सुप्रीम कोर्ट ने साल 2016 के एक सामूहिक दुष्कर्म मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति की उम्रकैद की सजा को घटाकर 20 साल कर दिया है। अदालत ने फैसला सुनाते समय दोषी की युवा उम्र और उसके सुधरने की संभावना को मुख्य आधार बनाया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने सोमवार को स्पष्ट किया कि दोषी जेल में मिलने वाली सजा की छूट (remission) का लाभ पाने का हकदार है। अपराध के समय दोषी की उम्र केवल 25 साल थी।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि दोषी का कोई पुराना आपराधिक इतिहास नहीं रहा है और लगभग 10 साल की कैद के दौरान जेल में उसका आचरण भी बेहतर रहा है। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य सरकार ऐसा कोई प्रमाण पेश करने में विफल रही जिससे यह साबित हो सके कि दोषी के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं बची है। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष ने भी जेल में दोषी के अच्छे व्यवहार से जुड़ी दलीलों का विरोध नहीं किया।
शीर्ष अदालत का यह निर्णय निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व के फैसलों में संशोधन करता है। इससे पहले, निचली अदालत ने दोषी को उसके स्वाभाविक जीवन के अंतिम क्षणों तक कठोर कारावास की सजा सुनाई थी और पीड़िता को 25,000 रुपये का जुर्माना देने का निर्देश दिया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा था।
साल 2016 की घटना का विवरण
यह मामला सितंबर 2016 का है। पीड़िता ने रात के समय दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास से एक रिक्शा लिया था। रिक्शा चालक ने उसे सुरक्षित घर पहुंचाने का भरोसा दिया था। हालांकि, घर ले जाने के बजाय वह उसे एक सुनसान जगह पर ले गया, जहां उसका एक साथी पहले से मौजूद था। इसके बाद दोनों ने पीड़िता के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। इस संबंध में 7 सितंबर 2016 को नई दिल्ली के आई.पी. एस्टेट पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।
न्यायिक दया और सजा पर अदालत की टिप्पणी
फैसला सुनाते समय सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि सामूहिक दुष्कर्म एक बेहद घिनौना अपराध है, जो न केवल पीड़ित के खिलाफ बल्कि पूरे समाज के विरुद्ध है। पीठ ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि पितृसत्तात्मक सोच को खत्म करने के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक प्रयासों के बावजूद इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। जजों ने कहा कि समय-समय पर कानूनों में किए गए संशोधनों के सकारात्मक परिणाम मिले हैं, लेकिन इन अपराधों को पूरी तरह खत्म करने की तत्परता में कोई कमी नहीं आनी चाहिए।
अदालत ने अपने फैसले में जिक्र किया कि दोषी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376D के तहत सजा दी गई थी, जिसे दिल्ली के निर्भया मामले के बाद साल 2013 के आपराधिक कानून संशोधन के जरिए कानून में शामिल किया गया था।
हालांकि, पूर्व जज जस्टिस के. रामास्वामी के एक कानूनी सिद्धांत का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि सजा सुनाने की प्रक्रिया में जरूरत के हिसाब से सख्ती और दया दोनों के बीच संतुलन होना चाहिए। दोषी की कम उम्र और साफ रिकॉर्ड को ध्यान में रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सजा में मिलने वाली छूट के लाभ के साथ 20 साल की कैद का फैसला न्यायसंगत होगा।

