वयस्क जोड़ों की शादी की जांच पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, जौनपुर एसपी से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दो वयस्कों की आपसी सहमति से हुई शादी की पड़ताल करने को लेकर उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने जौनपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) को निर्देश दिया है कि वह स्पष्ट करें कि एक कथित अपहरण मामले में पुलिस द्वारा अंतिम रिपोर्ट (फाइनल रिपोर्ट) सौंपे जाने के बाद भी लड़के के पिता को बार-बार थाने क्यों बुलाया जा रहा है।

जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की पीठ ने 30 जून को दिए अपने आदेश में टिप्पणी की कि बार-बार याद दिलाए जाने के बावजूद बालिग जोड़ों के अपनी मर्जी से विवाह करने के मामलों में पुलिस की दिलचस्पी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि पुलिस का काम अपराधों की जांच करना है, न कि लोगों की शादियों की पड़ताल करना।

यह मामला साल 2024 में इस जोड़े द्वारा दायर एक याचिका से जुड़ा है। उस समय पति के खिलाफ अपहरण की एफआईआर दर्ज होने के बाद दंपति ने सुरक्षा की गुहार लगाई थी। तत्कालीन सुनवाई के दौरान एक अन्य पीठ ने दर्ज किया था कि दोनों बालिग हैं, उन्होंने अपनी मर्जी से शादी की है और विवाह के पंजीकरण के लिए ऑनलाइन आवेदन भी किया है। कोर्ट ने तब पुलिस जांच में सहयोग करने की शर्त पर दोनों की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।

अब हाईकोर्ट ने पाया है कि मामले में अंतिम रिपोर्ट दाखिल होने के बावजूद पुलिस लड़के के पिता को परेशान कर रही है। कोर्ट ने इसे प्रथम दृष्टया अवैध मानते हुए संबंधित पुलिस अधिकारियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। इसके साथ ही, जौनपुर के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सीजेएम) को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश की प्रति तुरंत एसपी और संबंधित थाना प्रभारी (एसएचओ) को भेजें ताकि वे कोर्ट के सामने अपना रुख स्पष्ट कर सकें।

अपराध पकड़ें, जोड़ों के पीछे न भागें: हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी

इससे पहले भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन द्वारा आपसी सहमति से शादी करने वाले जोड़ों को परेशान करने के रवैये पर गहरी चिंता जताई थी। 21 अप्रैल को जस्टिस जे. जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने लड़की के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एक एफआईआर को रद्द कर दिया था।

उस फैसले में कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि किसी भी बालिग व्यक्ति को अपनी मर्जी से रहने और जीवन साथी चुनने का पूरा अधिकार है और किसी तीसरे पक्ष को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई हक नहीं है। पीठ ने आगाह किया था कि ऐसे मामलों में एफआईआर दर्ज करना और जोड़ों का पीछा करना कानूनन गलत है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी अवैध कार्रवाई करके पुलिस न केवल समाज का नुकसान कर रही है, बल्कि कुछ मामलों में यह खुद पुलिस अधिकारियों की तरफ से किया गया अपराध भी माना जा सकता है।

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