गुजरात हाईकोर्ट ने अपने मातहत काम करने वाली आशा कार्यकर्ताओं पर ईसाई धर्म अपनाने के लिए दबाव बनाने और नौकरी से निकालने की धमकी देने की आरोपी महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता के खिलाफ जारी आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान के तहत मिले धार्मिक प्रचार के अधिकार के दायरे में बलपूर्वक, छल-कपट या दबाव के जरिए कराया गया धर्मांतरण शामिल नहीं है।
जस्टिस एम के ठक्कर की पीठ ने 31 जुलाई को एएनएम और आशा वर्कर नम्रता मैक्वान की ओर से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने गुजरात धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 2003 के तहत दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में माना कि याचिकाकर्ता के खिलाफ पहली नजर में संज्ञेय अपराध का मामला बनता है और जांच में सामने आए तथ्य मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त हैं।
दबाव और प्रलोभन के आरोप
अभियोजन पक्ष के अनुसार, ‘जेहोवाज विटनेसेज’ संप्रदाय से जुड़ी नम्रता मैक्वान पर अपनी वरिष्ठ स्थिति का फायदा उठाकर एक आशा फैसिलिटेटर और चार आशा कार्यकर्ताओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास करने का आरोप है। आशा कार्यकर्ताओं की यूनिट सुपरवाइजर द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में कहा गया है कि नम्रता आधिकारिक बैठकों के बाद कार्यकर्ताओं को रोकती थीं, मूर्तिपूजा की आलोचना करती थीं, बाइबिल पढ़ने के लिए प्रेरित करती थीं और धार्मिक वीडियो दिखाती थीं।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया कि नम्रता ने स्वास्थ्य विभाग की एक आधिकारिक बैठक का झांसा देकर इन कार्यकर्ताओं को वडोदरा में आयोजित एक कार्यक्रम में बुलाया। वहां उन्हें ईसाई धर्मोपदेश सुनाए गए और धर्म परिवर्तन करने वालों के अनुभव साझा किए गए। इसमें हिस्सा न लेने या विरोध करने पर कर्मचारियों को वेतन रोकने और नौकरी से निकालने जैसी धमकियां भी दी गईं।
बचाव पक्ष के तर्क और कोर्ट का रुख
नम्रता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मिहिर जोशी ने तर्क दिया कि उनकी मुवक्किल संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत अपने धर्म के प्रचार-प्रसार के अधिकार का पालन कर रही थीं। उन्होंने दावा किया कि बल, छल या लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने का कोई प्रयास नहीं हुआ, इसलिए कानून के तहत कोई अपराध नहीं बनता। उन्होंने शिकायतकर्ता के अधिकार क्षेत्र और अभियोजन की मंजूरी की वैधता पर भी सवाल उठाए।
हाईकोर्ट ने इन तर्कों को अमान्य करते हुए कहा कि अनुच्छेद 25 धार्मिक विश्वासों के प्रचार की स्वतंत्रता तो देता है, लेकिन यह अनुचित दबाव, धोखे या प्रलोभन से धर्मांतरण कराने की इजाजत नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट के 2021 के ‘दुर्गा यादव’ मामले के फैसले का हवाला देते हुए जस्टिस ठक्कर ने टिप्पणी की कि धर्मांतरण रोधी कानूनों का मुख्य उद्देश्य शोषण को रोकना और व्यक्तिगत विवेक की स्वतंत्रता की रक्षा करना है।
मामले से जुड़े कानूनी पहलू
याचिकाकर्ता का यह तर्क खारिज करते हुए कि पीड़ितों ने वडोदरा कार्यक्रम में भाग लिया और भोजन किया था, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल भोजन करने से यह सिद्ध नहीं होता कि उन्हें धोखा देकर वहां नहीं बुलाया गया था। इसके अलावा, कोर्ट ने पाया कि पुलिस द्वारा चार्जशीट दाखिल करने से पहले जिला मजिस्ट्रेट ने कानून की धारा 6 के तहत अभियोजन की औपचारिक मंजूरी दे दी थी।
जस्टिस ठक्कर ने रेखांकित किया कि मुकदमे के इस शुरुआती चरण में अदालत का काम यह तय करना नहीं है कि आरोपी दोषी साबित होगा या नहीं, बल्कि केवल यह देखना है कि क्या लगाए गए आरोपों से पहली नजर में कोई संज्ञेय अपराध प्रकट होता है।

