सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में माना है कि सड़क पर बने फुटपाथ पर चलने का अधिकार संविधान के भाग III के तहत गारंटीकृत एक मौलिक अधिकार है। जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार प्राथमिक है और इसे मोटर वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके साथ ही, कोर्ट ने एक सड़क हादसे में अपने पांच साल के बेटे को खोने वाले एक पीड़ित पिता के मुआवजे को घटाने वाले हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की राशि को फिर से तय करते हुए इसे बढ़ाकर 11,44,628 रुपये कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक दुखद दुर्घटना से जुड़ा है। याचिकाकर्ता सुबह 9:00 बजे अपने पांच साल के बेटे को पास के स्कूल छोड़ने के लिए पैदल जा रहे थे। इसी दौरान पीछे से आ रहे एक टैंकर ने बच्चे को टक्कर मार दी, जिससे उसका निचला हिस्सा कुचल गया और उसकी मृत्यु हो गई। दुर्घटना स्थल पर न तो कोई फुटपाथ था और न ही कोई पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग (पैदल पार पथ) बनी हुई थी।
मृतक के पिता ने दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) में 25,00,000 रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए याचिका दायर की थी। ट्रिब्यूनल ने 30 मई 2016 को अपने फैसले में याचिकाकर्ता को 6% वार्षिक ब्याज के साथ 7,82,000 रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया था। इस फैसले के खिलाफ पिता और बीमा कंपनी दोनों ने हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने पिता की अपील को खारिज कर दिया और बीमा कंपनी की अपील को स्वीकार करते हुए मुआवजे की राशि को घटाकर 4,70,000 रुपये कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
‘चलने के अधिकार’ पर सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अपने विश्लेषण की शुरुआत सड़कों पर पैदल चलने वालों की लगातार हो रही अनदेखी का जिक्र करते हुए की। कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी त्रासदियों को अक्सर बुनियादी ढांचागत समस्याओं को सुलझाए बिना केवल एफआईआर (FIR) और दुर्घटना दावों में बदल दिया जाता है।
संविधान के अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत देश के भीतर स्वतंत्र रूप से आने-जाने के अधिकार का विश्लेषण करते हुए, कोर्ट ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि “आवागमन” केवल वाहनों तक सीमित है। पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा ने टिप्पणी की:
“अनुच्छेद 19(1)(d) के तहत आने-जाने का प्राथमिक अधिकार पैदल चलने का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार पहियों पर चलने के अधिकार से पहले का है और इस बहुमूल्य अधिकार का विस्तार सुरक्षित और स्पष्ट रूप से चिह्नित फुटपाथों तक होना चाहिए। नागरिकों का फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार प्राथमिक है और इसे मोटर वाहनों की आवाजाही पर प्राथमिकता मिलेगी।”
कोर्ट ने भारत में पैदल चलने के सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक महत्व को भी रेखांकित किया। अदालत ने इसके लिए कई ऐतिहासिक और सामाजिक आंदोलनों का उदाहरण दिया:
- नगर संकीर्तन (सार्वजनिक स्थानों पर समुदायों द्वारा गाते हुए पैदल चलना)
- पंढरपुर वारी (जातिगत सीमाओं को तोड़ने वाली 800 साल पुरानी पैदल यात्रा)
- कांवड़ यात्रा (कठिन शारीरिक साधना वाली वार्षिक पैदल यात्रा)
- दांडी मार्च (महात्मा गांधी की ऐतिहासिक 241 मील की औपनिवेशिक विरोधी पदयात्रा)
- भूदान आंदोलन (विनोबा भावे द्वारा भूमिहीन लोगों के लिए की गई 70,000 किलोमीटर की पदयात्रा)
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैदल चलना केवल गति नहीं है, बल्कि यह अनुच्छेद 19(1)(a), 19(1)(b) और 19(1)(c) के तहत अभिव्यक्ति, सभा और संगठन बनाने के अधिकारों को भी दर्शाता है। सार्वजनिक स्थानों पर केवल मोटर वाहनों का एकाधिकार नहीं हो सकता।
कानून की कमी और अन्य अधिकारों से तुलना
अदालत ने पाया कि जहां शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (अनुच्छेद 21A), राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 (अनुच्छेद 21), और सूचना का अधिकार अधिनियम जैसे कानूनों के जरिए अन्य मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए समर्पित कानून बनाए गए हैं, वहीं फुटपाथ पर चलने के अधिकार को सुरक्षित करने के लिए कोई विशिष्ट कानून उपलब्ध नहीं है।
कोर्ट ने रेखांकित किया कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 केवल “वाहनों” को केंद्र में रखकर बनाया गया है, जिसमें मानवीय हित केवल गौण या प्रासंगिक हैं। यहां तक कि मोटर वाहन (ड्राइविंग) विनियम, 2017 भी केवल ड्राइवरों के लिए दिशानिर्देश प्रदान करते हैं, पैदल चलने वालों के लिए कोई लागू करने योग्य कानूनी अधिकार नहीं देते। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“यदि कोई सड़क मौजूद है, तो यह सुनिश्चित करना एक कानूनी कर्तव्य है कि पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ बनाया और उसका रख-रखाव किया जाए। यह एक लागू करने योग्य कर्तव्य है। फुटपाथ पर चलने का मौलिक अधिकार मोटर वाहनों के विशेषाधिकार से ऊपर होगा।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि किसी नागरिक के फुटपाथ पर चलने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो वे स्थानीय और नगर निकायों के खिलाफ सीधे तौर पर संविधान या विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 की धारा 38-40 के तहत स्वतंत्र रूप से कानूनी उपचार प्राप्त कर सकते हैं।
मुआवजे की दोबारा गणना
एक 6 वर्षीय बच्चे की मौत से जुड़े पूर्व के एक मामले, करुणा परमार बनाम प्रकाश सिन्हा (2025 INSC 1244) का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुआवजे की राशि की दोबारा गणना की।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, 1948 के तहत वर्ष 2014 में एक कुशल श्रमिक की दैनिक मजदूरी (223 रुपये प्रति दिन) के आधार पर मासिक आय 6,690 रुपये और वार्षिक आय 80,280 रुपये आंकी गई। इसमें भविष्य की संभावनाओं के लिए 40% की वृद्धि जोड़ी गई और व्यक्तिगत खर्चों के लिए 50% की कटौती की गई। इसके बाद 18 का गुणक (multiplier) लागू करके निर्भरता की हानि 10,11,528 रुपये आंकी गई। कंसोर्टियम (सहानुभूति), संपत्ति की हानि और अंतिम संस्कार के खर्चों को जोड़कर कुल मुआवजा 11,44,628 रुपये निर्धारित किया गया, जिसका भुगतान दो महीने के भीतर करने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट के निर्देश और घोषणाएं
अपने निर्णय के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- फुटपाथ पर चलने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(d) के साथ-साथ अनुच्छेद 19(1)(a), (b), (c) और अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है, जिसे मोटर वाहनों पर प्राथमिकता दी जाएगी।
- स्थानीय निकायों (शहरी विकास प्राधिकरणों, नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों) का यह कानूनी और अनिवार्य कर्तव्य है कि वे हर सड़क के साथ फुटपाथ का निर्माण और रखरखाव करें।
- नागरिक फुटपाथ के अधिकार के उल्लंघन पर स्थानीय निकायों के खिलाफ स्वतंत्र रूप से कानूनी और संवैधानिक उपचारों का उपयोग कर सकते हैं, जो मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाले उपचारों से स्वतंत्र होंगे।
- कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वे इस फैसले की प्रति केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय और भारतीय विधि आयोग को भेजें ताकि इस संबंध में एक औपचारिक कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके।
- रजिस्ट्री को इस मामले को संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक जनहित याचिका के रूप में दर्ज करने का निर्देश दिया गया, जिसका शीर्षक ‘री: फंडामेंटल राइट टू वॉक एंड फुटपाथ’ (Re: Fundamental Right to Walk and Footpath) होगा। इसके तहत भारत सरकार के मंत्रालयों को पक्षकार बनाया गया है ताकि इस मुद्दे पर आगे भी निगरानी रखी जा सके।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मनियार इलियास उर्फ शेख रियाज और अन्य बनाम पी. अय्यप्पन और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 4665-4666/2025
पीठ: जस्टिस पामिदिघंतम श्री नरसिम्हा, जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
निर्णय की तिथि: 19 जून, 2026

