पालक्काड़ स्थित ज़िला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने केनरा बैंक को सेवा में लापरवाही का दोषी ठहराते हुए एक ग्राहक को 35,000 रुपये मुआवज़ा और 10,000 रुपये अदालती खर्च के रूप में देने का निर्देश दिया है। बैंक के ऑटोमेटेड सिस्टम ने रविवार को छुट्टी के दिन ग्राहक के बचत खाते से बिना अनुमति 53,464 रुपये काटकर उसके गोल्ड लोन खाते में समायोजित कर दिए थे।
आयोग के अध्यक्ष विनय मेनन वी और सदस्य विद्या ए तथा कृष्णनकुट्टी एन के की पीठ ने 13 जुलाई को सुनाए अपने फैसले में कहा कि बिना पूर्व सहमति के बचत खाते से रकम काटना दोनों पक्षों के बीच हुए अनुबंध का एकतरफा उल्लंघन है।
रविवार को बिना अनुमति काटे गए 53,464 रुपये
यह मामला 10 मार्च 2023 को लिए गए 90,000 रुपये के गोल्ड लोन से जुड़ा है, जिसकी परिपक्वता तिथि 10 मार्च 2024 थी। परिपक्वता की तारीख रविवार को पड़ने के कारण ग्राहक अगले कारोबारी दिन, 11 मार्च को बैंक जाकर लोन का निपटारा करने की योजना बना रही थी। हालांकि, रविवार को ही बैंक के कम्प्यूटरीकृत सिस्टम ने ग्राहक की सहमति के बिना उसके बचत खाते से 53,464 रुपये स्वतः डेबिट कर दिए और गोल्ड लोन खाता बंद कर दिया।
अगले दिन 11 मार्च को जब महिला बैंक पहुंची, तो उसने शेष 44,775.56 रुपये का भुगतान किया और 90,000 रुपये का नया गोल्ड लोन लिया। इसके बाद बैंक ने पहले काटी गई राशि उसके बचत खाते में वापस जमा कर दी। इसके बावजूद, बैंक के पास पहले से सोने के गहने गिरवी होने के बाद भी ऐसी कार्रवाई किए जाने पर ग्राहक ने उपभोक्ता आयोग का रुख किया। महिला ने 50,000 रुपये मुआवज़ा और 10,000 रुपये मुकदमों के खर्च की मांग की थी।
गोल्ड लोन और बैंक के तर्क
बैंक ने अपनी कार्रवाई का बचाव करते हुए तर्क दिया कि लोन समझौते के अनुसार पूरा भुगतान 10 मार्च 2024 तक होना अनिवार्य था। बैंक के अनुसार, नियत तिथि पर भुगतान न होने के कारण उसके ऑटो-डेबिट सिस्टम ने स्वचालित रूप से बचत खाते में उपलब्ध राशि से लोन का बकाया चुका दिया।
बैंक का दावा था कि लोन समझौते की शर्तों, बचत खाते के नियमों और भारतीय अनुबंध अधिनियम की धारा 171 के तहत बैंकर के लीन अधिकार के प्रावधानों के आधार पर यह कदम पूरी तरह कानूनी और न्यायसंगत था।
अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन और आयोग की टिप्पणी
आयोग ने महिला के इस दावे को खारिज कर दिया कि केवल 10,000 रुपये का वार्षिक ब्याज देकर लोन का नवीनीकरण किया जा सकता था, क्योंकि रिकॉर्ड के अनुसार 10 मार्च 2024 को पूरा लोन चुकाना देय हो गया था। इसके बावजूद, आयोग ने माना कि मुख्य मुद्दा लोन देय होने का नहीं, बल्कि बिना अनुमति के बचत खाते से पैसे काटने का था।
पीठ ने ध्यान दिलाया कि यह एक सिक्योर्ड लोन था, जिसमें सोने के गहने पहले से बैंक के पास गिरवी रखे थे। ऐसे में बैंक के पास लोन वसूली के लिए पर्याप्त सुरक्षा पहले से मौजूद थी।
लोन समझौते के दस्तावेजों की जांच के बाद आयोग ने पाया कि इसमें ऐसी कोई शर्त नहीं थी जो डिफॉल्ट की स्थिति में बैंक को स्वचालित रूप से बचत खाते से पैसे निकालने का अधिकार देती हो। इसके विपरीत, समझौते में स्पष्ट था कि लोन न चुकाने पर गिरवी रखे सोने के गहनों की बिक्री करके वसूली की जा सकती है। इसके अलावा, बैंक ऐसा कोई बचत खाता फॉर्म भी पेश नहीं कर सका जिससे सिद्ध हो कि ग्राहक ने ऑटो-डेबिट की लिखित अनुमति दी थी।
आयोग ने स्पष्ट किया कि ग्राहक की स्पष्ट सहमति के बिना बैंक बचत खाते से स्वतः पैसे नहीं काट सकते।

