30 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला, दो दोषियों को प्रोबेशन पर रिहा करने का आदेश

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने आवश्यक वस्तु अधिनियम और उर्वरक नियंत्रण आदेश के तहत दोषी ठहराए गए दो व्यक्तियों को प्रोबेशन पर रिहा करने का निर्देश दिया है। अदालत ने 30 साल लंबे कानूनी संघर्ष और मानसिक पीड़ा का हवाला देते हुए कहा कि इतने वर्षों बाद दोषियों को वापस जेल भेजना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं होगा।

जस्टिस मनीषा बत्रा की पीठ ने 24 जुलाई को दिए अपने फैसले में स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं को समाज में शांति और अच्छा व्यवहार बनाए रखने की शर्त पर रिहा किया जा रहा है। यदि वे किसी भी अवैध गतिविधि में लिप्त पाए जाते हैं, तो उनकी मूल जेल की सजा दोबारा लागू कर दी जाएगी।

मामले का इतिहास और निचली अदालत का फैसला

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यह कानूनी विवाद 23 अगस्त 2005 को पंजाब के कपूरथला स्थित एक विशेष अदालत द्वारा सुनाए गए फैसले से शुरू हुआ था। विशेष अदालत ने आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति और वितरण से जुड़े सरकारी नियमों के उल्लंघन और गैर-मानक उर्वरक बेचने के आरोप में दोनों व्यक्तियों को दोषी ठहराया था।

अदालत ने दोनों को दो-दो साल के कठोर कारावास की सजा के साथ 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया था। इस फैसले को दोषियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जहां यह अपील लगभग दो दशकों से लंबित थी।

अदालत में पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वकील अजय अग्रवाल और दिनेश गोयल ने पीठ को बताया कि उनके मुवक्किल पिछले 30 वर्षों से मुकदमेबाजी का सामना कर रहे हैं और पहले ही अपनी सजा का एक बड़ा हिस्सा जेल में बिता चुके हैं। वकीलों ने कहा कि दोनों व्यक्ति वर्तमान में अपने परिवारों के साथ शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं, इसलिए उन्हें प्रोबेशन का लाभ दिया जाना चाहिए।

पंजाब सरकार का प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ उप अधिवक्ता जनरल रुचिका सभरवाल ने दोषियों की इस याचिका पर कोई गंभीर आपत्ति नहीं जताई।

सुधार और प्रोबेशन कानून पर हाईकोर्ट का रुख

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अपने आदेश में जस्टिस मनीषा बत्रा ने कहा कि प्रोबेशन का मुख्य उद्देश्य अपराधी को सजा देने के बजाय उसका पुनर्वास और समाज में एकीकरण करना है। कानून की मंशा पहली बार या किसी क्षणिक कमजोरी के कारण अपराध करने वाले व्यक्तियों को सुधारने का अवसर प्रदान करना है, न कि उन्हें कठोर अपराधियों की श्रेणी में डालना।

हाईकोर्ट ने ध्यान दिलाया कि कम गंभीर अपराध करने वाले गैर-अभ्यस्त अपराधियों को जेल भेजने से उनके कट्टर अपराधियों के संपर्क में आने का खतरा रहता है, जिससे उनके सुधरने की संभावना खत्म हो जाती है। इसके अलावा, पात्र अपराधियों को प्रोबेशन देने से जेलों में बढ़ रही भीड़ को नियंत्रित करने में भी सहायता मिलती है। इन सभी परिस्थितियों और लंबी मुकदमेबाजी को देखते हुए अदालत ने दोनों को प्रोबेशन पर रिहा करना ही सबसे उपयुक्त कदम माना।

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