बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने एक 23 वर्षीय पोस्टग्रेजुएट लॉ छात्रा की पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने अपनी यूनिवर्सिटी पर बिना किसी आधार के गंभीर और गैर-जिम्मेदाराना आरोप लगाने के लिए छात्रा को कड़ी फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपनी खुद की कमियों को छिपाने के लिए झूठे दावों का सहारा लेना अदालती प्रक्रिया का सरासर दुरुपयोग है।
जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और जस्टिस अजीत कादेथानकर की खंडपीठ ने 18 जून को दिए अपने फैसले में कहा कि अदालत में न्याय पाने के लिए लाया गया कोई भी मामला नेक इरादे से पेश किया जाना चाहिए। कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि अदालत की कार्यवाही का उद्देश्य न्याय पाना होता है, लेकिन ‘न्याय’ का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि किसी को जो कुछ भी चाहिए, वह उसे मनमाने तरीके से पेश करके हासिल कर ले।
कम हाजिरी के कारण परीक्षा में बैठने से रोका
यह मामला छत्रपति संभाजीनगर स्थित महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का है। अंतिम सेमेस्टर की इस छात्रा को 75 फीसदी की अनिवार्य उपस्थिति (अटेंडेंस) पूरी न करने के कारण अंतिम परीक्षा में बैठने से रोक दिया गया था। यूनिवर्सिटी के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, छात्रा की उपस्थिति केवल 45 फीसदी थी। यूनिवर्सिटी प्रशासन ने स्पष्ट किया कि अटेंडेंस में अतिरिक्त छूट देने पर विचार तभी किया जाता है, जब छात्र ने कम से कम 67 फीसदी उपस्थिति दर्ज कराई हो।
कोर्ट का रुख करने से पहले छात्रा ने यूनिवर्सिटी की शिकायत निवारण समिति (ग्रीवेंस रिड्रेसल कमेटी) के सामने आवेदन किया था, लेकिन वह निर्धारित सुनवाई में शामिल नहीं हुई। समिति द्वारा राहत देने से इनकार करने के बाद, उसने इस फैसले को मनमाना बताते हुए कोर्ट में चुनौती दी। अप्रैल में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उसकी शुरुआती याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद छात्रा ने यूनिवर्सिटी को विशेष परीक्षा आयोजित करने का निर्देश देने की मांग करते हुए यह पुनर्विचार याचिका दायर की थी।
झूठे आरोप और सबूतों का अभाव
अपनी पुनर्विचार याचिका में छात्रा ने आरोप लगाया था कि यूनिवर्सिटी ने उसकी हाजिरी की गणना में गलती की है और अन्य छात्रों को मनमाने तरीके से अतिरिक्त हाजिरी दी है। उसने यह दावा भी किया कि यूनिवर्सिटी ने उसकी बीमारी से जुड़ी परिस्थितियों पर ध्यान नहीं दिया।
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इन सभी दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अन्य छात्रों को तरजीह देने के आरोपों का कोई सबूत नहीं है और यह केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित है। इसके अलावा, बीमारी का दावा केवल इस पुनर्विचार याचिका में पहली बार लाया गया था, जिसके समर्थन में कोई भी मेडिकल दस्तावेज पेश नहीं किया गया था।
पीठ ने छात्रा के इस आचरण पर गहरी निराशा और चिंता व्यक्त की। न्यायाधीशों ने कहा कि छात्रा अभी अपने कानूनी करियर और वकालत की बारीकियों को सीखने के शुरुआती पड़ाव पर है। पेशेवर जीवन के इस स्तर पर यदि अदालतों के सामने इस तरह से अनुशासनहीन और अनुचित तरीके से झूठे दावों के साथ पेश आया जाएगा, तो इस क्षेत्र में आने वाले नए लोगों के भविष्य को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा होंगी। कोर्ट ने कहा कि ऐसे तौर-तरीकों की कड़ी निंदा की जानी चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि वे याचिकाकर्ता छात्रा पर भारी वित्तीय जुर्माना लगाने का मन बना चुके थे, लेकिन उसके भविष्य और छात्र होने की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इस बार आर्थिक दंड लगाने से परहेज किया।

