गलत तथ्य पर आधारित फैसला भी ‘रेस ज्यूडिकाटा’ के रूप में होगा लागू; मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले क्रॉस-ऑब्जेक्शन में हो सकते हैं शामिल: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि गलत तथ्यात्मक आधार पर दिया गया न्यायिक निर्णय भी उसी कार्यवाही के अगले चरणों में ‘रेस ज्यूडिकाटा’ (पूर्व-न्याय के सिद्धांत) के रूप में लागू होता है, बशर्ते कि वह निर्णय गुण-दोष (मेरिट) के आधार पर दिया गया हो और अंतिम रूप ले चुका हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए एक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कोर्ट ने मुकदमे के दौरान संपत्ति खरीदने वाले उत्तरवर्ती खरीदारों (ट्रान्सफ्री पेंडेंटे लिटे) को क्रॉस-ऑब्जेक्शन (आक्षेप-याचिका) में पक्षकार बनने की अनुमति दी, ताकि मूल विक्रेताओं द्वारा मुकदमे से हटने के बाद वे अपने हितों की रक्षा कर सकें।

मामले का पृष्ठभूमि

विवादित संपत्ति मूल रूप से गिरधारी लाल की थी। उनकी मृत्यु के बाद, उनकी विधवा भगवान देई ने संपत्ति संख्या 4677 के एक हिस्से (22 गुणा 22 फीट और 11 गुणा 11 फीट का स्टोर, जो किरायेदारों के कब्जे में था) पर अपने अनन्य स्वामित्व का दावा करते हुए मुकदमा दायर किया। उन्होंने संपत्ति संख्या 4677 के शेष हिस्सों और संपत्ति संख्या 4674 में गिरधारी लाल की दूसरी विधवा शकुंतला देवी (उत्तरदाता संख्या 1) के साथ आधे हिस्से के स्वामित्व की घोषणा की भी मांग की।

ट्रायल कोर्ट ने मुकदमे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि भगवान देई की मृत्यु 29 दिसंबर 1985 को बिना किसी कानूनी वारिस के हो गई थी और संजीव कुमार यह साबित करने में विफल रहे कि वह उनके दत्तक पुत्र थे। इसके विपरीत, ट्रायल कोर्ट ने गिरधारी लाल द्वारा शकुंतला देवी के बेटे वरिंदर कुमार (उत्तरदाता संख्या 2) के पक्ष में निष्पादित वसीयत को सही माना।

अपील में, प्रथम अपीलीय अदालत ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को आंशिक रूप से उलट दिया और संजीव कुमार को भगवान देई का वैध दत्तक पुत्र स्वीकार किया। कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत भगवान देई को किरायेदारों के कब्जे वाले हिस्से का पूर्ण मालिक माना और शकुंतला देवी व वरिंदर कुमार को केवल उस विशेष संपत्ति को बेचने से रोकते हुए निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) जारी की।

इस फैसले से व्यथित होकर शकुंतला देवी और वरिंदर कुमार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के समक्ष नियमित दूसरी अपील (RSA No. 1795 of 1990) दायर की। इसके जवाब में, संजीव कुमार ने क्रॉस-ऑब्जेक्शन (XOBJS-20-C-1990) दायर कर पूरा मुकदमा अपने पक्ष में डिक्री करने की प्रार्थना की।

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मुकदमेबाजी के दौरान ही, संतोष रानी और मोहन लाल (उत्तरदाता संख्या 3 और 4) ने 28 जून 1990 को पंजीकृत बिक्री विलेख (सेल डीड) के माध्यम से शकुंतला देवी से संपत्ति संख्या 4677/A खरीदी।

साल 1999 में, इन खरीदारों ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश I नियम 10 के तहत मुख्य अपील में पक्षकार बनने के लिए एक आवेदन (CM No. 6306-C of 1999) दायर किया। हालांकि, 19 मई 2000 को हाईकोर्ट ने इस आवेदन को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि खरीदारी अदालती रोक के आदेश का उल्लंघन करके की गई थी। उस समय खरीदारों ने क्रॉस-ऑब्जेक्शन में पक्षकार बनने के लिए कोई आवेदन नहीं दिया था।

प्रक्रियात्मक मोड़ और हाईकोर्ट का फैसला

2 फरवरी 2018 को मुख्य अपील और क्रॉस-ऑब्जेक्शन दोनों को पैरवी न करने (नॉन-प्रॉसिक्यूशन) के कारण खारिज कर दिया गया। संजीव कुमार ने जुलाई 2019 में अपने क्रॉस-ऑब्जेक्शन को सफलतापूर्वक बहाल करवा लिया, लेकिन मूल विक्रेताओं ने मुख्य अपील को बहाल करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

मूल विक्रेताओं और संजीव कुमार के बीच सांठगांठ के अंदेशे को देखते हुए, उत्तरवर्ती खरीदारों ने 2023 में सीपीसी के आदेश XXII नियम 10 के तहत नए आवेदन दायर किए। उन्होंने 2,109 दिनों की देरी को माफ करने, मुख्य अपील को बहाल करने और मुख्य अपील व क्रॉस-ऑब्जेक्शन दोनों में पक्षकार बनाए जाने की मांग की।

13 नवंबर 2024 को हाईकोर्ट ने खरीदारों के आवेदनों को स्वीकार कर लिया। हाईकोर्ट ने माना कि उसका 19 मई 2000 का पिछला आदेश तथ्यात्मक रूप से गलत था, क्योंकि निषेधाज्ञा केवल किरायेदारों के कब्जे वाली संपत्ति संख्या 4677 पर थी, जबकि खरीदारों ने संपत्ति संख्या 4677/A खरीदी थी। इलाहाबाद डेवलपमेंट अथॉरिटी बनाम नासिरुज्जमा व अन्य मामले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि गलत निर्णय अंतरिम आवेदनों पर रेस ज्यूडिकाटा के रूप में लागू नहीं होता है। हाईकोर्ट ने मुख्य अपील को बहाल कर दिया और दोनों कार्यवाहियों में खरीदारों को पक्षकार बनने की अनुमति दी।

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पक्षकारों की बहस

अपीलकर्ता संजीव कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि आदेश I नियम 10 सीपीसी के तहत आवेदन को खारिज करने वाला 19 मई 2000 का आदेश अंतिम रूप ले चुका था और आदेश XXII नियम 10 के तहत दायर उत्तरवर्ती आवेदन पर ‘रेस ज्यूडिकाटा’ के रूप में लागू होता है। पश्चिम बंगाल राज्य बनाम हेमंत कुमार भट्टाचार्य व अन्य, मोहनलाल गोयनका बनाम बिनॉय कृष्णा मुखर्जी व अन्य, और दरयाव व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य के मामलों पर भरोसा जताते हुए, उन्होंने कहा कि एक गलत फैसला भी रेस ज्यूडिकाटा के रूप में कार्य करता है, जब तक कि उसे चुनौती न दी गई हो या वह क्षेत्राधिकार की कमी से प्रभावित न हो।

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इसके विपरीत, उत्तरवर्ती खरीदारों के वकील ने तर्क दिया कि सीपीसी का आदेश XXII नियम 10 और धारा 146 अंतरिम खरीदारों के हितों की रक्षा करते हैं जब मूल विक्रेता रुचि खो देता है या विरोधी पक्ष के साथ सांठगांठ कर लेता है। उन्होंने कहा कि जब मुख्य अपील को खारिज रहने दिया गया और क्रॉस-ऑब्जेक्शन को बहाल कर दिया गया, तब एक नया कारण (कॉज ऑफ एक्शन) उत्पन्न हुआ, जिससे अपने संपत्ति अधिकारों की रक्षा के लिए उनका पक्षकार बनना आवश्यक हो गया। उन्होंने राज कुमार बनाम सरदारी लाल व अन्य, अमित कुमार शॉ व अन्य बनाम फरीदा खातून व अन्य, श्रीमती शैला बाला दासी बनाम श्रीमती निर्मला सुंदरी दासी व अन्य, और थॉमसन प्रेस (इंडिया) लिमिटेड बनाम नानक बिल्डर्स एंड इन्वेस्टर्स प्राइवेट लिमिटेड व अन्य के निर्णयों का सहारा लिया।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने तथ्यात्मक त्रुटियों पर आधारित अंतरिम आदेशों पर रेस ज्यूडिकाटा की प्रयोज्यता का परीक्षण किया और सीपीसी के आदेश I नियम 10 व आदेश XXII नियम 10 के अलग-अलग दायरों का विश्लेषण किया।

न्यायिक निर्णयों की बाध्यकारी प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“यह अब एक स्थापित स्थिति है कि पूर्व-न्याय (रेस ज्यूडिकाटा) का सिद्धांत समान कार्यवाही के बाद के चरणों पर भी लागू होता है, यदि शामिल प्रश्न या मुद्दे का फैसला उसी मुकदमेबाजी के पहले के चरण में किया जा चुका हो…”

“इसके अलावा, यह भी अच्छी तरह से तय है कि कोई न्यायिक निर्णय बाध्यकारी होता है, चाहे वह सही हो या गलत। किसी न्यायिक या अर्ध-न्यायिक निकाय द्वारा की गई कानून या तथ्य की गलती को अपील के अलावा किसी अन्य तरीके से चुनौती नहीं दी जा सकती, जब तक कि वह क्षेत्राधिकार से जुड़ा मामला न हो।”

आदेश I नियम 10 और आदेश XXII नियम 10 सीपीसी के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“सीपीसी का आदेश XXII नियम 10 एक विशिष्ट सक्षम प्रावधान है जो मुकदमे या अपील के लंबित रहने के दौरान हितों के हस्तांतरण को नियंत्रित करता है। इसका संचालन आदेश I नियम 10 के तहत पक्षकार बनाने की सामान्य शक्ति से अलग है।”

पीठ ने माना कि हालांकि दोनों प्रावधान अलग हैं, लेकिन जहां आदेश I नियम 10 सीपीसी के तहत किसी विशिष्ट हस्तांतरण के आधार पर पक्षकार बनाने के आवेदन का गुण-दोष के आधार पर मूल्यांकन कर उसे खारिज कर दिया जाता है, तो समान तथ्यों पर उसी राहत के लिए आदेश XXII नियम 10 सीपीसी के तहत दायर दूसरा आवेदन रेस ज्यूडिकाटा से बाधित होगा। केवल कानूनी प्रावधान बदल देने से किसी मुकदमेबाज को तय मुद्दों को दोबारा उठाने का नया अधिकार नहीं मिल जाता, जैसा कि सुल्तान सईद इब्राहिम बनाम प्रकाशन व अन्य और बी.एस. ललिता व अन्य बनाम भुवनेश्वर व अन्य में तय किया गया है।

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नतीजतन, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने मुख्य अपील के संबंध में अपने पिछले आदेश को उलटकर गलती की, क्योंकि 2000 का आदेश अंतिम रूप ले चुका था। इसके अलावा, खरीदारों का मुख्य अपील में विवादित संपत्ति पर कोई दावा भी नहीं था।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने क्रॉस-ऑब्जेक्शन के संबंध में स्पष्ट अंतर रेखा खींची। चूंकि 1999 का शुरुआती आवेदन केवल मुख्य अपील तक ही सीमित था, इसलिए क्रॉस-ऑब्जेक्शन के संबंध में पहले कोई न्यायिक निर्णय नहीं हुआ था। कोर्ट ने कहा कि जब विक्रेताओं ने मुकदमा छोड़ दिया और क्रॉस-ऑब्जेक्शन बहाल होने के बावजूद मुख्य अपील को खारिज रहने दिया, तो खरीदारों के लिए नुकसान या सांठगांठ के जोखिम के कारण एक नया कारण (कॉज ऑफ एक्शन) उत्पन्न हुआ।

सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत मुख्य अपील को बहाल किया गया था और उसमें उत्तरवर्ती खरीदारों को पक्षकार बनाया गया था। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस निर्देश को बरकरार रखा जिसके तहत उत्तरवर्ती खरीदारों (उत्तरदाता संख्या 3 और 4) को क्रॉस-ऑब्जेक्शन में उत्तरदाता के रूप में शामिल होने की अनुमति दी गई थी। मुकदमे के खर्च को लेकर कोई आदेश जारी नहीं किया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: संजीव कुमार बनाम शकुंतला देवी और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 1052/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 27 जुलाई 2026

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