय जांच में किसी भी प्रतिकूल रिपोर्ट से बचने के लिए चर्च के रिकॉर्ड में बदलाव किए गए और नया प्रमाण पत्र तैयार किया गया।
वैटिकन की स्थिति और बचाव पक्ष की दलील
बिशप का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ेवियर अरुलराज ने अदालत को बताया कि दो नामों का यह विवाद बचपन से जुड़ा है। बिशप के पिता ने उनका नाम एक कम्युनिस्ट नेता के नाम पर रखा था, लेकिन चर्च अधिकारियों ने गैर-पारंपरिक नाम होने के कारण आपत्ति जताई, जिसके चलते बपतिस्मा के समय उन्हें दूसरा नाम दिया गया।
बचाव पक्ष ने 27 अप्रैल 2026 का अपोस्टोलिक अधिकारियों का एक स्पष्टीकरण पत्र पेश किया, जिसमें पुष्टि की गई कि दोनों नाम एक ही व्यक्ति के हैं। पत्र में यह भी साफ किया गया कि पोप को बिशप के भारतीय पासपोर्ट और बपतिस्मा प्रमाण पत्र के अंतर की पूरी जानकारी थी और इसके बाद ही उनके अभिषेक को स्वीकृति दी गई थी।

