CCTV फुटेज से साबित हुई बेगुनाही, गुजरात हाईकोर्ट ने सूरत के वकील पर दर्ज हत्या के प्रयास का मुकदमा रद्द किया

गुजरात हाईकोर्ट ने साल 2019 के एक आपराधिक मामले में सूरत के वकील मोहम्मद बिलाल कागजी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने वकील के खिलाफ दर्ज हत्या के प्रयास सहित कई अन्य गंभीर आरोपों वाली एफआईआर (FIR) को रद्द कर दिया है। जस्टिस पी एम रावल की कोर्ट ने 19 जून को यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने पाया कि जांच के दौरान जुटाए गए सीसीटीवी (CCTV) फुटेज से यह साफ हो गया है कि कथित घटना के समय आरोपी वकील मौके पर मौजूद ही नहीं थे।

यह पूरा मामला सूरत के रांदेर पुलिस स्टेशन में दर्ज कराया गया था। एफआईआर में वकील मोहम्मद बिलाल कागजी के साथ कई अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया था। शिकायतकर्ता अशरफ शेख का आरोप था कि 10 दिसंबर 2019 की सुबह करीब 10 बजे, जब वह अपने दोस्तों के साथ सूरत डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की तीसरी मंजिल पर खड़े थे, तब कागजी उनके पास आए और उन्हें पुराना मामला वापस लेने की धमकी दी। पुलिस ने इस शिकायत पर हत्या के प्रयास (IPC 307), खतरनाक हथियारों से गंभीर चोट पहुंचाने (IPC 326), गैरकानूनी सभा (IPC 143), दंगा (IPC 147), आपराधिक धमकी (IPC 506(2)) और आपराधिक साजिश (IPC 120(b)) के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

CCTV फुटेज से सामने आया सच

एफआईआर दर्ज होने की जानकारी मिलते ही वकील बिलाल कागजी ने तुरंत पुलिस के आला अधिकारियों, जिनमें सूरत के पुलिस कमिश्नर और मामले के जांच अधिकारी शामिल थे, के सामने अपनी बेगुनाही का दावा किया। उन्होंने कहा कि घटना के समय वह कोर्ट की तीसरी मंजिल पर मौजूद ही नहीं थे। बाद में, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जब जांच एजेंसी ने डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के सीसीटीवी फुटेज निकाले, तो कागजी का दावा सच साबित हुआ। फुटेज में साफ दिखा कि कथित समय पर कागजी वहां मौजूद नहीं थे।

Court ने खारिज की सरकारी वकील की दलीलें

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हाईकोर्ट में बिलाल कागजी के वकील कश्यप जोशी ने दलील दी कि उनके मुवक्किल को इस मामले में केवल इसलिए घसीटा गया है ताकि वह अन्य आरोपियों की पैरवी न कर सकें। दूसरी तरफ, सरकारी वकील (अभियोजन पक्ष) ने इस याचिका का कड़ा विरोध किया। सरकारी वकील का कहना था कि चूंकि मामले में आपराधिक साजिश की धारा भी जुड़ी है, इसलिए इस पहलू की जांच ट्रायल के दौरान ही होनी चाहिए। उन्होंने यह भी दावा किया कि जांच के दौरान ऐसे सबूत मिले हैं जो दर्शाते हैं कि कागजी घटना से पहले अन्य आरोपियों के संपर्क में थे।

निर्दोष को गलत मुकदमे से बचाना जरूरी

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जस्टिस पी एम रावल ने अभियोजन पक्ष की आपत्तियों को खारिज कर दिया। उन्होंने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि वैसे तो कोर्ट इस स्तर पर ‘मिनी ट्रायल’ (मामले की प्रारंभिक समीक्षा) करने से बचता है, लेकिन जब आरोपी के पास घटना के समय वहां न होने का ठोस सबूत (एलीबाय) हो और सीसीटीवी फुटेज खुद शिकायतकर्ता के दावों को झूठा साबित कर रहे हों, तो हस्तक्षेप करना बेहद जरूरी हो जाता है। अदालत ने कहा कि ऐसा न करने पर एक निर्दोष व्यक्ति को गलत तरीके से कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य’ का हवाला देते हुए कहा कि घटनास्थल पर आरोपी की अनुपस्थिति ही एफआईआर के आधार को पूरी तरह खत्म कर देती है। कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि नोटिस भेजे जाने के बाद भी शिकायतकर्ता अशरफ शेख सुनवाई के दौरान अदालत में उपस्थित नहीं हुआ।

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