वाहन की सक्रिय भूमिका के बिना मोटर दुर्घटना का दावा विचारणीय नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने मोटर वाहन अधिनियम की धारा 166 के दायरे को स्पष्ट किया

सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि यदि मोटर वाहन की दुर्घटना में कोई सक्रिय या प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है, तो मोटर वाहन अधिनियम, 1988 (MVA) के तहत दुर्घटना का दावा विचारणीय नहीं है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 166 के तहत दावा सफल होने के लिए चोट और वाहन के उपयोग के बीच एक प्रत्यक्ष कारण संबंध (proximate causal relationship) होना अनिवार्य है। यह निर्णय बृहत् बेंगलुरु महानगर पालिका (BBMP) द्वारा दायर एक अपील पर आया है। पालिका ने उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें भारी बारिश के दौरान सड़क किनारे लगे एक पुराने पेड़ की शाखा खड़े ऑटो-रिक्शा पर गिरने से घायल हुए यात्री के मामले में उस पर देयता (लायबिलिटी) तय की गई थी। इस कानूनी प्रश्न को नागरिक निकाय के पक्ष में हल करते हुए, कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग किया और मानवीय आधार पर पीड़ित का मुआवजा बढ़ाकर 25 लाख रुपये कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना 23 जून 2007 की है, जब प्रतिवादी नंबर 1, के.के. उमेश कुमार, बेंगलुरु के क्वींस रोड से चिन्नास्वामी स्टेडियम जा रहे थे। भारी बारिश के कारण, उन्होंने ऑटो चालक से वाहन को सड़क किनारे रोकने का अनुरोध किया। जब ऑटो-रिक्शा सड़क किनारे खड़े एक पुराने पेड़ के नीचे रुका था, तभी पेड़ की एक बड़ी शाखा टूटकर ऑटो के ऊपर गिर गई। इस हादसे में उन्हें रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोटें आईं और वे शारीरिक रूप से अक्षम हो गए।

इसके बाद पीड़ित ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT), बेंगलुरु के समक्ष याचिका दायर कर 50 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी। अप्रैल 2013 में ट्रिब्यूनल ने इसे प्राकृतिक आपदा मानते हुए याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट ने देरी के आधार पर अपील खारिज कर दी थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दिए जाने पर मामला हाईकोर्ट को वापस भेजा गया, जिसने योग्यता के आधार पर सुनवाई की।

दूसरे दौर में हाईकोर्ट ने 17,10,500 रुपये का मुआवजा मंजूर किया। हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि इस मुआवजे का 50% ऑटो के बीमाकर्ता (इंस्योरर), 25% कर्नाटक सरकार के बागवानी विभाग और शेष 25% बीबीएमपी द्वारा भुगतान किया जाएगा। बीबीएमपी ने देयता के इस विभाजन को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षों की दलीलें

बीबीएमपी और कर्नाटक राज्य के बागवानी विभाग ने तर्क दिया कि वे इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने दलील दी कि पेड़ की शाखा का गिरना एक प्राकृतिक घटना थी जिस पर अधिकारियों का कोई नियंत्रण नहीं था। उन्होंने कानूनन “दैवीय कृत्य” या “एक्ट ऑफ गॉड” (Vis Major) का बचाव पेश किया।

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दैवीय कृत्य और नागरिक देयता पर कोर्ट का विश्लेषण

इन दलीलों के मूल्यांकन के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐतिहासिक और वैधानिक मिसालों का अध्ययन किया। कोर्ट ने निकोल्स बनाम मार्सलैंड (1876) जैसे अंग्रेजी फैसलों का संदर्भ दिया, जिसमें सख्त देयता (strict liability) के खिलाफ “दैवीय कृत्य” के बचाव को स्वीकार किया गया था। कोर्ट ने ग्रीनोक कॉर्पोरेशन बनाम कैलेडोनियन रेलवे कंपनी (1917) मामले का भी उल्लेख किया। इसके अलावा, 1897 के अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘द मैजेस्टिक’ का भी हवाला दिया गया, जिसमें दैवीय कृत्य को “मनुष्य के हस्तक्षेप और सार्वजनिक शत्रुओं के बिना एक अपरिहार्य दुर्घटना” और “सभी मानवीय प्रयासों और बुद्धिमत्ता के बावजूद होने वाली हानि” के रूप में परिभाषित किया गया था।

भारतीय न्यायशास्त्र पर चर्चा करते हुए कोर्ट ने एस. वेदांताचार्य बनाम हाईवे विभाग, दक्षिण आरकोट (1987) और वोहरा सादिकभाई रजाकभाई बनाम गुजरात राज्य (2016) के फैसलों का संदर्भ लिया। दूसरे मामले में दैवीय कृत्य के कानूनी मानक को स्पष्ट करते हुए कहा गया था:

“दैवीय कृत्य वह है जो प्रकृति का एक प्रत्यक्ष, हिंसक, अचानक और अनूठा कार्य हो, जिसे किसी भी स्तर की क्षमता से पहले से न देखा जा सके, या यदि देख भी लिया जाए, तो किसी भी मानवीय देखभाल और कौशल से उसका विरोध न किया जा सके। आमतौर पर वे कृत्य जो प्रकृति की बुनियादी ताकतों के कारण होते हैं और जिनमें मनुष्य या किसी अन्य एजेंसी का कोई हस्तक्षेप नहीं होता, वे दैवीय कृत्य की श्रेणी में आते हैं।”

इसके अलावा, कोर्ट ने राजकोट म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम मंजुलबेन जयंतीलाल नकुम (1997) मामले का सहारा लिया, जो राहगीर पर पेड़ गिरने के मामले में नगर निगम प्राधिकारियों की लापरवाही और कर्तव्य से संबंधित था। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी:

“जब प्रतिवादी पर संपत्ति या व्यक्ति को शारीरिक खतरे के किसी छिपे हुए स्रोत से बचाने के लिए देखभाल करने का वैधानिक कर्तव्य होता है, तो वह लापरवाही के दीवानी अपकृत्य (टॉर्ट) के लिए उत्तरदायी होगा। यदि यह छुपा हुआ दोष व्यक्ति को वास्तविक शारीरिक क्षति पहुँचाता है, तो प्रतिवादी नुकसान की भरपाई के लिए उत्तरदायी है। वैधानिक प्राधिकारी के लापरवाही पूर्ण कृत्य या चूक की जांच उस वैधानिक प्रावधान के संदर्भ में की जानी चाहिए जो कर्तव्य और उसके परिणामी प्रभावों को सृजित करता है। यह लापरवाही पूर्ण कृत्य या चूक विशेष रूप से जनता या जनता के उस हिस्से को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से होनी चाहिए जिसका पीड़ित सदस्य था।”

इन नियमों को लागू करते हुए पीठ ने माना कि हालांकि नगर निगम का कर्तव्य है कि वह शहर के पेड़ों की देखभाल करे, लेकिन हर घटना का पूर्वानुमान लगाना असंभव है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“यह उम्मीद करना अवास्तविक होगा कि निगम के अधिकारी प्रत्येक पेड़ या झाड़ी पर निरंतर निगरानी रख सकते हैं।”

इसी तरह, कोर्ट ने कहा:

“यह पूरी तरह से अनुमान के दायरे में हो सकता है कि किसी भी समय किसी पुराने पेड़ की पुरानी शाखा गिर सकती है, लेकिन इसका समझदारी भरा समाधान यह नहीं हो सकता कि सभी शाखाओं को आरी से काट दिया जाए।”

मोटर वाहन अधिनियम का दायरा: “उपयोग” और “तत्काल कारण”

सुप्रीम कोर्ट ने फिर इस मूल कानूनी प्रश्न पर विचार किया कि क्या किसी खड़े वाहन पर पेड़ की शाखा का गिरना एमवी एक्ट की धारा 165(1) और 166 के तहत मोटर वाहन दुर्घटना माना जाएगा।

कोर्ट ने शिवाजी दयानू पाटिल बनाम वत्सला उत्तम मोरे (1991) मामले का संदर्भ दिया, जिसमें यह तय किया गया था कि मोटर वाहन के “उपयोग” का व्यापक अर्थ है और इसमें वह समय भी शामिल है जब वाहन खड़ा या बंद रहता है। कोर्ट ने ‘गवर्नमेंट इंश्योरेंस ऑफिस ऑफ एन.एस.डब्ल्यू. बनाम आर.जे. ग्रीन’ (ऑस्ट्रेलियाई हाईकोर्ट का मामला) का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि “उत्पन्न होने वाले” (arising out of) वाक्यांश में “के कारण” (caused by) की तुलना में कम निकटता की आवश्यकता होती है।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कारण के आधार पर वर्तमान मामले को अलग माना। कोर्ट ने पाया कि इस दुर्घटना में ऑटो-रिक्शा की अपनी कोई सक्रिय भूमिका नहीं थी। यदि पीड़ित सड़क किनारे खड़े होकर बारिश से बचने का प्रयास कर रहा होता, तो भी यही दुर्घटना घटती। इसलिए, वाहन चोट लगने का तत्काल कारण नहीं था, जिससे धारा 166 के तहत दावा दायर करना उपयुक्त नहीं माना जा सकता।

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कोर्ट का निर्णय

कानूनी प्रश्न को अपीलकर्ता (बीबीएमपी) के पक्ष में तय करते हुए भी सुप्रीम कोर्ट ने पीड़ित को बिना किसी वित्तीय राहत के छोड़ने से इनकार कर दिया। मेडिकल रिपोर्ट में पीड़ित की चोटों की गंभीरता का विवरण इस प्रकार था:

“1. दोनों निचले अंगों में पूर्ण पक्षाघात (पैराप्लेगिया) के साथ मूत्राशय और आंत पर नियंत्रण की पूरी समाप्ति। 2. रीढ़ की हड्डी के एक्स-रे से पता चलता है कि फ्रैक्चर ठीक हो रहा है और इंप्लांट्स की स्थिति अच्छी है।”

ऐसी दुखद परिस्थितियों में न्यायपालिका के कर्तव्य को रेखांकित करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“एक व्यक्ति जिसने जीवन बदल देने वाली इतनी गंभीर चोटें झेली हैं, उसे बिना किसी वित्तीय सहायता के अपने हाल पर छोड़ देना न्याय की अंतरात्मा को स्वीकार्य नहीं है।”

पूर्ण न्याय करने के लिए अपनी असाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हुए कोर्ट ने माना:

“यह देश की सर्वोच्च अदालत के रूप में हमारे अधिकार क्षेत्र में आता है कि हम यह सुनिश्चित करें कि कानून को मानवीय रूप से लागू किया जाए, विशेष रूप से ऐसे मामलों में जो संविधान के कल्याणकारी सिद्धांतों के अनुकूल हों।”

नतीजतन, संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत सुप्रीम कोर्ट ने कुल मुआवजे को बढ़ाकर 25,00,000 रुपये कर दिया। इसके साथ ही हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित ब्याज भी देय होगा, जिसकी गणना दावा याचिका दायर करने की तिथि से की जाएगी। देयता का विभाजन (25% बीबीएमपी, 50% बीमाकर्ता, 25% बागवानी विभाग) अपरिवर्तित रहेगा। सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर यह राशि सीधे प्रतिवादी के बैंक खाते में जमा करने का निर्देश दिया गया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: द कमिश्नर, बृहत् बेंगलुरु महानगर पालिका बनाम के.के. उमेश कुमार एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 1039/2021 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 11 जून, 2026

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