लिमिटेशन (समय-सीमा) कानून के सख्त पालन को स्पष्ट करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने एक 38 साल पुराने अपंजीकृत (अन-रजिस्टर्ड) ‘एग्रीमेंट टू सेल’ (बिक्री समझौते) के आधार पर दायर सिविल सूट को रद्द कर दिया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने अपील को स्वीकार करते हुए माना कि यह मुकदमा सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी), 1908 के आदेश 7 नियम 11(डी) के तहत समय-सीमा से बाधित था। कोर्ट ने इस मुकदमेबाजी को न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग भी करार दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद महाराष्ट्र के उल्हासनगर में प्लॉट नंबर 1480 स्थित एक संपत्ति से जुड़ा है, जिसके मूल मालिक तुकाराम दाजी भोईर थे। वर्ष 1974 में उल्हासनगर टाउनशिप की विकास योजना के तहत इस जमीन को सार्वजनिक सुविधाओं के लिए आरक्षित कर दिया गया था। बाद में 1988 में ‘हिल लाइन पुलिस स्टेशन’ बनाने के लिए इस प्लॉट का भौतिक कब्जा प्रशासन को सौंप दिया गया।
प्रतिवादियों का दावा था कि उन्होंने 21 अगस्त 1984 को भोईर के साथ इस संपत्ति को लेकर एक अपंजीकृत ‘एग्रीमेंट टू सेल’ किया था। इसी बीच, भोईर और उनके कानूनी उत्तराधिकारियों (अपीलकर्ताओं) ने आरक्षित प्लॉट के बदले वैकल्पिक जमीन पाने के लिए लंबी प्रशासनिक लड़ाई लड़ी। अंततः मार्च 2019 में संबंधित अधिकारियों ने अपीलकर्ताओं को वैकल्पिक संपत्तियां आवंटित कीं और कन्वेयन्स डीड (हस्तांतरण विलेख) निष्पादित कर दिया।
प्रतिवादियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर इस आवंटन को चुनौती दी, जिसे नवंबर 2021 में खारिज कर दिया गया। याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि प्रतिवादियों ने संपत्ति पर अपने अधिकार स्थापित करने के लिए अभी तक कोई सिविल मुकदमा दायर नहीं किया है। इस टिप्पणी के बाद, कथित समझौते के अड़तीस साल बाद, मार्च 2022 में प्रतिवादियों ने 1984 के ‘एग्रीमेंट टू सेल’ को लागू कराने (स्पेसिफिक परफॉरमेंस) के लिए एक सिविल सूट दायर कर दिया।
पक्षों की दलीलें
मुकदमा दायर होने पर अपीलकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट में सीपीसी के आदेश 7 नियम 11(डी) के तहत दो आवेदन दायर कर वाद-पत्र (प्लेंट) को खारिज करने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि लिमिटेशन एक्ट (परिसीमा अधिनियम), 1963 के अनुच्छेद 54 के अनुसार, स्पेसिफिक परफॉरमेंस सूट के लिए समय-सीमा तीन साल है, इसलिए 2022 में दायर यह मुकदमा पूरी तरह से समय-सीमा के बाहर (टाइम-बार्ड) है।
ट्रायल कोर्ट ने सितंबर 2023 में इन आवेदनों को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वाद-पत्र के बयानों को देखने से यह मुकदमा पूरी तरह से समय-सीमा से बाधित नहीं लगता। जून 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी ट्रायल कोर्ट के तर्क में कोई अवैधता न पाते हुए इस फैसले को बरकरार रखा। इन फैसलों से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों के मुकदमे के मूल आधार का विश्लेषण किया और पाया कि कन्वेयन्स डीड के निष्पादन की मांग में तीन दशक से अधिक की देरी का कोई भी उचित स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
पीठ ने दाहीबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली, कॉरेस्पोंडेंस, आरबीएएनएमएस एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन बनाम बी. गुनाशेकर और मदनसूरी श्री राम चंद्र मूर्ति बनाम सैयद जलाल जैसे ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए आदेश 7 नियम 11 के तहत वैधानिक शक्तियों की जांच की। कोर्ट ने दोहराया कि यह प्रावधान उन कार्यवाहियों को शुरुआत में ही खत्म करने के लिए एक महत्वपूर्ण फिल्टर के रूप में काम करता है, जो कानून द्वारा वर्जित हैं, भले ही वादी ने चतुराई भरी ड्राफ्टिंग से इस रोक को छिपाने की कोशिश की हो।
कोर्ट ने प्रतिवादियों के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि सिविल सूट न होने के संबंध में बॉम्बे हाईकोर्ट की 2021 की टिप्पणी से समय-सीमा की एक नई अवधि शुरू हो गई। मुकुंद भवन ट्रस्ट और अन्य बनाम श्रीमंत छत्रपति उदयनराजे प्रतापसिंह महाराज भोंसले और अन्य मामले में स्थापित नजीर पर भरोसा करते हुए पीठ ने जोर देकर कहा कि समय-सीमा की अवधि उस तारीख से शुरू होती है जब मुकदमा करने का अधिकार पहली बार उत्पन्न होता है। हाईकोर्ट की एक सामान्य टिप्पणी किसी भी तरह से नई समय-सीमा का आधार नहीं बन सकती।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट दोनों के आदेशों को रद्द करते हुए अपील को स्वीकार कर लिया और वाद-पत्र को खारिज कर दिया।
शुरुआती चरण में ही हस्तक्षेप करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की, “आदेश 7 नियम 11(डी) के तहत उपाय का उद्देश्य किसी सिविल मुकदमे में लंबी कार्यवाहियों को रोकना है, जो प्रथम दृष्टया पढ़ने से ही कानून द्वारा वर्जित प्रतीत होता है।”
कानूनी अधिकारों के समय पर दावे को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए पीठ ने निष्कर्ष निकाला, “दशकों तक चुप रहने वाले किसी वादी को लिमिटेशन कानूनों की अनदेखी करते हुए, बाद में विचार आने पर मुकदमा दायर करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
अंततः, कोर्ट ने निर्णय दिया, “नतीजतन, प्रतिवादियों द्वारा दायर किया गया वर्तमान मुकदमा अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग है और कानून द्वारा वर्जित है।”
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: शोभा वसंत भोईर और अन्य बनाम सोनी @ वंदना गुरुमुखदास जगियासी और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सी) संख्या 27748 वर्ष 2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 1 जुलाई 2026

