सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ में निर्णय दिया है कि अंतिम नियुक्ति के चरण में प्रक्रियात्मक खामी होने मात्र से पूरी भर्ती प्रक्रिया स्वतः अवैध नहीं हो जाती, बशर्ते वह प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के अनुकूल हो। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की एक सहकारी समिति को निर्देश दिया कि वह क्लर्कों और चपरासियों की एक दशक पुरानी नियुक्तियों का नए सिरे से मूल्यांकन करने के लिए अपने बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक दोबारा बुलाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिकारियों की प्रशासनिक कमियों के कारण कर्मचारियों को उनकी आजीविका से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
यह निर्णय वैधानिक भर्ती नियमों के कड़े पालन और अदालतों के उस संवैधानिक दायित्व के बीच एक नाजुक संतुलन को संबोधित करता है, जिसके तहत उन कर्मचारियों के प्रति निष्पक्षता सुनिश्चित की जानी है जो एक उचित सार्वजनिक चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त हुए हैं और जिन्होंने वर्षों तक बेदाग सेवा दी है, लेकिन अब वे भर्ती करने वाले अधिकारियों की प्रक्रियात्मक कमियों के कारण नौकरी से हटाए जाने का सामना कर रहे हैं। इसके मूल में, यह विवाद कोर्ट को इस बात का परीक्षण करने के लिए प्रेरित करता है कि क्या भर्ती प्रक्रिया की हर एक छोटी खामी अनिवार्य रूप से कानून की नजर में नियुक्ति को शून्य बना देती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला उन अपीलकर्ताओं से जुड़ा है, जिन्हें साल 2014 में कुरुक्षेत्र, हरियाणा में स्थित ‘थानेसर कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसीडिंग सोसाइटी लिमिटेड’ (सोसाइटी) में क्लर्क-कम-सेल्समैन और चपरासी-कम-चौकीदार के नियमित पदों पर नियुक्त किया गया था। यह भर्ती प्रक्रिया हरियाणा के सहकारी समिति रजिस्ट्रार से मंजूरी मिलने के बाद तीन क्लर्क और चार चपरासी के पदों को भरने के लिए शुरू की गई थी।
इन पदों के लिए 11 जुलाई 2014 को समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित किया गया था, जिसके बाद 30 जुलाई 2014 को एक शुद्धिपत्र जारी किया गया। 11 अगस्त 2014 को एक उप-समिति द्वारा साक्षात्कार लिए गए और 13 अगस्त 2014 को सोसाइटी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने नियुक्तियों को मंजूरी दे दी। इसके बाद अपीलकर्ता सेवा में शामिल हुए और बिना किसी व्यक्तिगत धोखाधड़ी, हेरफेर या योग्यता की कमी के आरोपों के लगातार दस वर्षों से अधिक समय तक काम करते रहे।
हालांकि, सोसाइटी के दो सदस्यों ने 2015 में हरियाणा सहकारी समिति अधिनियम, 1984 की धारा 27 के तहत इन नियुक्तियों को चुनौती दी। उनका दावा था कि यह भर्ती ‘प्राइमरी कोऑपरेटिव मार्केटिंग-कम-प्रोसीडिंग सोसाइटीज लिमिटेड स्टाफ सर्विस रूल्स, 2003’ के संशोधित नियम 3 के उल्लंघन में की गई थी। साल 2011 में सोसाइटी द्वारा अपनाए गए इस नियम के अनुसार, नियुक्तियों का निर्णय उस बैठक में लिया जाना अनिवार्य है जिसमें सहायक रजिस्ट्रार (सहकारी समिति), निरीक्षक (सहकारी समिति) और हैफेड के जिला प्रबंधक उपस्थित हों और उनकी सहमति अनिवार्य हो। लेकिन 13 अगस्त 2014 को हुई बोर्ड बैठक में ये तीनों अधिकारी अनुपस्थित थे।
शिकायतकर्ताओं ने नियम 14(ए) के उल्लंघन का भी आरोप लगाया क्योंकि चयनित उम्मीदवारों ने क्षेत्र के सिविल सर्जन के बजाय निजी डॉक्टरों से मेडिकल सर्टिफिकेट जमा किए थे। इसके अलावा उन्होंने आरक्षण, स्वीकृत पदों की संख्या और ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के दिल्ली संस्करण में विज्ञापन प्रकाशित करने पर भी आपत्तियां उठाईं।
सहकारी समिति के अतिरिक्त रजिस्ट्रार ने 6 जून 2017 को इन नियुक्तियों को रद्द कर दिया, और हरियाणा सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव ने 29 सितंबर 2017 को इस फैसले की पुष्टि की। अपीलकर्ताओं ने इस आदेश को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल जज ने 22 अप्रैल 2024 को उनकी रिट याचिका खारिज करते हुए नियम 3 को अनिवार्य माना। इसके बाद 29 जुलाई 2025 को डिवीजन बेंच ने भी अपील को खारिज कर दिया, जिसके बाद अपीलकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि उन्हें एक पारदर्शी और योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से चुना गया था और बोर्ड की बैठक में कोरम की कमी या प्रशासनिक कमियों में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। ‘स्टेट ऑफ यूपी बनाम जोहरी मल’ (2004) मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि संस्थागत कमियों के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रक्रियात्मक अनियमितताओं के सुधार के सिद्धांत पर ‘राजस्थान लोक सेवा आयोग बनाम कैला देवी’ (2018) मामले पर भी भरोसा जताया। इसके अलावा, अपीलकर्ताओं ने सर्विस रूल्स, 2003 के नियम 35 का हवाला दिया, जो बोर्ड बैठकों के लिए तीन सदस्यों का कोरम तय करता है, और 1984 के अधिनियम की धारा 36 का हवाला दिया, जिसके अनुसार प्रक्रियात्मक खामियों के कारण सहकारी समितियों के कार्यों को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
दूसरी ओर, विरोध करने वाले शिकायतकर्ताओं ने तर्क दिया कि ये नियुक्तियां शुरुआत से ही शून्य थीं। उन्होंने कहा कि नियम 3 और नियम 14(ए) अनिवार्य थे और 13 अगस्त 2014 की बैठक में नामित सरकारी अधिकारियों की पूर्ण अनुपस्थिति ने बोर्ड के निर्णय को ही अवैध बना दिया। उन्होंने ‘रामजीत सिंह कर्दम बनाम संजीव कुमार’ (2020) मामले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि वैधानिक नियमों के उल्लंघन में की गई नियुक्तियों के पक्ष में कोई सहानुभूति या निष्पक्षता का दावा नहीं किया जा सकता। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ताओं को 19 अगस्त 2025 को सेवा से मुक्त कर दिया गया है।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया को तीन अलग-अलग चरणों में विभाजित किया:
- विज्ञापन के माध्यम से रिक्तियों की अधिसूचना और पात्र उम्मीदवारों को आमंत्रित करना।
- साक्षात्कार का संचालन और चयन।
- सक्षम प्राधिकारी द्वारा अंतिम नियुक्ति का निर्णय लेना।
अदालत ने पाया कि पहले दो चरणों में कोई बुनियादी खामी नहीं थी। विज्ञापन के जरिए सभी पात्र उम्मीदवारों को उचित सूचना दी गई थी, और साक्षात्कार भी बिना किसी धोखाधड़ी, हेरफेर या अपात्र उम्मीदवारों को शामिल किए बिना पूरी पारदर्शिता के साथ आयोजित किया गया था।
नियम 3 का विश्लेषण करते हुए, कोर्ट ने टिप्पणी की कि नियुक्तियों के दौरान गैर-निर्वाचित सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति का उद्देश्य केवल यह सत्यापित करना था कि भर्ती के नियमों का सख्ती से पालन किया जा रहा है या नहीं। हालांकि, अदालत ने माना कि उनकी अनुपस्थिति पूरी चयन प्रक्रिया की वैधता को समाप्त नहीं करती है। अदालत ने टिप्पणी की: भले ही सहकारी समिति की सेवाओं में नियुक्तियों को अंतिम रूप देने के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक में इन सरकारी सदस्यों की उपस्थिति को अनिवार्य बनाया गया हो, लेकिन उनकी अनुपस्थिति से नियुक्तियां अवैध नहीं होंगी क्योंकि उनकी भूमिका मुख्य रूप से पर्यवेक्षी प्रकृति की है।
अदालत ने माना कि नियुक्ति का तीसरा चरण पहले दो चरणों से पूरी तरह अलग किया जा सकता है। अंतिम अनुमोदन के स्तर पर कोई भी कमी एक सुधार योग्य अनियमितता है, न कि कोई ऐसी घातक अवैधता जो पूरे चयन को शून्य बना दे। कोर्ट ने माना: हमारे विचार में नियम 3 का उल्लंघन पूरी भर्ती प्रक्रिया को अवैध नहीं बना सकता, जो अन्यथा किसी मौलिक त्रुटि या दोष से प्रभावित नहीं है।
इसके अलावा, कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों के संरक्षण में दस से अधिक वर्षों तक सेवा की है।
कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया और 29 जुलाई 2025 के हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के फैसले को रद्द कर दिया।
अदालत ने सहकारी समिति को निर्देश दिया कि वह एक महीने के भीतर बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की बैठक दोबारा बुलाकर याचिकाकर्ताओं की नियुक्तियों के अंतिम चरण पर नए सिरे से निर्णय ले। इस बैठक में सहायक रजिस्ट्रार, सहकारी समिति निरीक्षक और हैफेड के जिला प्रबंधक को अनिवार्य रूप से उपस्थित रहना होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट रूप से निर्देश दिया कि दोबारा बुलाई गई बोर्ड बैठक को भर्ती के पहले दो चरणों—यानी विज्ञापन के प्रचार-प्रसार की पर्याप्तता या साक्षात्कार के संचालन की वैधता—की दोबारा जांच करने का अधिकार नहीं होगा। इसके बजाय, बोर्ड को अपनी समीक्षा केवल इस बात के सत्यापन तक सीमित रखनी होगी कि याचिकाकर्ता आवश्यक योग्यताएं पूरी करते थे या नहीं, वे किसी भी अयोग्यता से ग्रस्त तो नहीं थे, क्या वे वास्तव में चयन समिति द्वारा अनुशंसित उम्मीदवार थे, और क्या नियुक्तियां करते समय किसी अधिक योग्य उम्मीदवार की अनदेखी की गई थी।
यदि याचिकाकर्ता इस नई समीक्षा में योग्य पाए जाते हैं, तो उन्हें उनके संबंधित पदों पर फिर से नियुक्त किया जाएगा। उनकी पिछली सेवा को सभी उद्देश्यों के लिए गिना जाएगा, हालांकि वे 19 अगस्त 2025 को नौकरी से हटाए जाने के बाद की अवधि के लिए किसी भी बकाया वेतन या भत्ते के हकदार नहीं होंगे।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: गौरव मेहला और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या वर्ष 2026 स्पेशल लीव पिटीशन सिविल संख्या 23061 वर्ष 2025
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 11 जून 2026

