छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में 20 वर्षीय युवती की हत्या के मामले ने एक अहम कानूनी सवाल खड़ा कर दिया है। गंभीर रूप से घायल होने के बाद बोलने में असमर्थ पीड़िता ने कथित तौर पर मोबाइल फोन पर अपने हमलावर की पहचान टाइप की थी। अब सवाल यह है कि क्या यह टाइप किया गया मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) अदालत में दोषसिद्धि का आधार बन सकता है?
मामला सूरजपुर जिले के लटोरी गांव की रहने वाली राधिका राजवाड़े का है, जो सूरजपुर शहर में घरेलू सहायिका के रूप में काम करती थीं। पुलिस ने इस मामले में उनके 23 वर्षीय प्रेमी रितेश राजवाड़े को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों का कहना है कि पीड़िता ने दम तोड़ने से पहले मोबाइल पर टाइप कर कथित हमलावर की पहचान बताई थी।
पुलिस के अनुसार, राधिका और रितेश पिछले छह वर्षों से रिश्ते में थे। 26 जुलाई की शाम रितेश ने कथित तौर पर राधिका को सूरजपुर के नेहरू पार्क बुलाया, जहां उस पर धारदार हथियार से हमला कर उसका गला रेत दिया।
गर्दन पर गहरा वार होने के कारण राधिका बोल नहीं पा रही थीं, लेकिन इसके बावजूद वह किसी तरह पार्क से बाहर निकलकर मदद मांगने पहुंचीं। राहगीरों ने उन्हें जिला अस्पताल पहुंचाया।
अस्पताल पहुंची पुलिस टीम के सामने राधिका ने कथित तौर पर मोबाइल फोन मांगा। पुलिस के अनुसार, फोन मिलने के बाद उन्होंने उस पर कुछ जानकारी टाइप की, जिसमें कथित हमलावर की पहचान दर्ज थी। बाद में उन्हें अंबिकापुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया, जहां रात में उनकी मृत्यु हो गई।
जांच के दौरान पुलिस ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज से घटनाक्रम की पुष्टि हुई। वहीं, पीड़िता के मोबाइल रिकॉर्ड और चैट से भी जांच को महत्वपूर्ण सुराग मिले, जिसके आधार पर रितेश को गिरफ्तार किया गया।
सूरजपुर पुलिस के अनुसार, पूछताछ में आरोपी ने कथित तौर पर हत्या करना स्वीकार किया और बताया कि उसे संदेह था कि राधिका का किसी अन्य व्यक्ति से संबंध है, क्योंकि वह पिछले कुछ समय से उससे दूरी बना रही थी।
टाइप किया गया मृत्यु पूर्व बयान कितना मान्य होगा?
यह मामला इस सवाल को भी सामने लाता है कि यदि कोई व्यक्ति बोलने की स्थिति में न हो और अपनी अंतिम बात मोबाइल पर टाइप करके बताए, तो क्या उसे मृत्यु पूर्व बयान माना जा सकता है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम की जगह लागू भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 26 (पूर्व में भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 32) के तहत किसी व्यक्ति द्वारा अपनी मृत्यु के कारण या उससे जुड़ी परिस्थितियों के संबंध में दिया गया बयान मृत्यु पूर्व बयान के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
चूंकि राधिका कथित तौर पर गले की गंभीर चोट के कारण बोल नहीं पा रही थीं, इसलिए मोबाइल पर टाइप किए गए शब्दों को भी गैर-मौखिक अभिव्यक्ति के रूप में देखा जा सकता है।
यदि अदालत यह पाती है कि यह टाइप किया गया बयान स्वेच्छा से दिया गया था, उसमें किसी तरह की छेड़छाड़ या बाहरी प्रभाव नहीं था और वह प्रमाणिक है, तो इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर विश्वसनीय मृत्यु पूर्व बयान अकेले भी दोषसिद्धि का आधार बन सकता है।
इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की भी होगी जांच
जांच के दौरान मोबाइल फोन और उसमें मौजूद डिजिटल रिकॉर्ड की फोरेंसिक जांच भी महत्वपूर्ण होगी।
पुलिस को मोबाइल फोन को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत सुरक्षित रखना होगा ताकि उसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ की आशंका न रहे। डिजिटल रिकॉर्ड की प्रमाणिकता साबित करने के लिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 (पूर्व में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी) के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र भी प्रस्तुत करना होगा।
इसके अलावा साइबर फोरेंसिक प्रयोगशाला मोबाइल में टाइप किए गए संदेश का सटीक समय भी जांचेगी, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वह कथित हमले के समयक्रम से मेल खाता है। यह जांच मुकदमे के दौरान इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की विश्वसनीयता तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

