कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेंगलुरु में कोविड-19 महामारी के दौरान ड्यूटी निभाते हुए जान गंवाने वाले एक नोडल अधिकारी की विधवा की 50 लाख रुपये की बीमा मुआवजा याचिका पर फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य के प्रशासनिक तंत्र द्वारा मुआवजा याचिका खारिज करने के आदेश को निरस्त करते हुए ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (जीबीए) के मुख्य आयुक्त को निर्देश दिया है कि वे पीड़िता के नए आवेदन पर कानून के मुताबिक पुनर्मूल्यांकन कर निर्णय लें।
जस्टिस सूरज गोविंदराज की पीठ ने 29 वर्षीय याचिकाकर्ता मंजुश्री बी आर के दावे को खारिज करने वाले 19 जून 2024 के प्रशासनिक आदेश को रद्द कर दिया। मंजुश्री के पति 38 वर्षीय बाबू वी की मई 2021 में कोरोना संक्रमण के कारण मृत्यु हो गई थी। वह महामारी के दौरान बेंगलुरु के महादेवपुरा जोन स्थित गुंजूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में नोडल अधिकारी के पद पर तैनात थे।
अप्रत्यक्ष इलाज के आधार पर मुआवजा खारिज करना अनुचित
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी की नियुक्ति का स्वरूप नियमित था या मानदेय आधारित, इससे मुआवजे के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पीठ ने टिप्पणी की कि महामारी के दौरान नागरिक निकाय (तत्कालीन बृहत् बेंगलुरु महानगर पालिके या बीबीएमपी, जिसे 2025 में जीबीए द्वारा प्रतिस्थापित किया गया) ने विभिन्न विभागों से कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति की थी।
जस्टिस गोविंदराज ने कहा कि बागवानी विभाग में कार्यरत होने के बावजूद बाबू वी को बीबीएमपी द्वारा नोडल अधिकारी नियुक्त किया गया था। शासकीय कर्तव्यों के निष्पादन के दौरान ही वह संक्रमित हुए और उनकी मृत्यु हुई। ऐसे में संबंधित सरकारी विभाग या स्थानीय निकाय की यह जिम्मेदारी बनती है कि वह मृतक के परिवार को उचित मुआवजा प्रदान करे, न कि केवल इस तर्क पर राहत देने से मना करे कि वे सीधे मरीजों का इलाज नहीं कर रहे थे।
अप्रैल 2021 में तैनात किए गए थे नोडल अधिकारी
मामले के विवरण के अनुसार, बाबू वी 1997 से उद्योग एवं वाणिज्य विभाग में ‘जेनू कृषि सहायक’ कार्यक्रम के तहत मानदेय पर कार्यरत थे। वर्ष 2012 में उनका स्थानांतरण बागवानी विभाग में हुआ था। कोविड-19 महामारी के दौरान आधिकारिक आदेश जारी कर उन्हें गुंजूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में नोडल अधिकारी बनाकर भेजा गया था।
महादेवपुरा जोन के संयुक्त आयुक्त द्वारा जारी कार्य प्रमाण पत्र से पुष्टि होती है कि बाबू ने 1 अप्रैल से 28 अप्रैल 2021 तक नोडल अधिकारी के रूप में काम किया। उनकी जिम्मेदारियों में चिकित्सा अधिकारियों और तालुका स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ समन्वय स्थापित करना, कोविड संबंधी गतिविधियों की निगरानी करना तथा दैनिक रिपोर्ट जोनल कमिश्नर को सौंपना शामिल था।
तबीयत बिगड़ने के कारण बाबू ने 29 अप्रैल 2021 से काम पर जाना बंद कर दिया। 2 मई 2021 को उनकी रिपोर्ट कोरोना पॉजिटिव आई। इसके बाद 6 मई 2021 को उन्हें प्रशांत मल्टीस्पेशलिटी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसी दिन कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हो गया।
तीन साल बाद खारिज हुआ था दावा
पति के निधन के बाद मंजुश्री ने 25 मई, 31 मई और 1 जून 2021 को मुआवजा पाने के लिए आवेदन प्रस्तुत किए थे। याचिकाकर्ता के वकील जी आर मोहन ने अदालत में बताया कि केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के 28 मार्च 2020 के दिशानिर्देशों के तहत ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज’ की बीमा योजना का दायरा संविदा, आउटसोर्स, दिहाड़ी और राज्य द्वारा अधिगृहीत सभी कर्मचारियों पर लागू होता है। बाबू रोजाना स्वास्थ्य केंद्र में उपस्थित रहते थे और संदिग्ध रोगियों के संपर्क में आते थे।
इसके बावजूद, लगभग तीन साल तक आवेदन लंबित रखने के बाद बागवानी विभाग ने जून 2024 में यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया था कि बाबू सीधे कोविड मरीजों के इलाज में संलग्न नहीं थे।
अदालत के फैसले पर पीड़िता की प्रतिक्रिया
पति की मृत्यु से पहले गृहणी रहीं मंजुश्री अब अपने 9 साल के बेटे और सास-ससुर का भरण-पोषण करने के लिए लालबाग बॉटनिकल गार्डन में संविदा सहायक के रूप में काम कर रही हैं।
हाईकोर्ट के फैसले के बाद मंजुश्री ने कहा कि वे अदालत के निर्देश का पालन करते हुए जीबीए के समक्ष नया आवेदन जमा करेंगी। उन्होंने बताया कि वे पिछले तीन वर्षों से मुआवजे के लिए लगातार सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं और केवल वही मांग रही हैं जो केंद्र सरकार की योजना के तहत उनका न्यायसंगत अधिकार है। उन्हें उम्मीद है कि हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद जीबीए उनके आवेदन पर सकारात्मक निर्णय लेगा।

