इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की पीठ के समक्ष एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 144 के तहत भरण-पोषण का भुगतान करना एक निरंतर जारी रहने वाली कानूनी देनदारी है। इसके लिए पत्नी को हर महीने के भरण-पोषण के लिए बार-बार निष्पादन (एक्जीक्यूशन) याचिका दाखिल करने की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें केवल एक महीने के बकाये का भुगतान होने पर पत्नी की निष्पादन याचिका को खारिज कर दिया गया था। इसके साथ ही कोर्ट ने पति को सभी लंबित बकाये का भुगतान करने और भविष्य का भरण-पोषण सीधे पत्नी के बैंक खाते में जमा करने का आदेश दिया। राज्य भर की फैमिली कोर्टों और ग्राम न्यायालयों के लिए भी इस संबंध में दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 11 मई 2018 को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दायर भरण-पोषण आवेदन से शुरू हुआ था। 4 मार्च 2023 को अपर प्रधान न्यायाधीश-प्रथम, फैमिली कोर्ट, जौनपुर ने आवेदन की तिथि से पत्नी को 5,000 रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था।
इस आदेश के अनुपालन के लिए पत्नी ने 13 अप्रैल 2023 को सीआरपीसी की धारा 128 के तहत पहली निष्पादन याचिका दायर की। पति द्वारा फरवरी 2025 तक का पूरा बकाया चुका दिए जाने के बाद 10 मार्च 2025 को इस याचिका का निपटारा कर दिया गया।
इसके बाद, पत्नी ने अप्रैल 2025 से आगे के नियमित भरण-पोषण और मार्च 2025 के 5,000 रुपये के बकाये की वसूली के लिए 9 अप्रैल 2025 को दूसरी निष्पादन याचिका दाखिल की। 29 अक्टूबर 2025 को फैमिली कोर्ट ने पति के खिलाफ 11 महीने के बकाये की वसूली के लिए रिकवरी वारंट जारी किया। हालांकि, 6 दिसंबर 2025 को जब पति ने मार्च 2025 के केवल 5,000 रुपये जमा किए, तो फैमिली कोर्ट ने कुल 55,000 रुपये का बकाया होने के बावजूद शेष अवधि के लिए रिकवरी वारंट वापस ले लिया।
बाद में, 27 जनवरी 2026 को फैमिली कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 144(3) के परंतुक (सीआरपीसी की धारा 125(3) के समकक्ष) का हवाला देते हुए पत्नी की निष्पादन याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि मार्च 2025 का दावा किया गया 5,000 रुपये जमा हो चुका है, इसलिए आवेदन पूरी तरह से निस्तारित माना जाता है। कोर्ट ने केस रिकॉर्ड को भी रिकॉर्ड रूम में भेज दिया। फैमिली कोर्ट के इस फैसले से व्यथित होकर पत्नी ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
पक्षों की दलीलें
पुनरीक्षणकर्ता की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि 4 मार्च 2023 का मूल भरण-पोषण आदेश पूरी तरह वैध और प्रभावी है, क्योंकि इसे किसी भी सक्षम अदालत द्वारा रद्द या संशोधित नहीं किया गया है। यह दलील दी गई कि बीएनएसएस की धारा 144(3) / सीआरपीसी की धारा 125(3) का परंतुक केवल एक निश्चित अवधि के बाद रिकवरी वारंट जारी करने पर रोक लगाता है, लेकिन यह भरण-पोषण प्राप्त करने के मूल अधिकार को समाप्त नहीं करता और न ही धारा 128 सीआरपीसी / धारा 147 बीएनएसएस के तहत प्रवर्तन पर कोई प्रतिबंध लगाता है।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के माध्यम से नोटिस दिए जाने के बावजूद पति की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ। राज्य के वकील मयंक अवस्थी ने अदालत की सहायता करते हुए कहा कि भरण-पोषण का आदेश लागू है और यह पति पर हर महीने भुगतान करने का एक निरंतर कानूनी दायित्व बनाता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने वैधानिक योजना का विश्लेषण करते हुए माना कि फैमिली कोर्ट ने बीएनएसएस की धारा 144(3) / सीआरपीसी की धारा 125(3) के परंतुक को लागू करने में गलती की है। कोर्ट ने स्थापित मिसालों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 125(1) सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण का दायित्व निरंतर प्रकृति का होता है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसला शांता उर्फ उषादेवी बनाम बी.जी. शिवनंजप्पा (2005) और अपने ही निर्णय मोहम्मद उस्मान उर्फ भाई लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“धारा 125 सीआरपीसी एक सामाजिक कल्याणकारी कानून है और पत्नी तथा पुत्री के कल्याण एवं लाभ के लिए इसका उदारतापूर्वक अर्थ लगाया जाना चाहिए। जब धारा 125(1) के तहत पारित आदेश के अनुसार भरण-पोषण देने की देनदारी एक निरंतर जारी रहने वाली देनदारी है, तो ऐसी स्थिति में बार-बार याचिकाएं दाखिल करने पर जोर देना अनुचित है।”
सीआरपीसी की धारा 125(3) के परंतुक में समय सीमा के संबंध में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पूंगोडी और अन्य बनाम थंगावेल (2013) का संदर्भ देते हुए दोहराया:
“परंतुक का तात्पर्य केवल यह है कि धारा 125(3) सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण की वसूली की प्रक्रिया—यानी जुर्माना वसूलने और बकाया न चुकाने वाले को हिरासत में रखने की प्रक्रिया—उस याचिकाकर्ता के लिए उपलब्ध नहीं होगी जो अपने अधिकारों के प्रति उदासीन रहा और भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार उत्पन्न होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर अदालत नहीं पहुंचा। हालांकि, ऐसी स्थिति में भरण-पोषण की राशि वसूलने का सामान्य उपाय, यानी दीवानी कार्यवाही (सिविल एक्शन), फिर भी उपलब्ध रहेगा।”
इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों आरती राय बनाम सतीश राय (2025) (जिसमें सीधे बैंक खाते में राशि जमा करने को कहा गया था) और डिंपल बनाम निशांत प्रवीणभाई सोनी (2026) (जिसमें अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नियोक्ता द्वारा सीधे वेतन कटौती का अधिकार दिया गया था) का भी हवाला दिया।
निर्णय और निर्देश
हाईकोर्ट ने पति को आज तक के भरण-पोषण के सभी बकाये का भुगतान करने और 4 मार्च 2023 के आदेश का पालन करते हुए 5,000 रुपये की मासिक राशि पत्नी के सत्यापित बैंक खाते में जमा करना जारी रखने का निर्देश दिया।
इसके अलावा, हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी फैमिली कोर्टों और ग्राम न्यायालयों के पीठासीन अधिकारियों के लिए अनिवार्य निर्देश जारी किए:
- विचारण न्यायालयों को शांता उर्फ उषादेवी मामले के सिद्धांत का पालन करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि दावेदारों को मासिक भरण-पोषण के लिए बार-बार निष्पादन याचिकाएं दाखिल करने की आवश्यकता न पड़े।
- विचारण न्यायालयों को पूंगोडी मामले का पालन करना होगा, यह स्वीकार करते हुए कि धारा 125(3) सीआरपीसी / धारा 144(3) बीएनएसएस के तहत एक वर्ष का परंतुक बकाये के अधिकार को समाप्त नहीं करता है।
- अदालतों को भुगतानकर्ता को यह निर्देश देना होगा कि वह मासिक भरण-पोषण राशि सीधे दावेदार के सत्यापित बैंक खाते में जमा करे, जैसा कि आरती राय मामले में कहा गया था।
- जहां भुगतानकर्ता एक वेतनभोगी कर्मचारी है, वहां अदालतों को नियोक्ता को निर्देश देना होगा कि वह डिंपल मामले के अनुसार भरण-पोषण की राशि या बकाये को सीधे कर्मचारी के वेतन से काटकर दावेदार के बैंक खाते में ट्रांसफर करे।
- भुगतान न करने या इनकार करने की स्थिति में, अदालतें भुगतानकर्ता की संपत्ति कुर्क करेंगी। यदि कुर्क की गई संपत्ति अपर्याप्त है, तो धारा 125(3) सीआरपीसी / धारा 144(3) बीएनएसएस और रजनीश बनाम नेहा के तहत प्रत्येक महीने की विफलता के लिए एक महीने तक के साधारण कारावास का आदेश दिया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि न्यायिक अधिकारियों द्वारा इन निर्देशों का पालन न करने पर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक और अवमानना की कार्यवाही की जाएगी। जिला प्रशासन और पुलिस अधिकारियों को निष्पादन में सहायता करने का निर्देश दिया गया, और जिला जजों को निर्देश दिया गया कि वे मासिक निगरानी सेल बैठकों के दौरान भरण-पोषण आदेशों के प्रवर्तन पर चर्चा करें।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: माला कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: आपराधिक पुनरीक्षण संख्या 1552/2026
पीठ: जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि
निर्णय की तिथि: 24 जुलाई 2026

