पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में ससुराल वालों के पास रह रहे तीन साल के बच्चे को तुरंत उसकी मां को सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि एक गर्भवती महिला को उसके पहले बच्चे से अलग करना बेहद गंभीर क्रूरता है। जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि इतनी कम उम्र के बच्चे का कल्याण मुख्य रूप से मां की देखरेख में ही हो सकता है।
कोर्ट ने स्थानीय पुलिस को निर्देश दिया है कि वह बच्चे को सुरक्षित रूप से उसकी मां को सौंपना सुनिश्चित करे और इस प्रक्रिया के पूरा होने के एक सप्ताह के भीतर अनुपालन हलफनामा दाखिल करे। इसके साथ ही, अदालत ने मां को निर्देश दिया है कि वह बच्चे के कल्याण और परिवार की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पिता को भी मुलाकात का उचित अवसर प्रदान करे।
दहेज उत्पीड़न और जबरन अलगाव के आरोप
याचिकाकर्ता महिला के वकील अरुण अब्रोल ने अदालत को बताया कि उनकी मुवक्किल ने अगस्त 2021 में प्रेम विवाह किया था। शादी के बाद दोनों पक्षों के माता-पिता से सुरक्षा के लिए इस जोड़े को अदालत की शरण भी लेनी पड़ी थी। मई 2023 में इस दंपति को एक बेटा हुआ।
महिला का आरोप है कि शादी के तुरंत बाद ही ससुराल वालों ने उसे दहेज के लिए प्रताड़ित करना शुरू कर दिया था। उसने दावा किया कि उसका पति नशे का आदी था और दिसंबर 2025 में काम के सिलसिले में दुबई चला गया। घरेलू कलह अत्यधिक बढ़ जाने के कारण महिला मार्च 2026 में अपने बेटे के साथ ससुराल छोड़ने को मजबूर हो गई।
महिला ने याचिका में बताया कि उसके पति ने दुबई से फोन कर उसके पिता और भाई को जान से मारने की धमकी दी, जिसके डर से वह चार दिन बाद ही वापस ससुराल लौट आई। लेकिन वहां ससुराल वालों ने उसे धमकाकर जबरन घर से निकाल दिया और बच्चे को अपने पास रख लिया। महिला ने तुरंत पुलिस को इसकी सूचना दी और अप्रैल 2026 में महिला हेल्पलाइन नंबर 181 पर भी शिकायत की, लेकिन अदालत का रुख करने से पहले बच्चे को वापस दिलाने के लिए कोई प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की गई।
ससुराल पक्ष के तर्क और कानूनी आपत्तियां
दूसरी तरफ, पति और उसके परिवार के वकील रितेश पांडेय ने इन आरोपों को खारिज करते हुए दावा किया कि महिला जनवरी 2026 में अपने पति के विदेश जाने के समय खुद ही बच्चे को छोड़कर चली गई थी। उन्होंने दलील दी कि बच्चा एक अच्छे स्कूल में पढ़ रहा है और संयुक्त परिवार में उसकी पूरी देखरेख की जा रही है।
ससुराल पक्ष ने यह भी दलील दी कि याचिकाकर्ता महिला की मां का निधन हो चुका है और उसके मायके में कोई अन्य महिला सदस्य नहीं है। चूंकि महिला इस समय दोबारा गर्भवती है, इसलिए वह बच्चे की देखभाल करने में सक्षम नहीं होगी। इसके अलावा, उन्होंने इस बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका की वैधता को चुनौती देते हुए कहा कि पिता के खिलाफ ऐसी याचिका दायर नहीं की जा सकती। उन्होंने दलील दी कि महिला को कस्टडी के लिए हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 या संरक्षक और प्रतिपालक अधिनियम, 1890 के तहत कानूनी रास्ता अपनाना चाहिए।
पारिवारिक रिश्तों पर हाईकोर्ट की टिप्पणी
जस्टिस जसजीत सिंह बेदी ने इन तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि ससुराल पक्ष के पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो कि मां अपने बच्चे की परवरिश करने के योग्य नहीं है। अदालत ने कहा कि केवल महिला के दोबारा गर्भवती होने या आर्थिक रूप से निर्भर होने को आधार बनाकर उसे बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता, दादी, चाचा या चाची में से कोई भी इतनी छोटी उम्र के बच्चे की देखभाल उस तरह नहीं कर सकता, जिस तरह एक मां कर सकती है।

