पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के उस अधिकार को सही ठहराया है जिसके तहत वह भर्ती में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा निर्धारित न्यूनतम मानकों से अधिक योग्यता या चयन मानदंड तय कर सकती है। हाईकोर्ट ने राज्य में केमिस्ट्री विषय के 123 कॉलेज-कैडर असिस्टेंट प्रोफेसर पदों की भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस हरप्रीत सिंह ब्रार ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह नियोक्ता का विशेषाधिकार है कि वह केवल न्यूनतम अर्हता रखने वालों के बजाय उपलब्ध प्रतिभाओं में से सर्वश्रेष्ठ का चयन करे। हालांकि, एक अन्य समन्वय पीठ (कोऑर्डिनेट बेंच) के पुराने फैसले के साथ इस मामले में विरोधाभास को देखते हुए, अदालत ने इससे जुड़े प्रमुख कानूनी सवालों को बड़ी बेंच के पास भेज दिया है।
याचिकाकर्ता की उम्मीदों को झटका और कोर्ट का रुख
यह याचिका रेनू कुमारी रोहल द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने हरियाणा लोक सेवा आयोग (एचपीएससी) द्वारा अगस्त 2024 में जारी विज्ञापन और केमिस्ट्री के 123 असिस्टेंट प्रोफेसर पदों की चयन प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने प्रारंभिक स्क्रीनिंग टेस्ट तो पास कर लिया था, लेकिन विषय ज्ञान परीक्षा (सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट) में उन्हें 52 अंक मिले, जो कि निर्धारित अर्हता अंक 52.5 से महज 0.5 अंक कम थे।
हाईकोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जो उम्मीदवार बिना किसी आपत्ति के पूरी चयन प्रक्रिया में शामिल होता है, वह परिणाम अनुकूल न आने पर बाद में उस प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकता। अदालत ने याचिका को इस आधार पर भी सुनवाई योग्य नहीं माना क्योंकि याचिकाकर्ता ने हरियाणा सरकार के 11 नवंबर 2022 के उस ज्ञापन (मेमो) को चुनौती नहीं दी थी, जिसके तहत यूजीसी के नियमों को कुछ संशोधनों के साथ राज्य में अपनाया गया था।
यूजीसी नियमों और राज्य के अधिकारों पर बहस
याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए वकील आर. एन. लोहान ने दलील दी कि असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर नियुक्तियां यूजीसी विनियम, 2018 के तहत होनी चाहिए, जिन्हें हरियाणा सरकार ने भी स्वीकार किया है। उन्होंने तर्क दिया कि यूजीसी नियमों के मुताबिक भर्ती की प्रक्रिया एक चयन समिति द्वारा की जानी चाहिए, लेकिन राज्य सरकार ने नियमों में बदलाव करके चयन मानदंड तय करने का अधिकार एचपीएससी को सौंप दिया, जो कि कानून के खिलाफ है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ‘मनदीप सिंह’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि यूजीसी के नियम राज्यों के लिए बाध्यकारी हैं।
याचिकाकर्ता के वकील ने यह भी कहा कि यूजीसी के नियम असिस्टेंट प्रोफेसर पद के लिए अलग से लिखित परीक्षा कराने की बात नहीं कहते। उम्मीदवार के विषय ज्ञान का मूल्यांकन पहले ही राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा के जरिए यूजीसी द्वारा किया जा चुका होता है, इसलिए अलग से सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट लेने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसके अतिरिक्त, उन्होंने सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट में न्यूनतम 35 प्रतिशत अंक लाने की शर्त को मनमाना बताते हुए कहा कि हाईकोर्ट पहले ही ‘आशा रानी बनाम हरियाणा राज्य’ मामले में ऐसी ही एक शर्त को रद्द कर चुका है।
दूसरी तरफ, हरियाणा का पक्ष रखते हुए डिप्टी एडवोकेट जनरल हरीश नैन ने इन दलीलों का विरोध किया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का ‘मनदीप सिंह’ फैसला इस मामले में लागू नहीं होता क्योंकि वह पंजाब द्वारा यूजीसी नियमों को अपनाने से जुड़ा था। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि याचिकाकर्ता ने 11 नवंबर 2022 की उस सरकारी अधिसूचना को चुनौती नहीं दी जिसके तहत संशोधनों के साथ यूजीसी नियमों को अपनाया गया था, और वह परीक्षा में फेल होने के बाद ही अदालत पहुंची हैं। सरकारी वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता ने इस चयन प्रक्रिया को केवल इसलिए चुनौती दी है क्योंकि वह इसमें असफल रहीं।
बड़ी बेंच तय करेगी कानूनी सवाल
हाईकोर्ट ने अपने निष्कर्षों में स्पष्ट किया कि स्क्रीनिंग टेस्ट या सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट आयोजित करना यूजीसी के नियमों का उल्लंघन नहीं है। जस्टिस ब्रार ने कहा कि यूजीसी के नियम केवल एक न्यूनतम आधार तय करते हैं, न कि संस्थागत उत्कृष्टता हासिल करने के रास्ते में कोई अधिकतम सीमा लगाते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस भर्ती विज्ञापन में इंटरव्यू की प्रक्रिया को खत्म नहीं किया गया है, बल्कि योग्यता और प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट के बाद सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट को जोड़ा गया है। यह व्यवस्था यूजीसी के ढांचे को कमजोर करने के बजाय उसे और मजबूत बनाती है क्योंकि इससे न्यूनतम पात्रता शर्तों में कोई कमी नहीं आती।
चयन मानदंडों को लेकर अदालतों के पिछले फैसलों में आपसी मतभेद को सुलझाने के लिए जस्टिस ब्रार ने दो महत्वपूर्ण सवालों को बड़ी बेंच के पास भेजने का निर्णय लिया। रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया है कि वह इस मामले को एक्टिंग चीफ जस्टिस के समक्ष प्रस्तुत करे ताकि इसके लिए एक उपयुक्त बेंच का गठन किया जा सके। बड़ी बेंच के समक्ष भेजे गए सवाल निम्नलिखित हैं:
पहला, क्या राज्य सरकार यूजीसी नियमों में निर्धारित शर्तों से अधिक उच्च और कठिन योग्यताएं तय कर सकती है, जिसमें स्क्रीनिंग और सब्जेक्ट नॉलेज टेस्ट शामिल हैं?
दूसरा, क्या राज्य कानूनी रूप से यूजीसी के नियमों को उनके मूल रूप में पूरी तरह अपनाने के लिए बाध्य हैं?

