गृहणियां राष्ट्र निर्माता और आर्थिक इकाई हैं; सुप्रीम कोर्ट ने दुर्घटना दावों में ‘घरेलू देखभाल के नुकसान’ के तहत अतिरिक्त मुआवजा देने का निर्देश दिया

गृहणियों की अमूल्य भूमिका को सम्मान देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि घर संभालने वाली महिलाएं वास्तव में “राष्ट्र निर्माता” हैं, जिनके अवैतनिक श्रम को मोटर दुर्घटना मुआवजा दावों में उचित मूल्य मिलना चाहिए। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की खंडपीठ ने एक मृत गृहणी के कानूनी वारिसों को मिलने वाले मुआवजे को हाईकोर्ट द्वारा तय किए गए ₹8,43,400/- से बढ़ाकर ₹62,77,900/- कर दिया। कोर्ट ने घरेलू काम और देखभाल को कम आंकने की व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ‘घरेलू देखभाल का नुकसान’ (लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर) नाम से एक नया मुआवजा मद भी शुरू किया। इसके साथ ही कोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावों के निपटारे में होने वाली अत्यधिक देरी को भी एक गंभीर समस्या माना।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 25 नवंबर 2001 का है, जब दावेदार की पत्नी की सिरसा से फतेहाबाद जाते समय एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। यह हादसा विपक्षी वाहन के चालक द्वारा लापरवाही और तेज गति से गाड़ी चलाने के कारण हुआ था।

सिरसा के मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने 18 दिसंबर 2003 को दावा याचिका स्वीकार करते हुए ₹2,42,000/- का मुआवजा दिया था। इस मुआवजे को बढ़ाने के लिए दावेदारों ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया।

वर्ष 2011 में हाईकोर्ट में लगी आग की एक दुखद घटना में हजारों फाइलें आंशिक या पूर्ण रूप से नष्ट हो गईं, जिसके कारण यह मामला दो दशकों तक लंबित रहा। आखिरकार, हाईकोर्ट ने 11 दिसंबर 2024 को अपील पर निर्णय देते हुए मुआवजे को बढ़ाकर ब्याज सहित ₹8,43,400/- किया। इस बेहद कम मूल्यांकन से असंतुष्ट होकर दावेदारों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

अत्यधिक देरी की समस्या

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि यह कानूनी लड़ाई पिछले पच्चीस वर्षों से चल रही है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2011 में आग लगने की घटना के बावजूद, फाइलों को दोबारा तैयार करने और निर्णय देने में 14 साल की देरी को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस करोल की अध्यक्षता वाली पीठों द्वारा तय की गई 123 अपीलों के आंकड़ों का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट में मोटर दुर्घटना दावों के निपटारे में औसतन 8 साल और न्यायाधिकरणों में लगभग 6 साल का समय लगता है। पीठ ने टिप्पणी की:

“हालांकि किसी ऐसे व्यक्ति के नुकसान की पूरी भरपाई करना कभी संभव नहीं है जो परिवार का एक अभिन्न अंग रहा हो, लेकिन ‘उचित और न्यायसंगत’ मुआवजे की अवधारणा के लिए आवश्यक है कि दावेदारों को इतनी धनराशि दी जाए जो उन्हें यथासंभव उसी स्थिति में ले जाए जैसी वे अपने प्रियजन की असामयिक मृत्यु न होने पर होते। किसी भी कारण से जब इसमें बीस साल लग जाते हैं, तो पीड़ित का दुख और अधिक बढ़ जाता है।”

अदालत का विश्लेषण: गृहणी एक ‘राष्ट्र निर्माता’ के रूप में

कोर्ट ने गृहणियों के आर्थिक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक योगदान का विस्तृत विश्लेषण किया और पारंपरिक रूढ़ियों को खारिज किया। पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस करोल ने घरेलू काम को उसका पूरा मूल्य देने में अदालतों के ऐतिहासिक संकोच पर सवाल उठाया:

“जब भारतीय समाज में ‘घर की महिला’ को ‘गृहस्वामिनी’ कहा जाता है, तो फिर हम इस मामले जैसे सवालों पर अंधेरे में क्यों टटोल रहे हैं।”

कोर्ट ने इस पारंपरिक धारणा की कड़ी आलोचना की कि गृहणियां केवल कमाने वाले सदस्यों पर “आश्रित” होती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया:

“हमारी राय में, एक गृहणी को कमाने वाले सदस्यों पर आश्रित बताना विरोधाभासी है, जबकि वास्तव में घर का कामकाज काफी हद तक गृहणी पर ही निर्भर करता है। कमाने वाले सदस्य वास्तव में गृहणी पर पूरी तरह निर्भर होते हैं, लेकिन अफसोस कि इस वास्तविकता को वह सम्मान नहीं मिलता जिसकी वह हकदार है।”

अर्थशास्त्री सर सेसिल पिगु के सिद्धांतों और महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन समिति (सीईडीएडब्ल्यू) की 1991 की सिफारिशों का हवाला देते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बिना वेतन के की जाने वाली घरेलू देखभाल सीधे तौर पर नौकरीपेशा लोगों की आर्थिक उत्पादकता को आधार प्रदान करती है। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“सीधे शब्दों में कहें तो, ‘गृहणियां’ वास्तव में ‘राष्ट्र निर्माता’ हैं और उन्हें इसी रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।”

पीठ ने आगे कहा कि घरेलू कामकाज केवल रोजमर्रा के काम निपटाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश के लिए “मानव पूंजी” तैयार करने और पूरे परिवार को मानसिक व सामाजिक सुरक्षा देने का सबसे मजबूत माध्यम है।

“अब समय आ गया है कि जो अदृश्य है उसे दृश्यमान बनाया जाए या उस पर्दे को हटाया जाए ताकि जो आंशिक रूप से दिखाई दे रहा है वह खुलकर सामने आ सके।”

न्यायिक मिसालों की समीक्षा

अदालत ने गृहणियों के योगदान के मूल्यांकन से जुड़े पूर्व के कई महत्वपूर्ण निर्णयों की समीक्षा की:

  • लता वधवा बनाम बिहार राज्य (2001): इस मामले में तीन जजों की पीठ ने 34 से 59 वर्ष की आयु वर्ग की मृत गृहणियों के लिए ₹3,000/- प्रति माह की काल्पनिक आय के आधार पर मुआवजा तय करने की पद्धति को मंजूरी दी थी।
  • अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010): इसमें माना गया था कि एक पत्नी द्वारा परिवार को दी जाने वाली निस्वार्थ सेवाओं की तुलना किसी हाउसकीपर या घरेलू नौकर से नहीं की जा सकती।
  • राजेंद्र सिंह बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2020) और कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021): इन निर्णयों में 2019 के ‘टाइम यूज़ सर्वे’ का हवाला देते हुए घरेलू काम में फैले लैंगिक अंतर को रेखांकित किया गया था।
  • अरविंद कुमार पांडे बनाम गिरीश पांडे (2025): इस मामले में भी कोर्ट ने माना था कि गृहणी का योगदान अमूल्य और बेहद उच्च स्तर का होता है।
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इन मामलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दशकों पुरानी रूढ़िवादी काल्पनिक आय पर निर्भर रहना अनुचित है, क्योंकि केवल भावनात्मक क्षति के रूप में दिया जाने वाला ‘कंसोर्टियम’ (सहचर्य) का मद घर के प्रबंधक को खोने की आर्थिक सच्चाई की भरपाई नहीं कर पाता।

नया मद: ‘घरेलू देखभाल का नुकसान’

इस समस्या के समाधान के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक बिल्कुल नया मुआवजा मद जोड़ने का निर्देश दिया:

“तीन मुख्य मदों (घरेलू कामकाज के सुचारू संचालन में गृहणी का योगदान, बच्चों के लिए मातृ सहयोग का नुकसान और पति के लिए जीवनसाथी के सहयोग का नुकसान/माता-पिता के लिए अपने वयस्क बच्चे की देखभाल का नुकसान) के लिए एकमुश्त ₹30,000/- की राशि ‘घरेलू देखभाल के नुकसान’ के तहत जोड़ी जाएगी, बशर्ते कि किसी मामले में ये तीनों परिस्थितियां पूरी होती हों।”

यह ₹30,000/- की मासिक राशि घर से बाहर न कमाने वाली महिलाओं के दावों में न्यूनतम बुनियादी आय (स्टैंड-इन इनकम) का काम करेगी। यदि महिला नौकरीपेशा या कामकाजी है, तो यह राशि न्यायाधिकरण के समक्ष साबित की गई उसकी वास्तविक आय के अतिरिक्त दी जाएगी। इस राशि में हर तीन साल में संचयी रूप से 10% की वृद्धि की जाएगी।

कोर्ट ने इस बदलाव को नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017), राजेश बनाम राजबीर सिंह (2013) और मैग्मा जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम नानू राम (2018) में परिभाषित ‘कंसोर्टियम’ से पूरी तरह अलग बताया। कोर्ट ने माना कि कंसोर्टियम मुख्य रूप से भावनात्मक नुकसान से संबंधित है, जबकि ‘घरेलू देखभाल का नुकसान’ घरेलू काम के आर्थिक मूल्य से जुड़ा है।

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कोर्ट का निर्णय

इन नवीन सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ₹30,000/- प्रति माह (यानी ₹3,60,000/- वार्षिक) को आधार मानकर नए सिरे से गणना की।

इसमें भविष्य की संभावनाओं के लिए 40% (₹1,44,000/-) की वृद्धि की गई, 16 का मल्टीप्लायर लगाया गया, व्यक्तिगत खर्चों के लिए एक-चौथाई की कटौती की गई और कंसोर्टियम (₹1,93,600/-), संपत्ति के नुकसान (₹18,150/-) और अंतिम संस्कार के खर्च (₹18,150/-) को जोड़कर कुल मुआवजा ₹62,77,900/- तय किया।

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अदालत ने बीमा कंपनी को निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट द्वारा निर्धारित ब्याज दरों और शर्तों के अनुसार इस बढ़े हुए मुआवजे का भुगतान करे।

हाईकोर्ट और न्यायाधिकरणों के लिए निर्देश

मुकदमेबाजी में लगने वाले समय को कम करने और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कई दिशा-निर्देश जारी किए:

  1. अनिवार्य दस्तावेज: दावा दाखिल करते समय दावेदारों को जन्म तिथि का आधिकारिक प्रमाण (आधार कार्ड को छोड़कर), विकलांगता प्रमाण पत्र, आईटीआर या नियोक्ता द्वारा सत्यापित सैलरी स्लिप, मेडिकल बिल और अटेंडेंट खर्च का नोटरीकृत हलफनामा अनिवार्य रूप से संलग्न करना होगा।
  2. पुराने मामलों को प्राथमिकता: हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध किया गया है कि वे चार साल से अधिक समय से लंबित अपीलों को उनकी स्थापना की तारीख के आधार पर पहले सूचीबद्ध करने का निर्देश दें और आवश्यक होने पर जजों की बेंचों की संख्या बढ़ाएं।
  3. संक्षिप्त प्रक्रिया (समरी प्रोसीजर): यदि न्यायाधिकरण मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 169 के तहत संक्षिप्त प्रक्रिया नहीं अपनाते हैं, तो उन्हें इसका कारण लिखित में दर्ज करना होगा।
  4. शब्दावली में सुधार: कोर्ट ने उम्मीद जताई कि भविष्य में गृहणियों के योगदान को सही सम्मान देने के लिए “हाउसवाइफ/होममेकर” के स्थान पर “राष्ट्र निर्माता” (नेशन बिल्डर) शब्द का प्रयोग किया जाएगा।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: शिशु पाल उर्फ शीश राम एवं अन्य बनाम सुरजीत एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या… ऑफ 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 33915 ऑफ 2025)
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह
निर्णय की तिथि: 11 जून, 2026

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