दुर्ग के डॉक्टर पर जिलाबदर की कार्रवाई रद्द: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कहा- केवल लंबित मामलों के आधार पर नहीं छीन सकते नागरिक के अधिकार

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने दुर्ग के एक डॉक्टर को उनके गृह जिले और छह पड़ोसी जिलों से एक वर्ष के लिए जिलाबदर करने के प्रशासन के आदेश को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि केवल आपराधिक मामलों के लंबित होने को किसी नागरिक के मौलिक अधिकारों पर इस तरह के कड़े प्रतिबंध का आधार नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि प्रशासन यह साबित न कर दे कि वह व्यक्ति सार्वजनिक सुरक्षा के लिए एक वास्तविक खतरा है।

चीफ जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकलपीठ ने दुर्ग के जिला मजिस्ट्रेट द्वारा 8 जनवरी को डॉ. दुष्यंत खोसला के खिलाफ जारी जिलाबदर के आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही अदालत ने राज्य के गृह विभाग के उस 7 मई के आदेश को भी अवैध घोषित कर दिया, जिसमें डॉक्टर की अपील खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिलाबदर एक बेहद गंभीर कदम है जो सीधे तौर पर नागरिक की स्वतंत्रता, रहने और आजीविका कमाने के अधिकारों को प्रभावित करता है, इसलिए इसमें कानूनी प्रक्रियाओं का कड़ाई से पालन होना अनिवार्य है।

प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन

हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए और कहा कि इस मामले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों की पूरी तरह अनदेखी की गई। अदालत ने पाया कि प्रशासन ने डॉक्टर को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर ही नहीं दिया। 26 दिसंबर 2025 को तैयार किया गया आधिकारिक नोटिस डॉ. खोसला को 1 जनवरी को तामील कराया गया, जो कि सुनवाई के लिए उपस्थित होने का अंतिम दिन था।

इस देरी के कारण, जब तक डॉक्टर को नोटिस मिला, तब तक स्थानीय प्रशासन उनकी अनुपस्थिति में ही गवाहों के बयान दर्ज कर चुका था। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि डॉ. खोसला को न तो अपने खिलाफ मौजूद सबूतों की जांच करने का मौका दिया गया और न ही गवाहों से जिरह करने या अपने बचाव में साक्ष्य पेश करने की अनुमति मिली।

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पुलिस के आरोपों में ठोस सबूतों की कमी

यह मामला दुर्ग के पुलिस अधीक्षक (एसपी) की 24 सितंबर 2025 की एक रिपोर्ट से शुरू हुआ था। रिपोर्ट में अहिवारा में ‘साई क्लीनिक’ चलाने वाले डॉ. खोसला को आदतन अपराधी बताते हुए आरोप लगाया गया था कि वे जनता और सरकारी कर्मचारियों को डराते-धमकाते हैं। पुलिस ने वर्ष 2010 से 2025 के बीच डॉक्टर के खिलाफ दर्ज पांच आपराधिक मामलों का हवाला दिया था, जिसमें जैन संतों के खिलाफ कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का एक मामला भी शामिल था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इन पांच मामलों में से तीन का निपटारा पहले ही हो चुका है और केवल दो मामले लंबित हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉक्टर को किसी भी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है। अदालत ने कहा कि पुलिस के आरोप बेहद सामान्य थे और वे यह साबित करने में विफल रहे कि डॉक्टर के डर से कोई गवाह सार्वजनिक रूप से गवाही देने से कतरा रहा था।

राज्य सरकार की दलीलें खारिज

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सरकारी वकीलों ने जिलाबदर की कार्रवाई का बचाव करते हुए तर्क दिया था कि डॉ. खोसला की गतिविधियां स्थानीय शांति के लिए लगातार खतरा बनी हुई थीं। राज्य ने दलील दी कि जिलाबदर एक सुरक्षात्मक कदम है न कि दंडात्मक, और यह जिला मजिस्ट्रेट की संतुष्टि पर आधारित होता है जिसमें अपराध के पूर्ण प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि जिला मजिस्ट्रेट का आदेश पर्याप्त साक्ष्यों के बिना जारी किया गया था और पूरी प्रक्रिया में कानूनी नियमों की अनदेखी की गई। इस फैसले के बाद डॉ. खोसला के दुर्ग में रहने और अपनी चिकित्सा सेवा जारी रखने के अधिकार पूरी तरह बहाल हो गए हैं। अदालत ने इस मामले में किसी भी पक्ष पर अदालती खर्च नहीं लगाया है।

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