इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पति अपनी पत्नी के मायके की संपत्ति या उसकी माँ की पेंशन का हवाला देकर भरण-पोषण की अपनी कानूनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (सीए) पति द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (रिवीजन पिटीशन) को खारिज करते हुए जस्टिस गरिमा प्रसाद ने पारिवारिक न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें पत्नी को प्रति माह 20,000 रुपये का गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने माना कि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का पूर्ण कानूनी दायित्व है और इस पर पत्नी को उसके मायके से मिलने वाली किसी भी आर्थिक मदद का कोई असर नहीं पड़ेगा।
मामले की पृष्ठभूमि
दोनों पक्षों का विवाह 12 फरवरी 2013 को हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार हुआ था। पत्नी का आरोप था कि शादी के बाद फ्लैट खरीदने के लिए पैसों की मांग को लेकर उसे लगातार शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया, जिसके कारण वह अलग रहने को मजबूर हुई। उसने बताया कि उसकी विधवा माँ, जो एक सेवानिवृत्त हेडमिस्ट्रेस (प्रधानाध्यापिका) थीं, उन्होंने शादी में भारी खर्च किया था और फ्लैट के सौदे के दौरान भी 5.5 लाख रुपये दिए थे।
इसके अलावा, ससुराल में रहते हुए पत्नी को कई शारीरिक चोटें भी आईं, जिनके बारे में पति ने अदालत में अलग-अलग और विरोधाभासी स्पष्टीकरण दिए। दिसंबर 2016 में पत्नी को उसके मायके छोड़ दिया गया, जिसके तुरंत बाद पति ने तलाक की कार्यवाही शुरू कर दी और उसे वापस लाने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।
14 अगस्त 2024 को प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, मैनपुरी ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत पत्नी के आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पति को आवेदन की तारीख (17 जून 2017) से 20,000 रुपये प्रति माह का गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया। पति ने पारिवारिक न्यायालय के इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
दोनों पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता पति, जो एक योग्य चार्टर्ड अकाउंटेंट है, उसने दलील दी कि उसकी पत्नी अत्यधिक शिक्षित है (उसके पास एम.एससी और बी.एड की डिग्री है) और वह ट्यूशन व कोचिंग के जरिए खुद का भरण-पोषण करने में सक्षम है। उसने यह भी दावा किया कि पत्नी को अपनी माँ की पेंशन और मायके की उन संपत्तियों का लाभ मिल रहा है जिन्हें भारी कीमतों पर बेचा गया था। अपनी आय के संबंध में पति ने तर्क दिया कि उसके पूर्व नियोक्ता जेपी ग्रुप के बंद होने के बाद उसकी नौकरी चली गई थी और वर्तमान में वह अनियमित आय के साथ एक स्वतंत्र (फ्रीलांस) चार्टर्ड अकाउंटेंट के रूप में काम कर रहा है। साथ ही, उस पर अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी भी है।
इसके विपरीत, पत्नी के वकील ने दलील दी कि पति की क्रूरता और उपेक्षा के कारण पत्नी को अलग रहने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने अदालत को बताया कि पति एक सक्रिय चार्टर्ड अकाउंटेंट है जिसने कई शहरों में काम किया है और वह एक उच्च जीवन स्तर जीता है। आरोप लगाया गया कि पति ने अपनी वास्तविक आय छिपाने के उद्देश्य से जानबूझकर अपने आयकर रिटर्न (ITR) और बैंक खातों के विवरण अदालत के समक्ष पेश नहीं किए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ
हाईकोर्ट ने पाया कि पारिवारिक न्यायालय का यह निष्कर्ष बिल्कुल सही था कि पत्नी के पास अलग रहने के पर्याप्त कारण थे। अदालत ने रेखांकित किया कि पैसे के लिए लगातार दबाव बनाना और पत्नी को लगी चोटों पर पति द्वारा बार-बार बयान बदलना स्पष्ट रूप से क्रूरता की श्रेणी में आता है। इसके अलावा, पति द्वारा तुरंत तलाक का मुकदमा दायर करना, मध्यस्थता के दौरान साथ रहने से इनकार करना और पत्नी के चरित्र व मानसिक स्वास्थ्य पर बेबुनियाद आरोप लगाना भी इस बात को सही ठहराते हैं कि पत्नी का अलग रहना जायज था।
पत्नी के मायके की संपत्ति को लेकर पति के दावों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
“पत्नी का भरण-पोषण करने का कानूनी दायित्व पति का है। माँ की पेंशन या कथित तौर पर माँ की संपत्तियों को पत्नी की स्वतंत्र आय नहीं माना जा सकता।”
अदालत ने पति की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि पत्नी की शैक्षणिक योग्यता ही उसे भरण-पोषण से वंचित करने के लिए काफी है। इस पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा:
“शिक्षा और कमाने की क्षमता प्रासंगिक बिंदु हैं, लेकिन इन्हें वास्तविक और पर्याप्त आय के बराबर नहीं माना जा सकता। धारा 125 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही में मुख्य परीक्षण यह है कि क्या पत्नी कानून के दायरे में खुद का भरण-पोषण करने में असमर्थ है। जब तक इस बात का कोई सबूत न हो कि पत्नी वास्तव में पर्याप्त आय अर्जित कर रही है, तब तक केवल उसके योग्य होने के आधार पर उसे भरण-पोषण देने से इनकार नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी गंभीर रुख अपनाया कि पति ने एक पेशेवर चार्टर्ड अकाउंटेंट होने और वित्तीय दस्तावेजों की गहरी समझ रखने के बावजूद अपने टैक्स रिटर्न, बैंक स्टेटमेंट या बही-खाते अदालत में पेश नहीं किए। ऐसे में अदालत का उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना पूरी तरह सही था। पति की जीवनशैली का जिक्र करते हुए अदालत ने कहा कि उसके पास होंडा सिटी कार है और वह शादी के दौरान पत्नी को हवाई यात्रा के जरिए गोवा, दिल्ली और उदयपुर जैसी जगहों पर ले गया था, जिससे साफ है कि वह एक बेहतरीन जीवन स्तर जीता है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा रजनेश बनाम नेहा और अन्य (2021) के मामले में स्थापित सिद्धांतों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि गुजारे भत्ते की राशि दोनों पक्षों की सामाजिक स्थिति और पत्नी के ससुराल में बिताए जीवन स्तर के अनुकूल होनी चाहिए।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मैनपुरी के पारिवारिक न्यायालय के आदेश में किसी भी प्रकार की कानूनी त्रुटि, अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन या विसंगति नहीं है। अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए 17 जून 2017 से 20,000 रुपये प्रति माह गुजारा भत्ता देने के आदेश को पूरी तरह सही माना। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस अवधि के दौरान पति द्वारा अंतरिम भरण-पोषण के रूप में पहले ही भुगतान की जा चुकी किसी भी राशि को कुल बकाया राशि में समायोजित (एडजस्ट) किया जाएगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: आलोक तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 5768 ऑफ़ 2024
पीठ: जस्टिस गरिमा प्रसाद
निर्णय की तिथि: 17 जून 2026

