एक जैसा तौर-तरीका होने से अलग-अलग राज्यों के साइबर फ्रॉड ‘एक ही लेन-देन’ नहीं बन जाते: सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर को एक साथ जोड़ने से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टिन जॉर्ज मसीह की पीठ ने स्पष्ट किया है कि विभिन्न साइबर धोखाधड़ी शिकायतों में एक जैसा तौर-तरीका (modus operandi) होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि वे अपराध ‘एक ही लेन-देन’ (same transaction) का हिस्सा हैं। संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर एक रिट याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ महाराष्ट्र, कर्नाटक और ओडिशा में दर्ज कई एफआईआर (FIR) को रद्द करने या एक साथ जोड़ने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता मौलिक अधिकारों के उल्लंघन या हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने के बजाय सीधे सुप्रीम कोर्ट आने के लिए किसी असाधारण परिस्थिति को साबित करने में विफल रहा है, क्योंकि प्रत्येक एफआईआर अलग-अलग पीड़ितों से जुड़ी स्वतंत्र घटनाओं को दर्शाती है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता रुत्विज भगत सिंह वाखरे ने कर्नाटक (बेंगलुरु), महाराष्ट्र (पुणे) और ओडिशा (राउरकेला) में दर्ज चार एफआईआर को रद्द करने या वैकल्पिक रूप से उन्हें एक साथ मिलाकर किसी एक एजेंसी से composite जांच कराने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। ये एफआईआर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की विभिन्न धाराओं (जैसे 120बी, 170, 384, 389, 417, 419, 420, 465, 467, 468, 471 और 506) तथा सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धाराओं 43, 66सी और 66डी के तहत दर्ज की गई थीं।

मामला साइबर धोखाधड़ी की उन घटनाओं से जुड़ा है, जिनमें अज्ञात व्यक्तियों ने खुद को पुलिस अधिकारी बताकर पीड़ितों से संपर्क किया था। पीड़ितों को झूठा डराया गया कि उनके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग की गतिविधियां की गई हैं और जांच व सत्यापन के बहाने उनसे विभिन्न बैंक खातों में पैसे ट्रांसफर करवाए गए। इन पैसों का एक हिस्सा याचिकाकर्ता के स्वामित्व वाली फर्म ‘मेसर्स अल ज़ेबा मरीन ओवरसीज’ के बैंक खाते में जमा हुआ था।

हालांकि, याचिकाकर्ता ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि वह मर्चेंट शिप पर विदेश में कार्यरत था और उसे इन लेन-देन की कोई जानकारी नहीं थी। उसका कहना था कि उसने अपने दोस्त गणेश खैरे को ऑनलाइन गेमिंग व्यवसाय चलाने के लिए कमीशन के आधार पर अपने बैंक खाते का उपयोग करने की अनुमति दी थी, जिसे बाद में उसके दोस्त और एक अन्य व्यक्ति कृष्णकांत शर्मा द्वारा संचालित और दुरुपयोग किया गया। याचिकाकर्ता के अनुसार, खाते के दुरुपयोग का पता चलने पर उसने 9 मई 2024 को उन व्यक्तियों के खिलाफ साइबर क्राइम शिकायत भी दर्ज कराई थी।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि सभी एफआईआर एक जैसे आरोपों और समान अपराधों से उत्पन्न हुई हैं। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग जांच की अनुमति देने से कार्यवाहियों की बहुलता होगी, परस्पर विरोधी निष्कर्ष आएंगे और उसे भारी नुकसान पहुंचेगा। इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने अपने गंभीर हृदय रोग और मधुमेह की स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि उसके लिए विभिन्न राज्यों में अदालती कार्यवाहियों का सामना करना कठिन है।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी राज्यों ने एफआईआर को एक साथ जोड़ने की मांग का कड़ा विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि प्रत्येक एफआईआर एक स्वतंत्र लेन-देन और अलग-अलग कृत्यों के संबंध में अलग-अलग पीड़ितों द्वारा दर्ज कराई गई है। राज्य एजेंसियों ने कहा कि संबंधित क्षेत्राधिकार की जांच एजेंसियां अपने क्षेत्रीय सीमा में हुए अपराधों की जांच के लिए सक्षम हैं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि साइबर धोखाधड़ी की जांच में डिजिटल साक्ष्यों का जटिल फोरेंसिक परीक्षण, पैसों के लेन-देन का पता लगाना और बैंक खातों का गहन विश्लेषण शामिल होता है।

अदालत का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

अनुच्छेद 32 के तहत एफआईआर रद्द करने की प्राथमिक मांग पर विचार करते हुए अदालत ने कहा कि यद्यपि अनुच्छेद 32 के तहत आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करने की शक्ति मौजूद है, लेकिन यह एक असाधारण उपाय है जिसका उपयोग बहुत कम और केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को रोकने के लिए किया जाना चाहिए। ‘रमेश थापर बनाम मद्रास राज्य’, ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम पॉल मानिकम’, ‘जगीशा अरोड़ा बनाम यूपी राज्य’ और ‘सुनील कुमार राय बनाम बिहार राज्य’ जैसे मिसालों का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि पीड़ित पक्ष को सामान्यतः पहले हाईकोर्ट का रुख करना चाहिए।

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‘अर्नब रंजन गोस्वामी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले का जिक्र करते हुए अदालत ने याचिका की विचारणीयता और उस पर सुनवाई के अंतर को रेखांकित किया और कहा:

“याचिका के विचारणीय होने और क्या उस पर सुनवाई की जानी चाहिए, इन दोनों के बीच एक स्पष्ट अंतर है।”

अदालत ने ‘विनोद दुआ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ और ‘राकेश बिहारी लाल बनाम यूपी राज्य’ का भी हवाला दिया। ‘राजेंद्र बिहारी लाल’ मामले की टिप्पणी को उद्धृत करते हुए पीठ ने कहा:

“चाहे आसमान गिर जाए, लेकिन न्याय होना चाहिए।”

वर्तमान मामले में, जस्टिस संजय करोल ने नोट किया कि याचिकाकर्ता मौलिक अधिकारों का कोई उल्लंघन या हाईकोर्ट के समक्ष उपलब्ध उपाय को नजरअंदाज करने के लिए कोई असाधारण स्थिति साबित करने में असमर्थ रहा है।

एफआईआर को एक साथ जोड़ने की वैकल्पिक मांग पर अदालत ने ‘टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य’, ‘अमित कात्याल बनाम हरियाणा राज्य’, ‘बाबूभाई बनाम गुजरात राज्य’, ‘अंजू चौधरी बनाम यूपी राज्य’ और ‘राजस्थान राज्य बनाम सुरेंद्र सिंह राठौड़’ जैसे निर्णयों का विश्लेषण किया। पीठ ने ‘स्टेट (एनसीटी ऑफ दिल्ली) बनाम खिमजी भाई जाडेजा’ का संदर्भ दिया, जिसमें एक ही लेन-देन के निर्धारण के लिए ‘ट्रिपल टेस्ट’ (तीन परीक्षण) बताए गए थे: उद्देश्य और योजना की एकता, समय और स्थान की निकटता, और कार्रवाई की निरंतरता।

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इन परीक्षणों को लागू करते हुए अदालत ने पाया कि प्रत्येक एफआईआर अलग-अलग अवसर पर अलग-अलग पीड़ित से ठगी से जुड़ी है और उनके बीच आपस में कोई सीधा संबंध नहीं है। केवल एक जैसा तौर-तरीका होने से अलग-अलग अपराध एक ही लेन-देन में परिवर्तित नहीं हो जाते।

अदालत ने यह भी माना कि याचिकाकर्ता की चिकित्सीय स्थिति कानूनी रूप से मामलों को क्लब करने का आधार नहीं बन सकती। इसके अतिरिक्त, मामलों को एक साथ जोड़ने से पीड़ितों को दूरदराज के राज्यों में जाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा, जिससे उन्हें भारी कठिनाई होगी।

डिजिटल अपराधों की गंभीरता पर प्रकाश डालते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

“आजकल कई साइबर धोखाधड़ी के मामले बढ़ रहे हैं और अपराध की गंभीरता तथा इसके दुष्परिणामों को देखते हुए इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता। खासकर तब, जब अपराध के शिकार लोग मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों से आते हैं, जो अपराधियों द्वारा अपनाए गए तंत्र और प्रक्रिया से अनजान होते हैं और अपनी गरीबी से उबरने के लालच में फंस जाते हैं।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका को खारिज कर दिया। पीठ ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के पास अनुच्छेद 226 या सीआरपीसी की धारा 482 के तहत संबंधित हाईकोर्ट या उपयुक्त मंच के समक्ष कानूनी उपाय तलाशने की स्वतंत्रता बनी रहेगी। अदालत ने सभी पक्षों के तर्कों को खुला रखा ताकि सक्षम अदालतें गुण-दोष के आधार पर उन पर विचार कर सकें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: रुत्विज भगत सिंह वाखरे बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका (क्रिमिनल) संख्या 127/2026
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस अगस्टिन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 24 जुलाई 2026

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