मेघालय हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज पॉक्सो (POCSO) मामले को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि उसे जेल भेजने से उसकी पत्नी और बच्चे के साथ बड़ा अन्याय होगा। कोर्ट ने पाया कि दोनों अब शादीशुदा हैं, उनका एक बच्चा है और वे अपने परिवारों के समर्थन से एक खुशहाल जीवन जी रहे हैं।
जस्टिस बी भट्टाचार्य ने मामले की सुनवाई के बाद 7 जुलाई को यह आदेश जारी किया। कोर्ट ने 23 वर्षीय पत्नी की उस सहमति को दर्ज किया, जो उन्होंने बिना किसी दबाव या डर के स्वेच्छा से दी थी। गौरतलब है कि जब इस रिश्ते की शुरुआत हुई थी, तब वह नाबालिग थीं।
पारिवारिक कल्याण पर कोर्ट का जोर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि चूंकि दोनों परिवारों ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया है और उनका एक बच्चा भी है, ऐसे में पति को सलाखों के पीछे भेजने से न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि इस हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ने से महिला और उनके बच्चे को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।
महिला ने कोर्ट में एक हलफनामा (अफेडेविट) दाखिल कर बताया कि वह अपने पति और बेटी के साथ बेहद खुश है। उसने कहा कि उसका पति पूरी जिम्मेदारी से उन दोनों की देखभाल कर रहा है और वह अपनी पूरी जिंदगी उसी के साथ बिताना चाहती है।
कैसे शुरू हुआ कानूनी विवाद
यह पूरा मामला नवंबर 2018 का है, जब उस समय नाबालिग रही इस युवती को प्रसव के लिए शिलांग के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। वहां बच्चे के जन्म के समय, एक रिश्तेदार ने पुलिस में एफआईआर (FIR) दर्ज कराई। इस शिकायत में बताया गया था कि कम उम्र में ही दोनों ने शादी कर ली थी और उनके परिवारों ने इस रिश्ते को स्वीकार कर लिया था। हालांकि, लड़की के नाबालिग होने के कारण पुलिस को कानूनन पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज करना पड़ा।
पुलिस जांच के बाद मामले में चार्जशीट दाखिल की गई और आरोपी ने विशेष पॉक्सो कोर्ट के सामने खुद को बेगुनाह बताया। इस बीच, दोनों ने एक चर्च में औपचारिक रूप से शादी कर ली और उनके घर एक बेटी ने जन्म लिया। इसके बाद, इस आपराधिक मामले को पूरी तरह खत्म कराने के लिए उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
अदालत में दलीलें और अंतिम फैसला
सुनवाई के दौरान पति के वकील आर दत्ता ने दलील दी कि यह रिश्ता पूरी तरह से आपसी सहमति और समझ पर आधारित था। उन्होंने कोर्ट को बताया कि रिश्तेदारों के दबाव में आकर लड़की की इच्छा के विरुद्ध यह एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
बचाव पक्ष के वकील ने मेघालय हाईकोर्ट के ही एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि असाधारण परिस्थितियों में पॉक्सो मामले को रद्द किया जा सकता है। राज्य सरकार के अभियोजक (प्रॉसिक्यूटर) ने भी इस याचिका का विरोध नहीं किया, जिसके बाद कोर्ट ने मामले को खारिज करने का अंतिम आदेश जारी कर दिया।

