बेटे के इलाज के लिए विदेश जाना जीवन के अधिकार का हिस्सा, एमपी हाईकोर्ट ने आरोपी पिता को रूस जाने की दी अनुमति

बीमार और दिव्यांग बच्चे के इलाज के लिए माता-पिता का विदेश जाना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का ही एक हिस्सा है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने इस आधार पर धोखाधड़ी के मामले का सामना कर रहे एक रूसी नागरिक को अपने बीमार बेटे की देखभाल के लिए रूस जाने की मंजूरी दे दी। जस्टिस पवन कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने इस मामले में निचली अदालत के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें आरोपी की विदेश यात्रा की याचिका खारिज कर दी गई थी।

समय पर पासपोर्ट वापस करने का निर्देश

हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता गौरव अहलावत को 23 जून से 16 अगस्त तक रूस यात्रा की अनुमति दी है। अदालत ने निर्देश दिया कि यात्रा अवधि के लिए उनका पासपोर्ट अस्थायी रूप से जारी किया जाए। अदालत ने साफ तौर पर कहा कि किसी बीमार बच्चे की देखभाल के लिए पिता द्वारा की गई जरूरी अपील को बिना सोचे-समझे या हल्के में खारिज नहीं किया जा सकता।

बच्चे की गंभीर चिकित्सकीय स्थिति

दस्तावेजों के मुताबिक, गौरव अहलावत का बेटा बचपन से ही कई गंभीर शारीरिक और मानसिक बीमारियों से पीड़ित है। वह ‘रेसिड्यूअल ऑर्गेनिक डैमेज’, ‘हाइपरटेंसिव-हाइड्रोसिफेलिक सिंड्रोम’ (उप-मुआवजा चरण), मानसिक मंदता और ‘मिनिमल सेरेब्रल डिस्फंक्शन’ के कारण पूरी तरह से दिव्यांग है। वह वर्तमान में अपनी मां के साथ रूस में रहता है, जहां उनकी सहायता के लिए कोई दूसरा रिश्तेदार मौजूद नहीं है। रूस के एक प्रमुख चिकित्सा संस्थान ‘एलएलसी रीसेंटर समारा’ के चिल्ड्रन्स डिपार्टमेंट ऑफ न्यूरोलॉजी एंड रिफ्लेक्सोलॉजी ने बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए 25 जून से 10 अगस्त के बीच एक विशेष पुनर्वास (रिहैबिलिटेशन) कोर्स की सिफारिश की थी।

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आपराधिक मामला और जमानत की शर्तें

अहलावत भारत में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 316(5), 318(4) और 61(2) के तहत धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और साजिश के आरोपों का सामना कर रहे हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान याचिका केवल उनकी विदेश यात्रा की अनुमति से जुड़ी है और इसका मुख्य आपराधिक मामले की खूबियों या कमियों से कोई लेना-देना नहीं है।

इससे पहले निचली अदालत और हाईकोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद अहलावत ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। सुप्रीम कोर्ट ने 26 सितंबर 2025 को उन्हें अंतरिम राहत दी थी, जिसके बाद 23 जनवरी को उन्हें अग्रिम जमानत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पासपोर्ट सरेंडर करने का आदेश दिया था, लेकिन साथ ही यह छूट भी दी थी कि वे जरूरत के समय विदेश जाने के लिए निचली अदालत में आवेदन कर सकते हैं।

हाईकोर्ट ने क्यों दी राहत

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अहलावत ने कोर्ट की सभी शर्तों का पालन करते हुए 3 फरवरी को अपना पासपोर्ट जमा करा दिया था। इसके बाद 27 अप्रैल को निचली अदालत ने उन्हें एक बार रूस जाने की इजाजत दी थी, जहां से वे तय समय सीमा में वापस लौट आए और 11 मई को अपना पासपोर्ट दोबारा जमा करा दिया।

लेकिन जब उन्होंने बेटे के इलाज के लिए दूसरी बार रूस जाने की अनुमति मांगी, तो निचली अदालत ने 22 मई को याचिका खारिज कर दी। जांच अधिकारी ने दलील दी थी कि आरोपी एक विदेशी नागरिक है, इसलिए उसके वापस लौटने की संभावना कम है।

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हाईकोर्ट ने इस फैसले को खारिज करते हुए कहा कि निचली अदालत ने मरीज के चिकित्सकीय दस्तावेजों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया। जस्टिस द्विवेदी ने रेखांकित किया कि अहलावत के बुजुर्ग और बीमार पिता भारत में ही रहते हैं और पूर्व में भी याचिकाकर्ता ने कोर्ट के सभी आदेशों का पूरी तरह पालन किया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए उनके फरार होने की कोई आशंका नहीं दिखती। हाईकोर्ट के निर्देशानुसार, अहलावत को रूस से लौटने के बाद 17 से 18 अगस्त के बीच अपना पासपोर्ट दोबारा निचली अदालत को सौंपना होगा।

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