सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या (मुख्य न्यायाधीश सहित) को 34 से बढ़ाकर 38 करने से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विधेयक सोमवार को लोकसभा में पेश किया जाएगा। यह नया कानून उस सरकारी अध्यादेश का स्थान लेगा जिसके जरिए शीर्ष अदालत में पांच नए न्यायाधीशों की नियुक्ति पहले ही की जा चुकी है।
इस विधेयक को पारित कराने के लिए किसी संविधान संशोधन की आवश्यकता नहीं है और इसे सामान्य बहुमत के जरिए ही पारित किया जा सकता है। हालांकि, विपक्षी दलों द्वारा इस कदम का कड़ा विरोध किए जाने के आसार हैं। लोकसभा ने विपक्ष के उस सांविधिक संकल्प (Statutory Resolution) को स्वीकार कर लिया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 की नामंजूरी की मांग की गई है।
संसदीय समय-सीमा की बड़ी चुनौती
संसदीय नियमों के अनुसार, जब भी सरकार किसी मौजूदा अध्यादेश को बदलने के लिए संसद में विधेयक लाती है, तो विपक्षी सदस्य उस अध्यादेश के विरोध में सांविधिक संकल्प पेश करते हैं।
अध्यादेश एक ऐसी आपातकालीन कार्यकारी व्यवस्था है जिसका उपयोग सरकार संसद के सत्र में न होने पर कानून बनाने के लिए करती है। लेकिन इसकी समय-सीमा बेहद सीमित होती है। पूर्व केंद्रीय कानून सचिव पी. के. मल्होत्रा के अनुसार, किसी भी अध्यादेश की अधिकतम अवधि छह महीने होती है, लेकिन संसद का सत्र शुरू होने के बाद इसे छह सप्ताह यानी 42 दिनों के भीतर पारित कराना अनिवार्य होता है। ऐसा न होने पर अध्यादेश स्वतः ही निष्प्रभावी हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस विस्तार की पृष्ठभूमि इसी साल मई महीने में तैयार हुई थी, जब केंद्रीय कैबिनेट ने जजों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। इसके तुरंत बाद सरकार ने इस फैसले को लागू करने के लिए अध्यादेश जारी कर दिया था, जिससे शीर्ष अदालत में पांच जजों की त्वरित नियुक्ति का रास्ता साफ हुआ।
कैसे तय होती है जजों की संख्या?
देश की सर्वोच्च अदालत में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की एक तय प्रशासनिक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया की शुरुआत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा केंद्रीय कानून एवं न्याय मंत्री को भेजी जाने वाली सिफारिश से होती है। कानून मंत्रालय के तहत आने वाला न्याय विभाग इस प्रस्ताव पर वित्त मंत्रालय के साथ चर्चा करता है। इसके बाद एक मसौदा विधेयक तैयार कर मंजूरी के लिए केंद्रीय कैबिनेट के समक्ष पेश किया जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 124(3) के तहत सुप्रीम कोर्ट का जज बनने के लिए उम्मीदवार का भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है। योग्यता के अन्य पैमानों में उम्मीदवार का कम से कम पांच साल तक किसी उच्च न्यायालय का जज होना, या न्यूनतम 10 वर्षों तक अधिवक्ता के रूप में वकालत करना, अथवा राष्ट्रपति की नजर में एक प्रतिष्ठित न्यायविद् होना जरूरी है।
शीर्ष अदालत का ऐतिहासिक सफर
सुप्रीम कोर्ट के विस्तार का एक लंबा विधायी इतिहास रहा है। साल 1956 में जब मूल सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम लागू हुआ था, तब मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर जजों की अधिकतम संख्या केवल 10 निर्धारित की गई थी।
इसके बाद 1960 में इस संख्या को संशोधित कर 13 किया गया, और बाद के एक अन्य संशोधन के जरिए इसे बढ़ाकर 17 किया गया। वर्ष 1986 में मुख्य न्यायाधीश के अलावा न्यायाधीशों के स्वीकृत पदों को बढ़ाकर 25 और फिर साल 2009 में इसे 30 कर दिया गया। इस नए विधेयक से पहले जजों की संख्या में आखिरी बार बदलाव वर्ष 2019 में किया गया था, जब स्वीकृत पदों को 30 से बढ़ाकर 33 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) किया गया था।

