परिसीमन विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से किया इनकार, याचिकाकर्ता ने वापस ली अर्जी

सुप्रीम कोर्ट ने देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के लिए जनसंख्या का आधार तय करने वाले 84वें और 87वें संविधान संशोधनों को चुनौती देने वाली जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने स्पष्ट किया कि नागरिकों के वोट देने के अधिकार का परिसीमन प्रक्रिया से कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद, याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस ले ली, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।

चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने स्पष्ट किया कि निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय करने से किसी भी नागरिक का मताधिकार प्रभावित नहीं होता है। चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि परिसीमन, जनगणना या ऐसी ही किसी अन्य प्रक्रिया से किसी भी योग्य व्यक्ति का चुनाव लड़ने का अधिकार नहीं छिनता, बशर्ते वह संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत तय की गई कानूनी शर्तों को पूरा करता हो।

पुरानी जनगणना के आधार पर परिसीमन का विरोध

यह याचिका हरियाणा के झज्जर निवासी निशांत खत्री ने दायर की थी। याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि 84वें और 87वें संविधान संशोधन संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करते हैं। इन संशोधनों के अनुसार, लोकसभा सीटों के लिए 1971 की जनगणना और विधानसभा सीटों के लिए 2001 की जनगणना को आधार माना गया है।

याचिकाकर्ता का कहना था कि देश के मूल संविधान के मुताबिक, विधायिका में प्रतिनिधित्व नवीनतम जनगणना के आंकड़ों पर आधारित होना चाहिए। लेकिन वर्तमान संशोधनों के कारण 1971 के बाद पैदा हुए देश के करीब 70 प्रतिशत नागरिक इस प्रतिनिधित्व व्यवस्था से व्यावहारिक तौर पर बाहर हो गए हैं। अपनी दलील के समर्थन में उन्होंने गुरुग्राम का उदाहरण दिया, जो 1971 में महज 50 से 60 हजार की आबादी वाला एक छोटा कस्बा था, लेकिन आज इसकी आबादी बढ़कर लगभग 25 लाख हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि नोएडा और मोहाली जैसे आधुनिक शहरों का तो 1971 में अस्तित्व ही नहीं था।

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वोट का मूल्य और संघीय ढांचा

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि बड़े पैमाने पर हुए जनसांख्यिकीय बदलावों के कारण नागरिकों के व्यक्तिगत वोट का मूल्य कम हो गया है, जो संविधान की प्रस्तावना में निहित राजनीतिक न्याय के सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य” के खिलाफ है।

इस तर्क का उत्तर देते हुए जस्टिस जोयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय स्तर पर कुल आबादी के मुकाबले वोट की कीमत भले ही कम दिखाई दे, लेकिन भारतीय संघीय ढांचे के तहत राज्यों के स्तर पर वोट का मूल्य कम नहीं होता है। इसके साथ ही जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि देश का कोई भी नागरिक अपनी गृह सीट (डोमिसाइल) के बाहर भी किसी अन्य निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

मामले को सीधे खारिज करने के बजाय, सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को सलाह दी कि वे अपनी चिंताओं और आपत्तियों को सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के समक्ष रखें। कोर्ट के इस रुख को देखते हुए याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे पीठ ने मंजूर कर लिया।

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