किरायेदारी के दीवानी विवाद को दिया गया ‘अपराधिक रंग’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट के तहत जारी समन आदेश को रद्द किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत एक अपीलकर्ता के खिलाफ जारी समन आदेश और चार्जशीट को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किरायेदारी और किराये को लेकर मूल रूप से दीवानी प्रकृति के एक विवाद को “आपराधिक रंग” दिया गया था। जस्टिस संतोष राय की एकल पीठ ने इस अपील पर निर्णय देते हुए इस बात पर विशेष जोर दिया कि आपराधिक कार्यवाही का उपयोग उत्पीड़न, उत्पीड़न के साधन या व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के लिए नहीं किया जाना चाहिए, विशेषकर तब जब विवाद मुख्य रूप से दीवानी प्रकृति का हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जिला बुलंदशहर के खुर्जा नगर थाना क्षेत्र में स्थित आर्य समाज मंदिर परिसर के पास एक दुकान पर 12 मार्च, 2023 को हुई एक कथित घटना से जुड़ा है। शिकायतकर्ता (विपक्षी संख्या 2) मंदिर का किरायेदार था, जबकि अपीलकर्ता ललित कुमार (ललित आर्य के नाम से भी ज्ञात) मंदिर के कैशियर के रूप में कार्यरत था।

इस कथित घटना के एक साल से अधिक समय बाद, 9 अप्रैल, 2024 को एक प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई गई थी। इसमें अपीलकर्ता ललित कुमार, विवेक सोनकर, विजय सोलंकी, मनोज सोलंकी और विजेंद्र सिंह सहित पांच नामजद और पांच से छह अज्ञात लोगों को आरोपी बनाया गया था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि आरोपियों ने उसके साथ मारपीट की और उसकी दुकान पर जातिसूचक शब्द (“चमार”) का इस्तेमाल कर अपमानित किया।

हालांकि, जांच पूरी करने के बाद जांच अधिकारी को अन्य नामजद आरोपियों के खिलाफ कोई विश्वसनीय सबूत नहीं मिला और उन्होंने केवल अपीलकर्ता ललित कुमार के खिलाफ ही चार्जशीट दाखिल की। इसके बाद, बुलंदशहर के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) ने 8 जुलाई, 2024 को सत्र वाद संख्या 916/2024 (मामला अपराध संख्या 290/2024) में समन आदेश जारी किया था। अपीलकर्ता ने इसी समन आदेश और चार्जशीट को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि कथित घटना के एक साल से अधिक समय बाद एफआईआर दर्ज कराई गई थी और इस देरी का कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दिया गया, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी अत्यधिक संदिग्ध हो जाती है। वकील ने यह भी रेखांकित किया कि एफआईआर में कई लोगों को नामजद करने के बावजूद चार्जशीट केवल अपीलकर्ता के खिलाफ ही पेश की गई। यह तर्क दिया गया कि चूंकि पीड़ित मंदिर का किरायेदार था और अपीलकर्ता वहां कैशियर था, इसलिए मंदिर के किरायेदारी संबंधी विवाद की पुरानी रंजिश के कारण अपीलकर्ता को झूठा फंसाया गया है।

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दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व कर रहे सरकारी वकील (एजीए) ने अपील का कड़ा विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री, विशेष रूप से दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 161 के तहत दर्ज पीड़ित के बयान से अपीलकर्ता के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। सरकारी वकील ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी या अन्य सह-आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट न दाखिल होने मात्र से शुरुआती चरण में मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, क्योंकि आरोपों से संज्ञेय अपराध प्रकट होते हैं।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और नजीरें

अदालत के रिकॉर्ड की समीक्षा करने के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष एफआईआर दर्ज कराने में हुई एक साल से अधिक की देरी का कोई संतोषजनक कारण बताने में पूरी तरह विफल रहा। अदालत ने यह भी नोट किया कि पीड़ित उसी मंदिर में किराया जमा करता था जहां अपीलकर्ता कैशियर था, जिससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों के बीच किरायेदारी को लेकर पुरानी रंजिश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) की वैधानिक आवश्यकताओं का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि इन धाराओं के तहत अपराध तभी बनता है जब घटना “सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले स्थान” (पब्लिक व्यू) पर हुई हो और उसका उद्देश्य पीड़ित को केवल उसकी जाति के कारण अपमानित करना रहा हो। इस मामले में कोर्ट ने पाया कि कथित घटना शिकायतकर्ता की दुकान के पास हुई थी।

हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों का सहारा लिया:

  • स्वर्ण सिंह बनाम स्टेट (2008): सुप्रीम कोर्ट ने “सार्वजनिक स्थान” और “सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले स्थान” के बीच अंतर स्पष्ट किया था। अदालत ने माना था कि यदि कोई निजी स्थान भी लोगों को दिखाई देता है, तो वह “सार्वजनिक रूप से दिखाई देने वाले स्थान” के दायरे में आ सकता है। हालांकि, केवल गाली-गलौज या झगड़े से, जब तक कि अपमानित करने का विशिष्ट इरादा न हो, एससी/एसटी एक्ट के प्रावधान लागू नहीं होते।
  • गोरीगे पेंटैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2009): इस मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि: “जब शिकायत में अपराध के बुनियादी तत्व ही गायब हों, तो ऐसी शिकायत को जारी रखने की अनुमति देना और अपीलकर्ता को आपराधिक मुकदमे की लंबी प्रक्रिया का सामना करने के लिए मजबूर करना पूरी तरह से अनुचित होगा, जो कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
  • हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति में किसी निजी घर या परिसर के भीतर संपत्ति को लेकर हुआ विवाद एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) के वैधानिक मानदंडों को पूरा नहीं करता है।
  • इंदर मोहन गोस्वामी बनाम उत्तरांचल राज्य (2008) और गंगा धर कलिता बनाम असम राज्य (2015): इन फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमों का उपयोग व्यक्तिगत रंजिश निकालने या किसी दीवानी विवाद में दबाव बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। मूल रूप से दीवानी प्रकृति के मामले को “अपराधिक रंग” देना कानून की प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है।
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इन सिद्धांतों को लागू करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“पक्षों के बीच का विवाद मुख्य रूप से किरायेदारी के दीवानी मामले से उपजा है, और ऐसा प्रतीत होता है कि आपराधिक कार्यवाही इसी विवाद की पृष्ठभूमि में शुरू की गई है।”

अदालत ने आगे कहा:

“जाति आधारित जानबूझकर किए गए अपमान के किसी विशिष्ट आरोप के अभाव में, जो एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानों को आकर्षित करे, इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना कानून की प्रक्रिया के दुरुपयोग के समान होगा।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत आवश्यक तत्व प्रथम दृष्टया स्थापित नहीं होते हैं, इसलिए बुलंदशहर की विशेष अदालत द्वारा जारी समन आदेश और चार्जशीट कानून की नजर में टिकने योग्य नहीं हैं।

तदनुसार, हाईकोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए बुलंदशहर के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) द्वारा 8 जुलाई, 2024 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया गया कि वे इस आदेश की प्रति जिला एवं सत्र न्यायाधीश, महोबा के माध्यम से संबंधित अदालत को एक सप्ताह के भीतर ईमेल या फैक्स द्वारा भेजें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: ललित कुमार उर्फ ललित आर्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 4147/2026
पीठ: जस्टिस संतोष राय
निर्णय की तिथि: 16 जुलाई, 2026

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