सिर्फ वरिष्ठता हाईकोर्ट में जज बनने का अधिकार नहीं देती, सुप्रीम कोर्ट ने हिमाचल के जज की याचिका खारिज की

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल वरिष्ठता के आधार पर कोई न्यायिक अधिकारी हाईकोर्ट का जज बनने का दावा नहीं कर सकता। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश के एक वरिष्ठ न्यायाधीश की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने से कनिष्ठ (जूनियर) अधिकारियों को पदोन्नत किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने धर्मशाला की पारिवारिक अदालत के प्रिंसिपल जज अरविंद मल्होत्रा की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि न्यायिक पदोन्नति पूरी तरह से सिफारिश करने वाले कॉलेजियम की संतुष्टि और आंतरिक मूल्यांकन पर निर्भर करती है। इसकी प्रक्रिया बेहद गोपनीय होती है, इसलिए इसमें न्यायिक हस्तक्षेप उचित नहीं है।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने बीते 3 जून को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में जज के रूप में पदोन्नति के लिए तीन न्यायिक अधिकारियों—चिराग भानु सिंह, भूपेश शर्मा और योगेश जसवाल के नामों की सिफारिश की थी। मल्होत्रा का तर्क था कि वरिष्ठ होने के बावजूद उन्हें दरकिनार कर उनके जूनियरों के नामों की सिफारिश की गई, जिसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।

कॉलेजियम के फैसलों में न्यायिक समीक्षा की सीमाएं

सुनवाई के दौरान बेंच ने स्पष्ट किया कि इस मामले में हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं है। जस्टिस नागरत्ना ने इसकी तुलना सामान्य भर्ती प्रक्रियाओं से की, जहां रिक्तियों से अधिक उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया जाता है। उन्होंने कहा कि जब तक प्रक्रिया में कोई स्पष्ट गड़बड़ी न दिखे, तब तक चयन न होने वाले उम्मीदवार अंतिम चयन को कानूनी चुनौती नहीं दे सकते।

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मल्होत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील बलबीर सिंह ने दलील दी कि उनके मुवक्किल के प्रतिवेदन (रिप्रेजेंटेशन) के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट कॉलेजियम से उनके नाम पर दोबारा विचार करने को कहा था। हालांकि, बेंच ने इस दावे के आधार पर सवाल उठाए। जस्टिस बागची ने कहा कि उम्मीदवार उस स्क्रीनिंग कमेटी के फैसले को चुनौती नहीं दे सकते जो सिफारिशी संस्था के लिए नाम तैयार करती है। उन्होंने आगे कहा कि चूंकि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने हाईकोर्ट की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, इसलिए अब इसकी न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती।

अदालत ने चेतावनी भी दी कि अगर वह कॉलेजियम को किसी खास उम्मीदवार के नाम पर पुनर्विचार का निर्देश देती है, तो इससे गोपनीय न्यायिक नियुक्तियों की जांच का एक नया विवाद (पैंडोरा बॉक्स) खड़ा हो जाएगा।

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अदालत की धैर्य रखने और प्रशासनिक रास्ता अपनाने की सलाह

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि मल्होत्रा की सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) में अभी दस साल का समय बाकी है, फिर भी उन्होंने यह याचिका दायर की। जस्टिस बागची और जस्टिस नागरत्ना ने उन्हें धैर्य रखने की सलाह देते हुए कहा कि हो सकता है कि उनके नाम पर विचार अभी केवल टाल दिया गया हो और भविष्य में उनके पास हाईकोर्ट का जज बनने के लिए काफी समय है।

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मल्होत्रा के भविष्य की संभावनाओं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अदालत ने उन्हें याचिका वापस लेने की सलाह दी। बेंच ने सुझाव दिया कि वह इसके बजाय प्रशासनिक स्तर पर एक स्मरण पत्र (रिप्रेजेंटेशन) भेजकर अपने मामले की स्थिति की जानकारी लें। अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने मल्होत्रा को अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। साथ ही, उन्हें प्रशासनिक या न्यायिक स्तर पर हाईकोर्ट के सक्षम अधिकारियों के समक्ष अपनी बात रखने की स्वतंत्रता दी।

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