2018 के संशोधन के बाद कॉन्ट्रैक्ट का स्पेसिफिक परफॉर्मेंस अनिवार्य राहत है, यह अब कोर्ट का विवेकाधिकार नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि विशिष्ट अनुतोष अधिनियम (स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट), 1963 में साल 2018 के संशोधन के बाद, किसी अनुबंध का विशिष्ट अनुपालन (स्पेसिफिक परफॉर्मेंस) कराना अब अदालतों का विवेकाधीन अधिकार नहीं रह गया है, बल्कि यह एक अनिवार्य राहत है जिसे अदालतों को लागू करना ही होगा, बशर्ते वह कानून के वैधानिक अपवादों के अंतर्गत न आता हो। जस्टिस संदीप जैन ने एक विक्रेता की ओर से दायर प्रथम अपील को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया। विक्रेता ने ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें उसे अपनी आवासीय-सह-व्यावसायिक संपत्ति की सेल डीड खरीदार के पक्ष में निष्पादित करने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने डिक्री की पुष्टि करते हुए स्पष्ट किया कि एक बार रजिस्टर्ड एग्रीमेंट और बयाना राशि का भुगतान साबित हो जाने पर, और खरीदार द्वारा अपनी निरंतर तत्परता तथा इच्छा प्रदर्शित करने के बाद, कॉन्ट्रैक्ट को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद मूल वाद संख्या 9 वर्ष 2022 से शुरू हुआ, जिसे वादी गणेश प्रसाद ने प्रतिवादी तुषार अग्रवाल के खिलाफ सिविल जज (सीनियर डिवीजन) भदोही, ज्ञानपुर की अदालत में दायर किया था। वादी के अनुसार, अग्रवाल संत रविदास नगर जिले के पूरे गुलाब गांव में अराजी नंबर 1 पर बने एक दोमंजिला भवन (मकान नंबर 1, ज्ञानपुर रोड के सामने, क्षेत्रफल 2184 वर्ग फीट या 202.973 वर्ग मीटर) का मालिक था।

अग्रवाल को अपने व्यवसाय विस्तार और व्यक्तिगत खर्चों के लिए धन की तत्काल आवश्यकता थी, जिसके लिए उसने प्रसाद से संपर्क किया। संपत्ति का कुल सौदा 30 लाख रुपये में तय हुआ, जिसमें से प्रसाद ने 30 दिसंबर 2019 को अकाउंट पेयी चेक के जरिए 20 लाख रुपये बयाना राशि (अर्नेस्ट मनी) के रूप में दिए। उसी दिन एक रजिस्टर्ड एग्रीमेंट टू सेल निष्पादित किया गया, जिसमें शर्त थी कि शेष 10 लाख रुपये के भुगतान पर तीन साल के भीतर सेल डीड निष्पादित कर दी जाएगी।

बार-बार व्यक्तिगत अनुरोध और कई कानूनी नोटिस (अंतिम नोटिस 11 सितंबर 2021 को भेजा गया, जो 14 सितंबर 2021 को तामील हुआ) के बावजूद, अग्रवाल ने रजिस्ट्री करने से टालमटोल की। जब प्रसाद को पता चला कि अग्रवाल संपत्ति को किसी तीसरे पक्ष को बेचने की कोशिश कर रहा है, तो उसने विशिष्ट अनुपालन के लिए मुकदमा दायर कर दिया और कोर्ट में अपनी निरंतर तत्परता व इच्छा की बात दोहराई।

ट्रायल कोर्ट ने 11 मार्च 2025 को प्रसाद के पक्ष में डिक्री पारित करते हुए अग्रवाल को दो महीने के भीतर सेल डीड निष्पादित करने और कब्जा सौंपने का आदेश दिया। अग्रवाल ने इस निर्णय को सीपीसी की धारा 96 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (अग्रवाल) के वरिष्ठ अधिवक्ता श्री प्रमोद जैन ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला टिकने योग्य नहीं है। उन्होंने कहा कि दोनों के बीच साल 2013 से चांदी के व्यापार का संबंध था और प्रसाद ने इसी विश्वास का फायदा उठाकर धोखाधड़ी से यह एग्रीमेंट कराया। उन्होंने दावा किया कि यह संपत्ति अग्रवाल का एकमात्र निवास और दुकान है जिसकी कीमत 2 करोड़ रुपये से अधिक है, इसलिए इसे केवल 30 लाख रुपये में बेचने का सौदा असंभव प्रतीत होता है।

अग्रवाल ने यह भी दावा किया कि उन्हें बयाना राशि के रूप में 20 लाख रुपये कभी नहीं मिले, बल्कि यह राशि उनके चांदी के व्यवसाय के चल रहे लेनदेन से संबंधित थी। उन्होंने तर्क दिया कि प्रसाद के पास वित्तीय क्षमता नहीं थी, क्योंकि शुरुआत में उन्होंने कम कोर्ट फीस के साथ मुकदमा दायर किया था। उन्होंने राम सिंह बनाम सुघर सिंह, सीताराम बनाम राधेश्याम और सी.एस. वेंकटेश बनाम ए.एस.सी. मूर्ति जैसे फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि विशिष्ट अनुपालन एक विवेकाधीन राहत है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।

दूसरी ओर, प्रतिवादी (प्रसाद) के वकील श्री विजय कुमार ओझा ने दलील दी कि एक रजिस्टर्ड समझौते की कानूनी वैधता की मजबूत धारणा होती है। उन्होंने साबित किया कि 20 लाख रुपये प्रसाद के व्यक्तिगत बचत खाते से अग्रवाल के खाते में भेजे गए थे, जबकि उनके व्यापारिक लेनदेन हमेशा फर्म के खातों के माध्यम से होते थे और जीएसटी पोर्टल पर दर्ज थे।

2 करोड़ रुपये के मूल्यांकन के दावे को खारिज करने के लिए उन्होंने साल 2021 के एक अपंजीकृत समझौते की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत की, जिसके तहत अग्रवाल ने इसी संपत्ति को मनीष कुमार जयसवाल को 50 लाख रुपये में बेचने का सौदा किया था। उन्होंने बैंक रिकॉर्ड पेश कर दिखाया कि प्रसाद के खाते में लगातार 10 लाख रुपये से अधिक का बैलेंस था, जिससे उनकी वित्तीय क्षमता साबित होती है। अंत में, उन्होंने तर्क दिया कि 2018 के बाद विशिष्ट अनुपालन अनिवार्य हो चुका है।

कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने समझौते के निष्पादन, बयाना राशि के भुगतान, व्यावसायिक लेनदेन की प्रकृति और प्रसाद की तत्परता तथा इच्छा जैसे प्रमुख बिंदुओं का गहराई से विश्लेषण किया।

रजिस्टर्ड एग्रीमेंट के निष्पादन और धोखाधड़ी के आरोपों पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक पंजीकृत दस्तावेज की कानूनी पवित्रता और वैधता की मजबूत धारणा होती है। सुप्रीम कोर्ट के प्रेम सिंह बनाम बीरबल, रतन सिंह बनाम निर्मल गिल और शराफत अली बनाम डिप्टी डायरेक्टर ऑफ कंसोलिडेशन हरिद्वार जैसे मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की: “यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि एक पंजीकृत बिक्री विलेख (रजिस्टर्ड सेल डीड) के साथ वैधता और वास्तविकता की एक मजबूत धारणा जुड़ी होती है। पंजीकरण केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक गंभीर कार्य है जो दस्तावेज को उच्च स्तर की पवित्रता प्रदान करता है।”

कोर्ट ने पाया कि अग्रवाल धोखाधड़ी साबित करने में पूरी तरह विफल रहे। उन्होंने न तो एग्रीमेंट को रद्द करने का कोई मुकदमा दायर किया और न ही अपनी बात के समर्थन में अपने गवाह अरुण कुमार जयसवाल का बयान दर्ज कराया।

20 लाख रुपये के लेनदेन पर कोर्ट ने बैंक खातों और जीएसटी इनवॉइस का मिलान किया। कोर्ट ने पाया कि दोनों पक्षों की फर्मों के व्यावसायिक खातों और प्रसाद के व्यक्तिगत बचत खाते में स्पष्ट अंतर था, जिससे बयाना राशि का भुगतान किया गया था। कोर्ट ने अग्रवाल के उस दावे को खारिज कर दिया जिसमें उन्होंने इस राशि को चांदी की रिफाइनिंग के लेबर चार्ज के रूप में प्राप्त करना बताया था, क्योंकि इसके समर्थन में उन्होंने कोई आईटीआर या जीएसटी रिटर्न दाखिल नहीं किया था।

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विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 16(सी) के तहत प्रसाद की तत्परता और इच्छा के संबंध में कोर्ट ने अपीलकर्ता की तकनीकी आपत्तियों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ के सैयद दस्तगीर बनाम टी.आर. गोपालकृष्ण शेट्टी मामले का हवाला देते हुए कहा: “इसलिए ‘तत्परता और इच्छा’ (Readiness and Willingness) का अनुपालन केवल शब्दों और प्रारूप में नहीं, बल्कि भावना और सार में होना चाहिए। किसी कानून के सटीक शब्दों को यांत्रिक रूप से प्रस्तुत करने पर जोर देना, सार के बजाय प्रारूप पर जोर देना है। इसलिए, यदि सार पहले ही स्पष्ट कर दिया गया है, तो प्रारूप की अनुपस्थिति उस सार को समाप्त नहीं कर सकती।”

कोर्ट ने नोट किया कि प्रसाद के बैंक खाते में लगातार 10 लाख रुपये से अधिक का बैलेंस उनकी वित्तीय क्षमता को साबित करता है। कोर्ट फीस में मामूली और अस्थायी कमी, जिसे बाद में तुरंत सुधार लिया गया था, उनकी तत्परता को कम नहीं करती। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता द्वारा पेश किया गया राम सिंह का मामला अब कानून की नजर में सही नहीं है, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सुघर सिंह बनाम हरि सिंह मामले में इसे उलट दिया था।

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कोर्ट के विवेकाधिकार पर चर्चा करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि यह समझौता साल 2019 में निष्पादित हुआ था, इसलिए 1 अक्टूबर 2018 से प्रभावी विशिष्ट अनुतोष अधिनियम के संशोधित प्रावधान इस मामले में पूरी तरह लागू होते हैं। सुप्रीम कोर्ट के बी. संतोषम्मा बनाम डी. सरला मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा: “एसआरए की धारा 10 में संशोधन के बाद, ‘किसी अनुबंध का विशिष्ट अनुपालन, अदालत के विवेक पर, लागू किया जा सकता है’ शब्दों को ‘अनुबंध का विशिष्ट अनुपालन लागू किया जाएगा’ शब्दों से प्रतिस्थापित कर दिया गया है। अदालत अब एसआरए की धारा 11 की उपधारा (2), धारा 14 और धारा 16 के प्रावधानों के अधीन अनुबंध के विशिष्ट अनुपालन को लागू करने के लिए बाध्य है। संशोधन के बाद, अनुबंध के विशिष्ट अनुपालन की राहत अब विवेकाधीन नहीं रह गई है।”

अंतिम निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि प्रसाद ने रजिस्टर्ड समझौते के निष्पादन, 20 लाख रुपये की बयाना राशि के भुगतान और अपनी निरंतर तत्परता तथा इच्छा को सफलतापूर्वक साबित किया है। कोर्ट ने अग्रवाल की कठिनाई (hardship) की दलील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह कठिनाई विक्रेता के अपने कृत्यों के कारण उत्पन्न हुई है, क्योंकि वह संपत्ति के आवासीय और व्यावसायिक उपयोग से पूरी तरह अवगत होने के बावजूद इस समझौते में शामिल हुआ था।

ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई त्रुटि न पाते हुए, हाईकोर्ट ने अपील को खारिज कर दिया और निचली अदालत के आदेश की पुष्टि की। कोर्ट ने अपीलकर्ता को निर्देश दिया कि वह शेष 10 लाख रुपये प्राप्त करने के बाद दो महीने के भीतर खरीदार के पक्ष में सेल डीड निष्पादित करे। यदि अपीलकर्ता ऐसा करने में विफल रहता है, तो खरीदार अदालत में शेष राशि जमा कर कोर्ट के माध्यम से रजिस्ट्री कराने का हकदार होगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: तुषार अग्रवाल बनाम गणेश प्रसाद
वाद संख्या: फर्स्ट अपील संख्या 388 वर्ष 2025
पीठ: जस्टिस संदीप जैन
निर्णय की तिथि: 06.07.2026

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