भरण-पोषण से इनकार करने के लिए सीआरपीसी की धारा 125 की कार्यवाही को पूर्ण वैवाहिक मुकदमे में नहीं बदला जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत भरण-पोषण की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है और इसमें क्रूरता के ऐसे कड़े सबूतों की आवश्यकता नहीं होती, जैसी किसी आपराधिक मामले या पूर्ण वैवाहिक मुकदमे में होती है। बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए जस्टिस गरिमा प्रसाद ने एक क्रिमिनल रिवीजन याचिका को स्वीकार किया। कोर्ट ने माना कि अलग रह रही पत्नी भरण-पोषण की कानूनी रूप से हकदार है और उसके दो नाबालिग बच्चों को दिए जाने वाले भरण-पोषण की राशि में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 8 फरवरी 2007 को हुए एक विवाह से जुड़ा है, जिससे दो बच्चों का जन्म हुआ। पत्नी ने आरोप लगाया था कि ससुराल में उसे प्रताड़ित और परेशान किया गया तथा वैवाहिक संबंध रखने से रोका गया। उसने यह भी आरोप लगाया कि पति ने उसे दूसरी महिला से विवाह करने की बात बताई और 10 जनवरी 2020 को मारपीट कर बच्चों सहित घर से निकाल दिया। तब से वह अपने मायके में रह रही है और उसकी आय का कोई स्वतंत्र जरिया नहीं है।

पति (जो सेना का एक रिटायर्ड जवान है) ने इन आरोपों को नकारा और दावा किया कि पत्नी बिना किसी ठोस कारण के ससुराल छोड़कर चली गई थी और उसके अन्य लोगों के साथ अवैध संबंध थे। पति ने दलील दी कि अपनी सैन्य सेवा के दौरान वह नवंबर 2020 में रिटायर होने तक अपनी सैलरी से 11,303 रुपये प्रति माह पत्नी और बच्चों के लिए कटवाता था। रिटायरमेंट के बाद वह मुख्य रूप से 21,025 रुपये प्रति माह की पेंशन पर ही गुजारा कर रहा है।

बुलंदशहर की फैमिली कोर्ट ने 14 दिसंबर 2023 को दिए अपने फैसले में पत्नी के भरण-पोषण के दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया था। कोर्ट का मानना था कि पत्नी क्रूरता या पति की दूसरी शादी के आरोपों को पूरी तरह साबित नहीं कर पाई। इसके अलावा फैमिली कोर्ट ने दोनों नाबालिग बच्चों का भरण-पोषण भी केवल 3,000 रुपये प्रति माह प्रति बच्चा तय किया था। इस फैसले के खिलाफ पत्नी और बच्चों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने धारा 125 की संक्षिप्त कार्यवाही को इस तरह से निपटाया मानो यह क्रूरता और व्यभिचार का कोई पूर्ण वैवाहिक मुकदमा हो। उन्होंने तर्क दिया कि पति ने खुद स्वीकार किया था कि उसने नवंबर 2020 के बाद से कोई भरण-पोषण नहीं दिया, फिर भी कोर्ट ने उसे लापरवाही के आरोप से मुक्त कर दिया। साथ ही, स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए 3,000 रुपये की मासिक राशि बेहद कम और सुप्रीम कोर्ट के रजनेश बनाम नेहा मामले के सिद्धांतों के खिलाफ है।

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दूसरी ओर, पति के वकील ने फैमिली कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि पत्नी क्रूरता, दहेज की मांग या दूसरी शादी का कोई ठोस सबूत नहीं दे पाई, जिससे यह साफ है कि वह बिना किसी पर्याप्त कारण के अलग रह रही थी। उन्होंने यह भी कहा कि पति एक रिटायर्ड सैनिक है जो अपनी पेंशन पर निर्भर है और फैमिली कोर्ट द्वारा तय की गई राशि पूरी तरह उचित है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

मामले के रिकॉर्ड का विश्लेषण करते हुए जस्टिस गरिमा प्रसाद ने फैमिली कोर्ट के दृष्टिकोण में कई गंभीर कानूनी कमियां पाईं। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 125 की कार्यवाही में सबूतों का पैमाना “संदेह से परे” नहीं होता और ट्रायल कोर्ट ने पत्नी पर सबूतों का अत्यधिक बोझ डाल दिया था। इस कानूनी अंतर को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“सीआरपीसी की धारा 125 के तहत की जाने वाली कार्यवाही में, कोर्ट को क्रूरता के ऐसे कड़े सबूतों पर जोर देने की आवश्यकता नहीं है जो किसी आपराधिक मुकदमे या किसी विवादित वैवाहिक मामले में आवश्यक होते हैं।”

कोर्ट ने ऐसी कार्यवाहियों के वास्तविक दायरे को समझाते हुए आगे कहा:

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“इस जांच का दायरा सीमित है। कोर्ट को केवल यह देखना होता है कि क्या पत्नी के पास अलग रहने का कोई उचित कारण है और क्या पति ने साधन होने के बावजूद उसे भरण-पोषण देने से इनकार या उपेक्षा की है।”

हाईकोर्ट ने गौर किया कि पति द्वारा दायर तलाक का मुकदमा, उसके पक्ष में आए एकतरफा तलाक के आदेश का रद्द होना और नवंबर 2020 के बाद से पत्नी-बच्चों को कोई पैसा न देने की उसकी स्वीकारोक्ति यह साबित करने के लिए काफी है कि उसने उपेक्षा की और पत्नी के पास अलग रहने के पर्याप्त कारण थे।

पत्नी पर लगाए गए चरित्रहीनता के आरोपों पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा:

“सीआरपीसी की धारा 125(4) के तहत भरण-पोषण पर रोक तभी लागू होती है जब यह साबित हो जाए कि पत्नी व्यभिचार में रह रही है। केवल आरोप, संदेह या चरित्र हनन के आधार पर किसी पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने पति की इस दलील को भी सिरे से खारिज कर दिया कि पत्नी के पिता उसकी मदद कर रहे हैं, इसलिए उसे भरण-पोषण नहीं मिलना चाहिए। कोर्ट ने कहा:

“किसी पत्नी को सिर्फ इसलिए भरण-पोषण देने से मना नहीं किया जा सकता क्योंकि संकट के समय उसके माता-पिता उसकी सहायता कर रहे हैं। माता-पिता द्वारा दी जाने वाली सहायता पति के कानूनी दायित्व का विकल्प नहीं हो सकती।”

पति की वित्तीय स्थिति पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया क्योंकि पति ने अपनी कृषि भूमि और संपत्तियों का पूरा विवरण कोर्ट के सामने नहीं रखा था। कोर्ट ने माना कि एक सक्षम और स्वस्थ पति भरण-पोषण के अपने कानूनी कर्तव्य से बच नहीं सकता। डॉ. कुलभूषण कुमार बनाम राज कुमारी और कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी नी नंदी मामलों का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि पति की कुल सैलरी का 25% हिस्सा पत्नी के लिए एक मानक माना जाता है, लेकिन भरण-पोषण की गणना व्यावहारिक रूप से आश्रितों की बुनियादी जरूरतों को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। कोर्ट ने सहमति जताई कि आज के दौर में स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए 3,000 रुपये प्रति माह बेहद कम हैं।

कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने रिवीजन याचिका को स्वीकार करते हुए फैमिली कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने से मना किया गया था। पति की सैन्य पेंशन और पारिवारिक कृषि आय को देखते हुए, हाईकोर्ट ने उसे पत्नी को 5,000 रुपये प्रति माह और दोनों बच्चों को 4,000-4,000 रुपये प्रति माह (कुल 13,000 रुपये) देने का निर्देश दिया।

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यह राशि आवेदन की तिथि यानी 2 फरवरी 2021 से देय होगी और प्रत्येक महीने की 10 तारीख तक चुकानी होगी। कोर्ट ने आदेश दिया कि 2021 से बकाया बची हुई राशि का भुगतान पति को 12 समान मासिक किश्तों में करना होगा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पति भुगतान में चूक करता है, तो याचिकाकर्ता कोर्ट के माध्यम से उसकी पेंशन या अन्य वैध स्रोतों से सीधे वसूली की कार्यवाही करा सकते हैं।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: श्रीमती रीनू और 2 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य

वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 1370/2024

पीठ: जस्टिस गरिमा प्रसाद

निर्णय की तिथि: 17 जून, 2026

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