सुप्रीम कोर्ट ने एक अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया है कि भले ही अदालत में जाली दस्तावेजों का उपयोग करना एक गंभीर अपराध है, लेकिन सजा हमेशा आनुपातिक (प्रोपोर्शनेट) होनी चाहिए और इसे केवल प्रतिशोध लेने का जरिया नहीं बनाया जाना चाहिए। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने आईपीसी की धारा 420, 467, 468 और 471 के तहत अपीलकर्ता इसराफिल उर्फ पप्पू उर्फ नईमुद्दीन खान की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन मामले की परिस्थितियों को देखते हुए उसकी पांच साल की कठिन कारावास की सजा को घटाकर उसके द्वारा जेल में पहले से बिताई गई दो साल से अधिक की अवधि में बदल दिया। इन परिस्थितियों में एक दशक लंबी कानूनी लड़ाई, कोई पुराना आपराधिक इतिहास न होना और किसी स्थायी आर्थिक नुकसान का न होना शामिल है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह आपराधिक मामला 15 सितंबर 2014 को मध्य प्रदेश के रीवा जिले की न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी की अदालत में क्रिमिनल केस संख्या 07/2014 की सुनवाई के दौरान शुरू हुआ था। अपीलकर्ता अदालत में एक आरोपी मुकेश दहिया की जमानत के लिए जमानती (श्योरिटी) के रूप में उपस्थित हुआ था। उसने जमानत के समर्थन में ‘भू-अधिकार ऋण पुस्तिका’ (नंबर 943/0124451) पेश की, जो कथित रूप से 31 जनवरी 2013 को रीवा जिले के गुढ़ तहसील के अमीरती गांव की कृषि भूमि के लिए जारी की गई थी।
दस्तावेजों की जांच के दौरान न्यायिक मजिस्ट्रेट को इस पुस्तिका में गड़बड़ी नजर आई। उन्होंने देखा कि पुस्तिका में पेज नंबर 2 के ठीक बाद सीधे पेज नंबर 10 लगा हुआ था। इस पर संदेह होने पर मजिस्ट्रेट ने अपीलकर्ता से पूछताछ की, लेकिन वह कोई संतोषजनक जवाब नहीं दे सका। इसके बाद मामले की सूचना रीवा के सिविल लाइंस पुलिस स्टेशन को दी गई, जहां आईपीसी की धारा 420, 466, 467, 468 और 471 के तहत एफआईआर संख्या 562/2014 दर्ज की गई।
राजस्व अधिकारियों की जांच में पुष्टि हुई कि यह पुस्तिका फर्जी थी। जांच के बाद, जिसमें आरोपी के कई उपनामों का पता चला, मामला सुनवाई के लिए सत्र अदालत भेजा गया। 6 जनवरी 2024 को रीवा के पांचवें अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सह-आरोपी आशीष गर्ग को बरी कर दिया, लेकिन अपीलकर्ता को दोषी ठहराते हुए प्रत्येक धारा के तहत पांच-पांच साल की कठिन कारावास और 1,000-1,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई। यह सभी सजाएं एक साथ चलनी थीं। इसके खिलाफ अपील को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर पीठ ने 30 अप्रैल 2025 को खारिज कर दिया था। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसने 21 नवंबर 2025 को केवल सजा की अवधि पर विचार करने के लिए नोटिस जारी किया था।
दोनों पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता के वकील ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी, लेकिन पांच साल की सजा पर फिर से विचार करने का अनुरोध किया। उन्होंने दलील दी कि यह घटना साल 2014 की है और अपीलकर्ता पिछले दस वर्षों से अधिक समय से इस कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहा है। इसके अलावा, उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है, वह आदतन अपराधी नहीं है और वह पहले ही दो साल से अधिक समय जेल में बिता चुका है।
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश सरकार के वकील ने किसी भी तरह की राहत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने अपराध की गंभीरता पर जोर देते हुए कहा कि अदालत से जमानत लेने के लिए जाली सरकारी राजस्व दस्तावेज का उपयोग करना सीधे तौर पर न्याय व्यवस्था की शुचिता पर प्रहार करता है, इसलिए इसमें कोई ढील नहीं दी जानी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अदालती फाइलों के साथ छेड़छाड़ की कड़े शब्दों में निंदा की। पीठ ने टिप्पणी की:
“इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि न्यायिक कार्यवाही में जालसाजी और जाली दस्तावेजों के उपयोग से जुड़े अपराध गंभीर प्रकृति के होते हैं। आईपीसी की धारा 467, 468 और 471 उन अपराधों से निपटती हैं जो सार्वजनिक और कानूनी दस्तावेजों से जुड़ी प्रामाणिकता और पवित्रता को कमजोर करते हैं। कानून की अदालत के समक्ष जाली दस्तावेजों के उपयोग को हल्के में नहीं लिया जा सकता।”
हालांकि, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि न्यायपालिका को अपराध की गंभीरता के साथ-साथ परिस्थितियों और सजा देने के बुनियादी सिद्धांतों में संतुलन बनाना चाहिए:
“इसके साथ ही, सजा के प्रश्न पर विचार करते समय, अदालत के लिए अपराध की प्रकृति और मामले के तथ्यों व परिस्थितियों, आरोपी की भूमिका, जेल में बिताई गई अवधि, समय बीतने और सजा से जुड़े अन्य सुधारात्मक पहलुओं के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। आनुपातिकता (प्रोपोर्शनेलिटी) का सिद्धांत सजा की प्रक्रिया का मुख्य आधार है। सजा को केवल एक प्रतिशोधात्मक कार्रवाई नहीं बनाया जा सकता जो मामले के वास्तविक तथ्यों और अपराधी की समग्र परिस्थितियों से पूरी तरह अलग हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता के पक्ष में कई राहत देने वाले बिंदुओं को रेखांकित किया। पीठ ने पाया कि यह जालसाजी शुरुआती चरण में ही पकड़ ली गई थी, जिससे कोई बड़ा आर्थिक या संपत्ति का नुकसान नहीं हुआ। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले को बड़े या संगठित आर्थिक अपराधों से अलग बताते हुए कहा:
“वर्तमान मामला किसी संगठित आपराधिक गतिविधि, बड़े पैमाने पर आर्थिक धोखाधड़ी, सार्वजनिक संस्थानों को प्रभावित करने वाली व्यवस्थित जालसाजी, या व्यापक वित्तीय नुकसान पहुंचाने वाले बार-बार किए गए धोखे का नहीं है। हालांकि इस अपराध को हल्के में नहीं लिया जा सकता, लेकिन सजा अंततः मामले के समग्र तथ्यों और इसमें दिखने वाले अपराध के स्तर के आनुपातिक होनी चाहिए।”
अपने फैसले को पुख्ता करने के लिए कोर्ट ने पदुम कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020) के फैसले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने मामले की लंबी अवधि, पहले से काटी गई सजा और दोबारा अपराध न करने की बात को ध्यान में रखते हुए सजा कम कर दी थी। कस्टडी सर्टिफिकेट के अनुसार, अपीलकर्ता 19 सितंबर 2014 से 1 दिसंबर 2014 तक और फिर 6 जनवरी 2024 से लगातार जेल में बंद है, जो कि दो साल से अधिक की वास्तविक जेल अवधि है।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सजा में बदलाव करने से न्याय का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। पीठ ने अपीलकर्ता को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मिली पांच साल की कठिन कारावास की सजा को घटाकर उसके द्वारा अब तक जेल में बिताई गई अवधि में बदल दिया।
सत्र अदालत द्वारा लगाया गया प्रति धारा 1,000 रुपये का जुर्माना बरकरार रखा गया है। कोर्ट ने आदेश दिया कि यदि अपीलकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो जुर्माने की बकाया राशि जमा करने के बाद उसे तुरंत जेल से रिहा कर दिया जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: इसराफिल उर्फ पप्पू उर्फ नईमुद्दीन खान बनाम मध्य प्रदेश राज्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 3081 वर्ष 2026 जो विशेष अनुमति याचिका संख्या 19486 वर्ष 2025 से उत्पन्न हुई है
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 23 जून 2026

