833 किलो गांजा तस्करी मामला: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पांच लोगों को किया बरी, मुख्य आरोपी के कस्टडी से भागने पर DRI प्रमुख को जांच के आदेश

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 833 किलोग्राम गांजे की तस्करी के मामले में पांच लोगों को बरी कर दिया है। इन आरोपियों को निचली अदालत ने 15 साल तक के सश्रम कारावास की कड़ी सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने मामले की जांच करने वाली केंद्रीय एजेंसी ‘डायरेक्टरेट ऑफ रेवेन्यू इंटेलिजेंस’ (DRI) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं और उसकी जांच को “लापरवाही और उदासीनता” से भरा हुआ बताया। इसके साथ ही, कोर्ट ने एजेंसी की कस्टडी से मुख्य आरोपी के फरार होने के मामले पर सख्त रुख अपनाते हुए नई दिल्ली स्थित डीआरआई के महानिदेशक (DG) को जांच के निर्देश दिए हैं।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 1 जुलाई को आरोपियों की ओर से दायर अपीलों पर यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने रायपुर की विशेष एनडीपीएस कोर्ट द्वारा 25 जुलाई 2024 और 17 नवंबर 2025 को दिए गए उन फैसलों को पूरी तरह पलट दिया, जिसके तहत आरोपियों को सजा दी गई थी। सजा पाने वालों में अक्टूबर 2021 में हुई कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार चार आरोपी और फरवरी 2025 में पकड़ा गया ट्रक मालिक शामिल है।

हिरासत से मुख्य आरोपी का फरार होना बेहद गंभीर

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस बात पर गहरा आश्चर्य और नाराजगी जताई कि तस्करी का मुख्य आरोपी DRI के दफ्तर से ही भागने में सफल रहा। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि व्यावसायिक मात्रा (कमर्शियल क्वांटिटी) में ड्रग्स की तस्करी का मुख्य आरोपी जांच एजेंसी के परिसर से ही भाग जाता है, तो यह एजेंसी के भीतर सतर्कता, निगरानी और अनुशासन के पूरी तरह ध्वस्त होने को दिखाता है। कोर्ट ने कहा कि असाधारण शक्तियों वाले अधिकारियों का ऐसा लापरवाह रवैया बेहद चिंताजनक है।

संदेह के घेरे में आई जब्ती और जांच प्रक्रिया

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यह मामला 3 अक्टूबर 2021 को शुरू हुआ था, जब गरियाबंद के तौरेंगा फॉरेस्ट चेक पोस्ट पर एक ट्रक को रोका गया था। DRI का दावा था कि आंध्र प्रदेश से उत्तर प्रदेश के मथुरा जा रहे इस ट्रक में मुरमुरे की बोरियों के नीचे 833.271 किलोग्राम गांजा छिपाकर ले जाया जा रहा था। एजेंसी के मुताबिक, इस ट्रक को आगे चल रही एक एक्सयूवी कार रास्ता दिखा रही थी, जिसमें अन्य आरोपी सवार थे।

हाईकोर्ट ने पाया कि इस पूरी कार्रवाई में बुनियादी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। जांच अधिकारियों ने मौके पर कोई पंचनामा, जब्ती मेमो (seizure memo) या घटना स्थल का नक्शा तैयार नहीं किया। इसके बजाय, वे ट्रक को घटनास्थल से करीब 160 किलोमीटर दूर रायपुर स्थित अपने दफ्तर ले गए और वहां जाकर कागजी कार्रवाई पूरी की। अदालत ने कहा कि इतनी दूरी पर ले जाकर तलाशी और जब्ती करने से पूरी कार्रवाई की निष्पक्षता पर गंभीर संदेह पैदा होता है और रास्ते में सबूतों के साथ छेड़छाड़ की आशंका बनी रहती है।

एनडीपीएस एक्ट के अनिवार्य नियमों का उल्लंघन

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि DRI अधिकारियों ने एनडीपीएस (NDPS) एक्ट की धारा 42, 52-ए और 57 के तहत अनिवार्य कानूनी सुरक्षा उपायों की अनदेखी की। ये कानूनी प्रावधान जांच अधिकारियों के लिए शुरुआती खुफिया जानकारी दर्ज करने, मजिस्ट्रेट के सामने जब्त नशीले पदार्थों के नमूने (सैंपलिंग) तैयार करने और अपने वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत जब्ती की रिपोर्ट भेजने को जरूरी बनाते हैं। हाईकोर्ट ने कहा कि इन नियमों की अनदेखी से सबूतों की कड़ी (chain of custody) टूट गई, जिससे सरकारी दस्तावेज बेहद संदिग्ध हो गए। कोर्ट ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट भी इन नियमों के पालन को अनिवार्य घोषित कर चुका है।

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डीआरआई महानिदेशक को जांच और सुधार के आदेश

इन गंभीर खामियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैसले की कॉपी तुरंत नई दिल्ली स्थित DRI महानिदेशक को भेजने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने महानिदेशक को इस मामले की जांच की निगरानी करने वाले सभी जिम्मेदार अधिकारियों के आचरण और मुख्य आरोपी के कस्टडी से भागने की परिस्थितियों की गहन विभागीय जांच कराने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय कर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने को कहा गया है। कोर्ट ने DRI प्रमुख को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे एजेंसी की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करें और अधिकारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण आयोजित करें ताकि भविष्य में ऐसी जांच पूरी निष्पक्षता और कड़े कानूनी नियमों के तहत की जा सके।

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