गुमला बच्ची गुमशुदगी मामला: झारखंड हाईकोर्ट सख्त, लापरवाह पुलिस अधिकारियों पर कार्रवाई की रिपोर्ट तलब

झारखंड हाईकोर्ट ने गुमला जिले में वर्ष 2018 में छह साल की मासूम बच्ची के लापता होने के मामले में पुलिस की कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ा निर्देश जारी करते हुए कहा है कि वह वर्ष 2018 से 2022 के बीच गुमला में तैनात रहे पुलिस अधीक्षकों (एसपी) और जांच अधिकारियों (आईओ) के खिलाफ की गई कार्रवाई की विस्तृत रिपोर्ट पेश करे। इसके साथ ही, अदालत ने मामले की मुख्य आरोपी का नार्को टेस्ट कराने और उसकी रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर रखने का भी आदेश दिया है।

जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश जारी किए। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 17 अगस्त की तारीख तय की है।

गुजरात में होगा आरोपी का नार्को टेस्ट

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने खंडपीठ को सूचित किया कि मामले की मुख्य आरोपी सुखमनी उरांव का नार्को टेस्ट कराने की अनुमति गुमला के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत से मिल चुकी है।

यह नार्को टेस्ट गुजरात के गांधीनगर स्थित फोरेंसिक साइंस निदेशालय (डीएफएस) में आगामी 3 अगस्त से 11 अगस्त के बीच किया जाएगा। सरकारी वकील ने बताया कि आरोपी को कड़ी सुरक्षा के बीच गुजरात ले जाने के लिए पुलिस की एक विशेष टीम तैयार की गई है, जो अपनी निगरानी में उसे वहां लेकर जाएगी। हाईकोर्ट ने सरकार को इस टेस्ट की रिपोर्ट अगली सुनवाई तक अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने को कहा है।

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सालों तक फाइलों में दबी रही जांच

यह पूरा मामला गुमला जिले के खोरा गांव का है, जहां सितंबर 2018 में याचिकाकर्ता की छह साल की बेटी संदिग्ध परिस्थितियों में लापता हो गई थी। बच्ची के परिजनों ने साल 2019 में पुलिस में प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज कराई थी, लेकिन लंबे समय तक पुलिस ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया और न ही बच्ची का कोई सुराग लगाया जा सका।

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सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, इस गंभीर मामले में वास्तविक जांच साल 2022 में जाकर शुरू हो सकी। पुलिस की इस ढिलाई के कारण बच्ची के गायब होने और मामले की सक्रिय जांच शुरू होने के बीच कई साल का लंबा अंतर आ गया।

मानव तस्करी की आशंका

स्थानीय पुलिस की जांच में कोई प्रगति न होते देख, बच्ची की मां चंद्रमुनी उरांव ने सितंबर 2025 में हाईकोर्ट का रुख किया और एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। याचिका में मां ने आशंका जताई है कि उनकी बेटी को मानव तस्करों द्वारा निशाना बनाया गया हो सकता है। इसी याचिका पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने मामले की जांच में हुई अत्यधिक देरी पर स्थानीय पुलिस प्रशासन की जवाबदेही तय करने के कड़े निर्देश दिए हैं।

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