कर्नाटक हाईकोर्ट ने अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की सूचना पुलिस को देने वाले बेंगलुरु के एक डॉक्टर के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक जांच पर अंतरिम रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि अवैध प्रवासियों पर नियमानुसार कार्रवाई करने के बजाय उनकी शिकायत दर्ज कराने वाले जिम्मेदार नागरिकों के खिलाफ ही मामले दर्ज किए जा रहे हैं।
जस्टिस एम नागप्रसन्ना की पीठ ने बेंगलुरु निवासी डॉ. नागेंद्रप्पा के खिलाफ दर्ज एफआईआर और उनकी गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर रोक लगाते हुए यह आदेश जारी किया। हाईकोर्ट ने पाया कि नसरीना नाम की महिला की शिकायत पर स्थानीय पुलिस ने बिना किसी प्राथमिक जांच या डॉक्टरी परीक्षण के डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया, जबकि एफआईआर में किसी भी प्रकार की शारीरिक चोट का कोई उल्लेख नहीं था।
बिना किसी मेडिकल जांच और चोट के दर्ज हुई एफआईआर
मामले के विवरण के अनुसार, 22 जुलाई को डॉ. नागेंद्रप्पा ने पुलिस को सूचना दी थी कि नसरीना और उसका पति बिलाल अवैध रूप से भारत में रह रहे बांग्लादेशी नागरिक हैं। इस सूचना के आधार पर पुलिस ने सुबह करीब 11:30 बजे विदेश क्षेत्रीय पंजीकरण अधिकारी (FRRO) को आधिकारिक पत्र भेजा। हालांकि, इसके महज 15 मिनट बाद ही पुलिस ने नसरीना की शिकायत पर डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि डॉक्टर ने उन्हें हिंदी में गालियां दीं, घसीटकर मारपीट की, उसके पति बिलाल के सिर व पीठ पर वार करके जमीन पर गिराया, लातें मारीं और जान से मारने की धमकी दी।
अदालत ने पाया कि डॉक्टर द्वारा पुलिस को दी गई सूचना और उनके खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत के समय में केवल 15 मिनट का अंतर है, जो यह स्पष्ट करता है कि यह डॉक्टर की रिपोर्ट को कमजोर करने के लिए दर्ज कराई गई एक काउंटर एफआईआर थी।
राष्ट्रीय सुरक्षा और मकान मालिकों के लालच पर हाईकोर्ट की चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि केंद्र सरकार की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के तहत अवैध रूप से रह रहे विदेशियों को चिन्हित कर तुरंत निर्वासित किया जाना चाहिए। जस्टिस नागप्रसन्ना ने चिंता जताई कि यदि सूचना देने वाले नागरिकों के खिलाफ ही पुलिस मुकदमे दर्ज करेगी, तो इससे समाज में डर का माहौल बनेगा और अवैध घुसपैठ को बढ़ावा मिलेगा।
पीठ ने उन मकान मालिकों के रवैये पर भी कड़ा एतराज जताया जो केवल ₹1,000 अधिक किराए के लालच में बिना वैध वीजा या दस्तावेजों के विदेशी नागरिकों को अपने मकान और जमीन दे देते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि चंद रुपयों का लालच देश की सुरक्षा पर भारी पड़ने लगे, तो यह बेहद गंभीर स्थिति है। अदालत ने राज्य सरकार को ऐसे मकान मालिकों के खिलाफ सख्त कदम उठाने के निर्देश दिए।
सरकार का स्पष्टीकरण और 6 अगस्त को अगली सुनवाई
राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए विशेष सार्वजनिक अभियोजक बी. एन. जगदीशा ने अदालत में कहा कि सरकार अवैध रूप से रह रहे लोगों का कोई बचाव नहीं कर रही है। उन्होंने पीठ को बताया कि पुलिस भी मानती है कि दंपत्ति अवैध रूप से भारत में रह रहे हैं और डॉक्टर से सूचना मिलते ही दोनों को पहचान सत्यापन तथा हिरासत के लिए एफआरआरओ के समक्ष पेश कर दिया गया था। सरकारी वकील ने अदालत को आश्वासन दिया कि शिकायतकर्ताओं और उन्हें पनाह देने वाले मकान मालिकों दोनों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
हाईकोर्ट ने विशेष सार्वजनिक अभियोजक को निर्देश दिया कि वे पुलिस से यह लिखित स्पष्टीकरण प्राप्त करें कि बिना किसी चिकित्सकीय जांच या शारीरिक चोट के साक्ष्य के डॉक्टर के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें हिरासत में कैसे लिया गया। इसके साथ ही अदालत ने एफआरआरओ को इस याचिका में पक्षकार बनाने का आदेश दिया है और 6 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई से पहले अवैध प्रवासियों को वापस भेजने के संबंध में की गई प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा है।

