मायके में रहने के आधार पर पत्नी का भरण-पोषण नहीं रोका जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट ने दिए 30 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश

झारखंड हाईकोर्ट ने एक तलाकशुदा महिला को 30 लाख रुपये का स्थायी गुजारा भत्ता देने का आदेश सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति अपनी कानूनी जिम्मेदारी से सिर्फ इसलिए पीछे नहीं हट सकता कि उसकी पूर्व पत्नी अपने माता-पिता के साथ रह रही है या वे उसकी आर्थिक मदद कर रहे हैं। हाईकोर्ट के अनुसार, भरण-पोषण की राशि का निर्धारण केवल अनुमानों के आधार पर नहीं होना चाहिए, बल्कि यह पति की वास्तविक कमाई और क्षमता के निष्पक्ष आकलन पर आधारित होना चाहिए।

42 साल के अनुमानित जीवनकाल को ध्यान में रखकर तय हुई राशि

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की पीठ ने 20 जुलाई को पारित अपने आदेश में यह निर्णय दिया। अदालत ने 28 वर्षीय याचिकाकर्ता महिला और भारत में महिलाओं की औसत जीवन प्रत्याशा (लगभग 70 वर्ष) का आकलन करते हुए आगामी 42 वर्षों की अवधि के लिए यह एकमुश्त राशि निर्धारित की। पीठ ने टिप्पणी की कि यद्यपि पति की अपनी व्यक्तिगत जरूरतें और अन्य जिम्मेदारियां हैं, फिर भी उसका यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह अपनी पूर्व पत्नी को विवाह के दौरान मिले जीवन स्तर के अनुरूप जीवन जीने का अवसर दे।

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सब्जी बेचने वाली महिला और सिपाही पति की आय में बड़ा अंतर

मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति में भारी अंतर देखा गया। महिला की कोई स्वतंत्र आय नहीं है और वह सड़क किनारे अपनी मां के सब्जी के स्टॉल पर मदद करती है। दूसरी ओर, उसका पति झारखंड पुलिस में कांस्टेबल के पद पर कार्यरत है और उसका कुल मासिक वेतन 66,097 रुपये है।

आय के आकलन पर हाईकोर्ट के निर्देश

हाईकोर्ट ने भरण-पोषण तय करने की प्रक्रिया में आय के निर्धारण को पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम बताया। अदालत ने कहा कि जहां वेतन पर्ची, बैंक खाते या आयकर रिटर्न जैसे आधिकारिक दस्तावेज मौजूद हैं, वहां दर्ज वास्तविक आय को आधार बनाया जाना चाहिए। हालांकि, यदि कोई व्यक्ति अपनी आय छुपाता है या बेरोजगारी का झूठा दावा करता है, तो अदालतों को उसकी शैक्षणिक योग्यता, पेशेवर पृष्ठभूमि, पिछले रोजगार, जीवन शैली और बैंक लेनदेन के आधार पर निष्पक्ष अनुमान लगाना चाहिए। पीठ ने कहा कि पर्याप्त गुजारा भत्ता मिलने पर ही महिला स्वतंत्र रूप से रहने की जगह, दैनिक खर्च और स्वाभिमान का जीवन सुनिश्चित कर सकती है।

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विवाह से लेकर अदालत तक का घटनाक्रम

इस जोड़े का विवाह 12 फरवरी 2017 को लातेहार में उरांव आदिवासी रीति-रिवाज से हुआ था। वैवाहिक विवादों के बाद, पति ने 23 जुलाई 2021 को हिंदू विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता और परित्याग का आरोप लगाते हुए लातेहार के कुटुंब न्यायालय में तलाक की अर्जी दाखिल की। कुटुंब न्यायालय ने 22 नवंबर 2022 को तलाक की मंजूरी दे दी, जिसके खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की।

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अपील लंबित रहने के दौरान पति ने 11 जनवरी 2025 को दूसरा विवाह कर लिया, जिससे उनके बीच समझौते की सभी संभावनाएं समाप्त हो गईं। इसके बाद दोनों पक्ष तलाक के फैसले पर आगे विवाद न करने पर सहमत हो गए और उन्होंने हाईकोर्ट से केवल स्थायी गुजारा भत्ता तय करने का अनुरोध किया।

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