एक महत्वपूर्ण कानूनी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उत्तर प्रदेश शहरी भवन (किराए पर देने, किराया और बेदखली का विनियमन) अधिनियम, 1972 (UP Rent Act) की धारा 21 से कुछ स्पष्टीकरण खंडों को हटाए जाने से मकान मालिकों को किराया बढ़ाने की अनुमति देने वाले कानूनी प्रावधान की वैधता या संचालन पर कोई असर नहीं पड़ता है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट बिना किसी सहायक साक्ष्य या दस्तावेज के केवल मौखिक दलीलों के आधार पर किराया बढ़ाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत अपने पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार (supervisory jurisdiction) का सामान्य रूप से उपयोग नहीं कर सकता। इसके साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और मामले को नए सिरे से तय करने के लिए रेंट कंट्रोल अथॉरिटी को वापस भेज दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 1966 से शुरू होता है जब प्रतिवादी-मकान मालिकों के पूर्वजों ने बहराइच स्थित एक इमारत उत्तर प्रदेश सरकार के व्यापार कर विभाग को किराए पर दी थी। इस संपत्ति का कुल प्लॉट एरिया 5,866 वर्ग फुट है, जिसमें से कवर्ड एरिया 3,645.06 वर्ग फुट है। 1990 के दशक में संपत्ति को खाली कराने के असफल प्रयासों के बाद, मकान मालिकों ने अधिनियम की धारा 21(8) के प्रावधान के तहत किराया बढ़ाने के लिए वर्ष 2008 में सिटी मजिस्ट्रेट/रेंट कंट्रोल ऑफिसर, बहराइच के समक्ष एक आवेदन (मामला संख्या 05/2008) दायर किया।
रेंट कंट्रोल ऑफिसर ने संपत्ति के मुख्य और केंद्रीय स्थान को ध्यान में रखते हुए और इस तथ्य को दर्ज करते हुए कि वही सरकारी विभाग पास की ही एक अन्य और बहुत छोटी इमारत के लिए काफी अधिक किराए का भुगतान कर रहा है, 4 रुपये प्रति वर्ग फुट की दर से मासिक किराया बढ़ाकर 14,400 रुपये निर्धारित कर दिया।
इस आदेश के खिलाफ अपील दायर होने पर, अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, बहराइच ने 28 मार्च 2016 को इस फैसले को रद्द कर दिया। अपीलीय अदालत ने पाया कि अधीनस्थ अथॉरिटी ने इस बात का कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया था कि बढ़ी हुई दरें किस तिथि से प्रभावी होंगी, और न ही हर पांच साल के अंतराल पर किराया बढ़ाने के संबंध में कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए थे। इसके बाद अपीलीय अदालत ने नए सिरे से सुनवाई के लिए मामले को वापस रेंट कंट्रोल अथॉरिटी को भेज (रिमांड कर) दिया।
मकान मालिकों ने इस रिमांड आदेश को संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। 5 मई 2025 को हाईकोर्ट के सिंगल जज ने मकान मालिकों के वकील की इस मौखिक दलील को स्वीकार कर लिया कि सरकार द्वारा किराए पर ली गई बगल की ही एक अन्य इमारत का किराया 14 रुपये प्रति वर्ग फुट है। मामले में और देरी से बचने के लिए, हाईकोर्ट ने मामले को वापस भेजने के बजाय सीधे किराया बढ़ाकर 14 रुपये प्रति वर्ग फुट तय कर दिया और इसे मकान मालिकों के मूल आवेदन की तिथि से लागू करने का निर्देश दिया। इस फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की स्पेशल अपील को हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि यह विचारणीय नहीं है, जिसके बाद राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता-किराएदार (उत्तर प्रदेश सरकार) ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने अनुच्छेद 227 के तहत अपने क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए रेंट कंट्रोल अथॉरिटी की भूमिका खुद अपनाकर सीधे किराया बढ़ाने की भूल की है। सरकार का कहना था कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत या दस्तावेज मौजूद नहीं था जिससे यह प्रमाणित हो सके कि बगल की इमारत का किराया वास्तव में 14 रुपये प्रति वर्ग फुट था।
दूसरी ओर, प्रतिवादी-मकान मालिकों का तर्क था कि सरकारी किराएदार अधिनियम की धारा 21 के तहत मिलने वाले सामान्य संरक्षणों का हकदार नहीं है। उन्होंने कहा कि अधिनियम से कुछ खंडों को हटाए जाने के बावजूद, धारा 21(8) के तहत किराया बढ़ाने का मकान मालिक का वैधानिक अधिकार पूरी तरह से प्रभावी और सुरक्षित है।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने दो मुख्य कानूनी मुद्दों पर विचार किया: पहला, कानून से कुछ धाराओं को हटाने का किराया बढ़ाने वाले प्रावधान पर क्या प्रभाव पड़ता है, और दूसरा, अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट की पर्यवेक्षी शक्तियों का दायरा क्या है।
1. धारा 21 और हटाए गए खंडों की व्याख्या
अदालत ने अधिनियम की धारा 21 की समीक्षा की, जो किराएदारों की बेदखली और किराया बढ़ाने को नियंत्रित करती है। 1976 के संशोधन (यूपी अधिनियम संख्या 28, 1976) के तहत, उप-धारा (1) के स्पष्टीकरण के खंड (ii) और (iv) को हटा दिया गया था, जो पहले मकान मालिकों की ‘वास्तविक आवश्यकता’ (bona fide need) की विशिष्ट स्थितियों को परिभाषित करते थे।
राज्य सरकार का तर्क था कि इन खंडों के हटने से सरकारी भवनों के लिए धारा 21(8) का किराया वृद्धि वाला प्रावधान अप्रभावी हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इस संकीर्ण व्याख्या को खारिज कर दिया और निर्णय दिया कि जहां किराएदार कोई सरकारी संस्था या विभाग है, वहां धारा 21(8) के तहत मिलने वाला यह कानूनी अधिकार मकान मालिकों के लिए एकमात्र और प्रभावी उपाय है। फैसला सुनाते हुए जस्टिस करोल ने टिप्पणी की:
“खंड (ii) और (iv) के विलोपन से धारा 21(8) के प्रावधान के लागू होने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। हमारा यह सुदृढ़ मत इसलिए है क्योंकि यदि अपीलकर्ता-राज्य की दलील को स्वीकार कर लिया जाए, तो यह किराएदार को ही मकान मालिक बनाने जैसा होगा। कोई वास्तविक आवश्यकता नहीं और कोई किराया वृद्धि नहीं – इसका सीधा मतलब यह होगा कि मकान मालिक के पास अपनी ही संपत्ति को भौतिक या वित्तीय रूप से वापस पाने का कोई रास्ता नहीं बचेगा। केवल इसलिए किसी कानूनी प्रावधान की इतनी संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती क्योंकि मामले के दूसरे पक्ष में खुद सरकार है, क्योंकि ऐसा करना मकान मालिक और किराएदार के संबंधों के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देगा।”
2. अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट की शक्तियों की सीमा
इसके बाद कोर्ट ने इस मुद्दे पर विचार किया कि क्या हाईकोर्ट सीधे किराया निर्धारित कर उसे बढ़ा सकता था। वरयाम सिंह बनाम अमरनाथ, एल. चंद्र कुमार बनाम भारत संघ, लक्ष्मीकांत रेवचंद भोजवानी बनाम प्रतापसिंह मोहनसिंह परदेशी, कोइलेरियन जानकी बनाम रेंट कंट्रोलर (मुंसिफ), औसेफ मथाई बनाम एम. अब्दुल कादिर, राज्य बनाम नवजोत संधू, सूर्या देव राय बनाम राम चंदर राय, और शालिनी श्याम शेट्टी जैसे अपने पुराने और स्थापित निर्णयों का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस शक्ति के मुख्य मानकों को स्पष्ट किया।
कोर्ट ने दोहराया कि अनुच्छेद 227 एक विवेकाधीन और पर्यवेक्षी शक्ति है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी न्यायालय और न्यायाधिकरण अपनी कानूनी सीमाओं के भीतर काम करें। यह हाईकोर्ट के लिए अपीलीय शक्ति नहीं है कि वह अधीनस्थ संस्थाओं के स्थान पर अपना खुद का निर्णय थोप दे। किराए से जुड़े मामलों के संदर्भ में पीठ ने टिप्पणी की:
“हालांकि रेंट से जुड़े मामलों में अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर पूरी तरह से रोक नहीं है, लेकिन इसका उपयोग बेहद विवेकपूर्ण और सीमित तरीके से किया जाना चाहिए, विशेष रूप से इसलिए क्योंकि रेंट कंट्रोल कानून विशेष कानूनों की श्रेणी में आते हैं।”
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट द्वारा किराए को सीधे बढ़ाकर 14 रुपये प्रति वर्ग फुट करने के फैसले का कोई दस्तावेजी आधार नहीं था। यह पूरी तरह से मकान मालिकों के वकील के एक मौखिक बयान पर आधारित था, जिसे प्रमाणित करने के लिए कोई रेंट डीड या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए गए थे, और न ही इस पर राज्य सरकार की कोई सहमति दर्ज थी।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यद्यपि मकान मालिकों द्वारा अधिनियम की धारा 21(8) के तहत किराया बढ़ाने का आवेदन पूरी तरह से विचारणीय और कानूनी रूप से वैध है, लेकिन पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में हाईकोर्ट द्वारा सीधे किराया बढ़ाए जाने का फैसला कानूनी रूप से सही नहीं था।
इसके चलते सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। मामले में पहले ही हो चुकी लंबी देरी को स्वीकार करते हुए, पीठ ने रेंट कंट्रोल ऑफिसर, बहराइच को निर्देश दिया कि वे राज्य सरकार द्वारा देय किराए का नए सिरे से निर्धारण करें। अथॉरिटी को अपीलीय अदालत के 28 मार्च 2016 के निर्देशों का पालन करते हुए इस कार्यवाही को सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तारीख से चार महीने के भीतर पूरा करना होगा। कोर्ट ने साफ तौर पर निर्देश दिया कि नया निर्धारित किराया वर्ष 2008 में दायर किए गए मूल आवेदन की तिथि से ही प्रभावी माना जाएगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य बनाम राघवेंद्र नाथ श्रीवास्तव व अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… वर्ष 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 38495-38496 वर्ष 2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 29 मई 2026

