सरकारी भर्तियों से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि जब वैधानिक नियमों में उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट करने का एक विशेष तरीका तय हो, तो चयन समितियां उम्मीदवारों को बाहर करने के लिए अपनी तरफ से बिना किसी नियम के न्यूनतम योग्यता अंक या कट-ऑफ मार्क्स लागू नहीं कर सकतीं। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि क्राफ्ट इंस्ट्रक्टर ट्रेनिंग स्कीम (सीआईटीएस) प्रमाणपत्र धारक पात्र उम्मीदवारों के इंटरव्यू आयोजित किए जाएं और उन्हें आईटीआई अनुदेशकों के खाली पदों पर नियुक्तियां दी जाएं।
मामले की पृष्ठभूमि
देश के युवाओं के कौशल विकास और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 1950 के दशक में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) स्थापित किए गए थे। 24 जुलाई 1996 को श्रम मंत्रालय के तहत रोजगार और प्रशिक्षण महानिदेशालय ने वोकेशनल इंस्ट्रक्टरों की शैक्षणिक और तकनीकी योग्यताओं को बढ़ाते हुए सभी राज्यों को अपने नियमों में संशोधन करने का निर्देश दिया था, ताकि एक वर्ष के सीआईटीएस प्रमाणपत्र को अनिवार्य योग्यता बनाया जा सके। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस निर्देश को स्वीकार किया और 8 अगस्त 2003 को उत्तर प्रदेश औद्योगिक प्रशिक्षण (अनुदेशक) सेवा नियमावली, 1991 में संशोधन करके सीआईटीएस को अनिवार्य योग्यता के रूप में शामिल कर लिया।
हालांकि, 2014 में राज्य सरकार ने उत्तर प्रदेश औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (अनुदेशक) सेवा नियमावली, 2014 बनाई, जिसने पुराने नियमों का स्थान ले लिया और सीआईटीएस की अनिवार्यता को घटाकर केवल एक “वरीयता प्राप्त योग्यता” (प्रिफरेंशियल क्वालिफिकेशन) बना दिया। इसके बाद 2014 में 2,498 पदों और 2015 में 559 पदों के लिए जारी विज्ञापनों के तहत सीआईटीएस प्रमाणपत्र धारकों ने आवेदन किया। लेकिन चयन प्रक्रिया के दौरान बिना सीआईटीएस वाले उम्मीदवारों के नामों पर भी विचार किया गया और कई सीआईटीएस प्रमाणपत्र धारकों को इंटरव्यू प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया गया, जिसके बाद यह विवाद अदालती कार्रवाई तक पहुंचा।
उम्मीदवारों ने 2014 के नियमों के नियम 9(B), 16(3)(a)(iii), और 17(3) के साथ-साथ भर्ती विज्ञापनों को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। 4 जनवरी 2023 को हाईकोर्ट ने कुल 43 रिट याचिकाएं खारिज कर दी थीं, जिसके खिलाफ उम्मीदवारों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
राज्य सरकार की आपत्ति और सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष उत्तर प्रदेश सरकार ने एक शुरुआती आपत्ति उठाते हुए तर्क दिया कि अपीलकर्ताओं ने यह जानते हुए चयन प्रक्रिया में भाग लिया था कि सीआईटीएस केवल एक वांछनीय योग्यता है। राज्य सरकार का कहना था कि प्रक्रिया में भाग लेने के बाद अब उम्मीदवार भर्ती नियमों या विज्ञापनों को चुनौती नहीं दे सकते।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आमतौर पर जो उम्मीदवार बिना किसी आपत्ति के भर्ती प्रक्रिया में शामिल होता है, वह बाद में चयन प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकता। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जहां चयन प्रक्रिया में स्पष्ट रूप से मनमानापन या अवैधता दिखाई देती हो, वहां यह नियम लागू नहीं होता। कोर्ट के अनुसार, किसी उम्मीदवार से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि उसने ऐसी अवैधता को स्वीकार कर लिया है जो पूरी भर्ती प्रक्रिया को ही दूषित करती हो।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निष्कर्ष
2014 के नियमों के तहत नियम 16 का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने पाया कि चयन प्रक्रिया में कुल 100 अंक निर्धारित थे। इनमें से हाई स्कूल के अंक (अधिकतम 50 अंक), नेशनल ट्रेड सर्टिफिकेट/नेशनल अप्रेंटिसशिप सर्टिफिकेट या डिप्लोमा/डिग्री (अधिकतम 20 अंक), और सीआईटीएस/पीओटी टेस्ट (अधिकतम 15 अंक) को मिलाकर कुल 85 अंकों के आधार पर मेरिट सूची तैयार की जानी थी, जबकि इंटरव्यू के लिए 15 अंक तय थे।
नियम 16(3)(b)(i) के तहत केवल तभी उम्मीदवारों को पदों की संख्या से चार गुना तक सीमित करके शॉर्टलिस्ट करने की अनुमति थी, जब आवेदन बहुत अधिक संख्या में प्राप्त हुए हों। हालांकि, राज्य सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से पता चला कि 2014 में विज्ञापित 2,498 पदों के मुकाबले केवल 2,200 के करीब उम्मीदवारों को ही ऑफर लेटर जारी किए गए थे। यानी पात्र उम्मीदवारों की भरमार होने के बजाय विज्ञापन में निकाले गए पद ही खाली रह गए थे।
नियम 16(3)(b)(i) का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की: “हालांकि नियम केवल तभी उम्मीदवारों की संख्या कम करने की व्यवस्था करता है जब उनकी संख्या अत्यधिक हो, लेकिन केवल नियम 16(3)(a) के उप-खंड (i), (ii) और (iii) के तहत प्राप्त अंकों के आधार पर उम्मीदवारों को बिना इंटरव्यू बुलाए बाहर करने का कोई प्रावधान नहीं है।”
कोर्ट ने माना कि योग्य उम्मीदवारों को प्रक्रिया से बाहर सिर्फ इसलिए होना पड़ा क्योंकि चयन समिति और राज्य सरकार ने अपनी तरफ से ऐसे कट-ऑफ मार्क्स तय कर दिए, जिनका 2014 के नियमों में कोई जिक्र नहीं था।
इस तरीके को अवैध बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा: “जब नियम बनाने वाली अथॉरिटी ने शॉर्टलिस्टिंग का केवल एक ही तरीका तय किया था—यानी आवेदनों की संख्या अत्यधिक होने पर इंटरव्यू के लिए बुलाए जाने वाले उम्मीदवारों को पदों की संख्या से चार गुना तक सीमित करना—तो चयन समिति/उत्तर प्रदेश सरकार के लिए कोई अलग से अतिरिक्त पात्रता सीमा थोपना सही नहीं था।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया: “योग्यता या कट-ऑफ अंक तय करने के कारण बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को बाहर होना पड़ा, जिनमें अपीलकर्ता भी शामिल थे। इसके चलते, नियमों के तहत पात्र उम्मीदवार उपलब्ध होने के बावजूद पद खाली रह गए। इस तरह से कट-ऑफ तय करना मनमाना और 2014 के नियमों द्वारा निर्धारित भर्ती प्रक्रिया के साथ-साथ उनके मुख्य उद्देश्य के भी विपरीत है।”
यह रेखांकित करते हुए कि भर्ती के नियमों को बीच में नहीं बदला जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने माना: “चयन समिति/उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा खेल के बीच में नियम बदलकर कई उम्मीदवारों के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता था।”
कोर्ट का निर्णय और निर्देश
विधानसभा में दिए गए आंकड़ों के आधार पर यह सामने आया कि स्वीकृत 7,768 पदों के मुकाबले राज्य में 2,200 से अधिक पद अब भी खाली हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल समय बीत जाने के आधार पर अपीलकर्ताओं को राहत देने से इनकार करना उनके साथ अन्याय होगा।
अपीलों को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- अपीलकर्ताओं, पंजीकृत समिति के सदस्यों और मामले में शामिल अन्य उम्मीदवारों को दो सप्ताह के भीतर इस निर्णय की प्रति के साथ नियुक्ति प्राधिकारी के समक्ष अपना पक्ष रखने की छूट दी जाती है।
- पंजीकृत समिति के सदस्यों को यह साबित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे कि याचिका दायर करने की तिथि पर उनकी सदस्यता वैध थी।
- उत्तरदाता जल्द से जल्द पात्र उम्मीदवारों के इंटरव्यू आयोजित करें, नियमों के अनुसार उनकी आपसी मेरिट तय करें और चार महीने के भीतर संबंधित विषयों में मौजूदा खाली पदों पर नियुक्तियां प्रदान करें।
- यदि पात्र उम्मीदवारों की संख्या उपलब्ध रिक्तियों से अधिक होती है, तो उनके समायोजन के लिए अतिरिक्त (सुपरन्यूमरेरी) पद सृजित किए जाएंगे।
- नियुक्तियां भविष्य की तारीख से लागू होंगी, जो आवेदन की तिथि के अनुसार शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यताओं तथा चरित्र सत्यापन के अधीन होंगी।
- यदि किसी उम्मीदवार को नियुक्ति देने से मना किया जाता है, तो नियुक्ति प्राधिकारी को बिना किसी देरी के कारण बताते हुए स्पष्ट आदेश जारी करना होगा।
- नवनियुक्त कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति पर लागू नियमों के अनुसार पेंशन और ग्रेच्युटी के अलावा सभी सेवा लाभ (बकाया वेतन, वरिष्ठता और पदोन्नति को छोड़कर) प्राप्त होंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अरविंद कुमार एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8257-8259/2026
पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 24 जुलाई 2026

