इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक पारिवारिक अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है जिसमें व्यभिचार (अडल्ट्री) और आत्मनिर्भर होने के आधार पर एक पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया गया था। इसके साथ ही, कोर्ट ने नाबालिग बच्चे के मासिक भरण-पोषण भत्ते में बढ़ोतरी का निर्देश दिया है। जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की एकल पीठ ने क्रिमिनल रिवीजन याचिका का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 की धारा 125(4) के तहत, यदि कोई पत्नी व्यभिचार में रह रही है तो वह वित्तीय सहायता पाने की हकदार नहीं रह जाती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि पति की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नाबालिग बच्चे के लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई राशि बहुत कम थी और इसे बढ़ाया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद बुलंदशहर के अपर प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय कोर्ट संख्या 3 द्वारा 6 मई 2025 को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दायर एक भरण-पोषण मामले में पारित आदेश से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में पत्नी (रिवीजनकर्ता संख्या 1) की भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया था, जबकि पति (विपक्षी संख्या 2) को अपने नाबालिग बच्चे (रिवीजनकर्ता संख्या 2) के लिए 3,000 रुपये प्रति माह देने का निर्देश दिया था।
इस फैसले से नाखुश होकर रिवीजनकर्ताओं ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका तर्क था कि निचली अदालत ने अपने क्षेत्राधिकार और न्यायिक विवेक का सही इस्तेमाल नहीं किया, पत्नी की याचिका को गलत तरीके से खारिज किया और बच्चे के लिए बेहद मामूली भरण-पोषण राशि तय की।
पक्षों की दलीलें
रिवीजनकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने पत्नी की मांग को दो ऐसे आधारों पर खारिज किया जो कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं। पहला यह कि वह काम करने वाली महिला है और अपना गुजारा करने में सक्षम है, और दूसरा यह कि वह व्यभिचार में रह रही है। वकील का कहना था कि ये निष्कर्ष किसी ठोस या विश्वसनीय सबूत पर आधारित नहीं थे, बल्कि केवल पति की मौखिक गवाही पर भरोसा करके निकाले गए थे, जो कि झूठी थी। वहीं नाबालिग बच्चे के संबंध में तर्क दिया गया कि पति की आर्थिक स्थिति को देखते हुए 3,000 रुपये प्रति माह की राशि बेहद कम है। पति पहले एक पेट्रोल पंप पर काम करता था और अब एक एटीएम कंपनी में कार्यरत है, जहां उसने अपनी गाड़ी भी लीज पर दे रखी है जिससे उसे अतिरिक्त आय होती है।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पेश अपर सरकारी अधिवक्ता (एजीए) ने ट्रायल कोर्ट के फैसले का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने कहा कि यह फैसला सबूतों के उचित मूल्यांकन के बाद लिया गया था। एजीए ने पति के बयान का हवाला दिया, जिसमें उसने खुद अपनी पत्नी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखने की बात कही थी। उस व्यक्ति की पहचान और पता भी कोर्ट को बताया गया था। चूंकि जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) के दौरान इस गवाही को गलत साबित करने वाली कोई बात सामने नहीं आई, इसलिए ट्रायल कोर्ट का पति के बयान को विश्वसनीय मानना बिल्कुल सही था। एजीए ने जोर दिया कि पत्नी का व्यभिचार में रहना भरण-पोषण की मांग खारिज करने का एकमात्र और मजबूत कानूनी आधार है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड का अध्ययन करने के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि पत्नी के संबंध में परिवार न्यायालय का फैसला पूरी तरह से सबूतों के अनुकूल था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“ट्रायल कोर्ट ने बिल्कुल सही माना है कि रिवीजनकर्ता संख्या 1 के पास अपना भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त साधन हैं और वह व्यभिचार में रह रही थी।”
हाईकोर्ट ने आगे कहा:
“उक्त निष्कर्ष मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन पर आधारित हैं और इनमें कोई ऐसी त्रुटि, अवैधता या गंभीर अनियमितता नहीं है, जिसके कारण इस कोर्ट को अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए हस्तक्षेप करने की आवश्यकता पड़े।”
हालांकि, नाबालिग बच्चे के भरण-पोषण के संबंध में हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की मांग को जायज पाया। पति के एटीएम कंपनी में नौकरी करने और गाड़ी लीज पर देकर अतिरिक्त आय अर्जित करने की बात को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने निर्णय दिया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई 3,000 रुपये की राशि अपर्याप्त थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“…जहां तक रिवीजनकर्ता संख्या 2 को दिए जाने वाले भरण-पोषण का सवाल है, इस कोर्ट का यह मानना है कि विपक्षी संख्या 2 की स्वीकृत आर्थिक स्थिति और कमाने की क्षमता को देखते हुए, ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई भरण-पोषण की राशि अपर्याप्त है।”
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश में संशोधन करते हुए नाबालिग बच्चे के लिए मासिक भरण-पोषण राशि को 3,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये कर दिया। इसी संशोधन के साथ आपराधिक पुनरीक्षण याचिका का निपटारा किया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: श्रीमती P बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 3487/2025
पीठ: जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला
निर्णय की तिथि: 8 जुलाई, 2026

