सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बड़ा फैसला लेते हुए कहा कि वह केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) को ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले को देश भर में लागू करने का निर्देश देगा, जिसमें छात्रों के लिए ‘अपार’ (APAAR) आईडी बनाने के लिए माता-पिता को असहमति जताने या इस योजना से बाहर निकलने (ऑप्ट-आउट) का स्पष्ट विकल्प देने की बात कही गई है।
चीफ जस्टिस सूर्या कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने स्पष्ट किया कि चूंकि केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में आए ओडिशा हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी है, इसलिए अब इस आदेश को देश भर के सभी स्कूलों के लिए लागू किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि वह जल्द ही इस संबंध में एक विस्तृत लिखित आदेश जारी करेगा और सीबीएसई से सहमति और छात्र डेटा सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने को कहेगा।
क्या है अपार आईडी योजना?
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 के तहत केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू की गई ‘ऑटोमेटेड परमानेंट एकेडमिक अकाउंट रजिस्ट्री’ (APAAR) योजना के अंतर्गत प्रत्येक छात्र को 12 अंकों की एक विशिष्ट और स्थायी आईडी दी जाती है। इसे एक तरह का डिजिटल शैक्षणिक पासपोर्ट माना गया है, जिसमें छात्र के अंकपत्र, डिग्री और सह-पाठ्यचर्या संबंधी सभी उपलब्धियां एक ही जगह सुरक्षित रखी जाती हैं।
कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की दलीलें
अभिषेक बख्शी और चार अन्य छात्रों के माता-पिता की ओर से दायर याचिका में इस योजना की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि आधार-लिंक्ड शैक्षणिक पहचान पत्र और डेटा प्रोसेसिंग की यह पूरी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14, 19, 21 और 21A का उल्लंघन करती है और केंद्र सरकार के कार्यकारी अधिकारों की सीमा से बाहर है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट में दलील दी कि सरकार भले ही इस योजना को स्वैच्छिक बता रही है, लेकिन स्कूल प्रशासन व्यावहारिक रूप से इसे अनिवार्य बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि अपार आईडी को आधार से लिंक किया गया है, जिसके चलते बच्चों को न चाहते हुए भी आधार कार्ड बनवाना पड़ रहा है।
वरिष्ठ वकील ने 2019 के ऐतिहासिक के.एस. पुट्टास्वामी (आधार) मामले का हवाला देते हुए कहा कि बच्चों के लिए आधार अनिवार्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि शिक्षा पाना बच्चों का मौलिक अधिकार है और बोर्ड परीक्षाओं में बैठने के लिए इसे आधार या अपार आईडी से जोड़ना असंवैधानिक है।
डेटा सुरक्षा कानून का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं ने दलील दी कि वर्तमान व्यवस्था डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीडी) एक्ट, 2023 के प्रावधानों का भी उल्लंघन करती है। इंदिरा जयसिंह के अनुसार, वर्तमान सहमति पत्र (कंसेंट फॉर्म) एकतरफा समझौते जैसा है, जिसमें माता-पिता के पास शुरुआत में ही असहमति दर्ज कराने का कोई वास्तविक विकल्प नहीं होता।
उन्होंने कोर्ट से मांग की कि सीबीएसई और स्कूलों को डेटा प्रोटेक्शन एक्ट की धारा 6 के तहत सख्त दिशानिर्देशों का पालन करने का निर्देश दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने बच्चों के डेटा को हमेशा के लिए स्टोर किए जाने पर चिंता जताते हुए ‘भूल जाने के अधिकार’ (राइट टू बी फॉरगॉटेन) के तहत सहमति वापस लेने की सुविधा देने की मांग की।
प्रशासनिक लाभ और कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने इस योजना के प्रशासनिक फायदों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि हर देशव्यापी कदम को संदेह की नजर से नहीं देखा जाना चाहिए और यह एक प्रगतिशील पहल है। चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि इस डिजिटल रजिस्ट्री से शिक्षा अधिकारियों को छात्रों का सटीक रिकॉर्ड रखने, पाठ्यक्रम लागू करने और शिक्षक-छात्र अनुपात जैसे महत्वपूर्ण मानकों की निगरानी करने में मदद मिलेगी।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सीबीएसई का कोई भी सर्कुलर देश के डेटा प्रोटेक्शन कानून से ऊपर नहीं हो सकता और उसे इस कानून के दायरे में ही काम करना होगा।
हाईकोर्ट के फैसले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला दिसंबर 2025 में आए ओडिशा हाईकोर्ट के उस फैसले पर आधारित है, जिसमें शिक्षा मंत्रालय को सहमति पत्र में बदलाव करने का आदेश दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर सहमति पत्र में बाहर निकलने (ऑप्ट-आउट) का विकल्प नहीं है, तो सरकार का इसे स्वैच्छिक कहना पूरी तरह विरोधाभासी है और यह निजता के अधिकार का हनन है। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि छात्र को बाद में सहमति वापस लेने का अधिकार देना, शुरुआत में ही असहमति दर्ज करने के अधिकार का विकल्प नहीं हो सकता।

