सरकारी परियोजनाओं के लिए पूजा स्थलों का भी अधिग्रहण कर सकती है सरकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि सरकार जनहित की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए धार्मिक संपत्तियों और पूजा स्थलों का अधिग्रहण करने का संप्रभु अधिकार रखती है। इसके साथ ही अदालत ने वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के विस्तार के लिए दालमंडी सड़क पर स्थित छह प्राचीन मस्जिदों के अधिग्रहण को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया।

जस्टिस जे जे मुनीर और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 सरकार के ‘इमीनेंट डोमेन’ यानी भूमि अधिग्रहण के संप्रभु अधिकार में बाधा नहीं बनता है। कोर्ट ने कहा कि उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 (भूमि अधिग्रहण कानून) के तहत, सरकार को सड़क, राजमार्ग या अन्य जनोपयोगी बुनियादी ढांचे के निर्माण जैसे व्यापक जनहित के कार्यों के लिए किसी भी भूमि का अधिग्रहण करने का पूरा अधिकार है।

दालमंडी सड़क सौंदर्यीकरण परियोजना

यह कानूनी विवाद मुख्य रूप से दालमंडी बाजार क्षेत्र में काम करने वाले दुकानदारों और किराएदारों द्वारा शुरू किया गया था। यह बाजार काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 800 मीटर पूर्व में स्थित है। याचिकाकर्ताओं ने अपनी दुकानों और घरों को तोड़े जाने से बचाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि इन छह ऐतिहासिक मस्जिदों के अधिग्रहण और उनके स्वरूप में किसी भी तरह के बदलाव से 1991 के कानून का उल्लंघन होगा।

राज्य सरकार का यह अधिग्रहण क्षेत्र के बड़े शहरी विकास और सौंदर्यीकरण कार्यक्रम का हिस्सा है। 31 मार्च 2025 और 30 जुलाई 2025 को जारी सरकारी आदेशों के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने दालमंडी सड़क को चौड़ा करने और इसके सौंदर्यीकरण के लिए 21,588.24 लाख रुपये का बजट आवंटित किया है।

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उपासना स्थल अधिनियम का दायरा

याचिकाकर्ताओं का दावा था कि प्रभावित छह मस्जिदें—अंजुमन इंतजामिया मस्जिद, मस्जिद रंगीले शाह, मस्जिद अली रज़ा खान, मस्जिद करीमुल्ला बेग, मस्जिद निसारन और मस्जिद संगमरमर—देश की आजादी से पहले की हैं। इसलिए इन्हें 1991 के विशेष अधिनियम के तहत पूरी सुरक्षा हासिल है, जो 15 अगस्त 1947 को मौजूद सभी धार्मिक स्थलों के स्वरूप को बनाए रखने की गारंटी देता है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए इसे कानून की गलत व्याख्या करार दिया। खंडपीठ ने सरकार के इस तर्क पर सहमति जताई कि 1991 का अधिनियम देश की सीमाओं के भीतर किसी भी भूमि पर राज्य के सर्वोच्च मालिकाना हक को कम नहीं करता है। सरकार जनहित में किसी भी भूमि का अधिग्रहण कर सकती है, बशर्ते प्रभावित पक्षों को उचित कानून के तहत न्यायसंगत मुआवजा दिया जाए।

किराएदारों को चुनौती देने का अधिकार नहीं

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अदालत ने याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं को इस आधार पर भी खारिज कर दिया कि वे केवल किराएदार और दुकानदार हैं। कोर्ट के अनुसार, किराएदारों के पास भूमि अधिग्रहण की इस कानूनी प्रक्रिया को चुनौती देने का कोई अधिकार (लीगल स्टैंडिंग) नहीं है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह निर्णय राज्य सरकार, वक्फ बोर्ड या संबंधित मस्जिदों के मुतवल्लियों (ट्रस्टियों) के कानूनी अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना लिया गया है। ये पक्ष जरूरत पड़ने पर भविष्य में कानून के अनुसार उचित मंच पर अपनी बात रखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। वर्तमान याचिकाकर्ताओं के पास मांगी गई राहत पाने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।

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