राजू पाल हत्याकांड: दोषी आबिद को इलाहाबाद हाईकोर्ट से मिली जमानत, सजा स्थगित

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साल 2005 के बहुचर्चित बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड में दोषी करार दिए गए आबिद को जमानत दे दी है। इसके साथ ही अदालत ने उसकी आपराधिक अपील पर अंतिम फैसला आने तक जेल की सजा को भी स्थगित रखने का आदेश दिया है।

अपील में देरी के कारण मिली राहत

जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया। पीठ ने टिप्पणी की कि आबिद की आपराधिक अपील साल 2024 से लंबित है और निकट भविष्य में इस पर अंतिम सुनवाई पूरी होने की संभावना बेहद कम है। इसी आधार पर अदालत ने अपील का निपटारा होने तक आबिद को जमानत पर रिहा करने की अनुमति दी।

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चश्मदीद गवाहों ने नहीं की पहचान

बीते 29 मई को जारी अपने आदेश में हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में कुछ बड़ी कमियों को रेखांकित किया। अदालत ने पाया कि पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट के आधार पर जब गवाहों के बयान दर्ज किए गए थे, तब किसी भी कथित चश्मदीद गवाह ने आबिद की पहचान हमलावर के रूप में नहीं की थी। इसके साथ ही, जांच के दौरान पुलिस ने आबिद की पहचान स्थापित करने के लिए कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) भी नहीं कराई थी।

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बचाव पक्ष ने सबूतों के अभाव पर उठाए सवाल

आबिद के वकील ने अदालत में दलील दी थी कि घटना के समय दर्ज कराई गई मूल एफआईआर में उनके मुवक्किल का नाम शामिल नहीं था। बचाव पक्ष का कहना था कि पुलिस ने आबिद के खिलाफ पूरी कार्रवाई केवल मामले के अन्य सह-आरोपियों के बयानों के आधार पर शुरू की थी। इसके अलावा, आबिद के पास से किसी भी प्रकार की आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई थी।

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राजनीतिक रंजिश में हुई थी हत्या

यह पूरा मामला 25 जनवरी 2005 का है, जब उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में तत्कालीन बसपा विधायक राजू पाल की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड की मुख्य वजह राजनीतिक दुश्मनी थी। दरअसल, राजू पाल ने साल 2004 के विधानसभा उपचुनाव में प्रयागराज पश्चिम सीट से माफिया अतीक अहमद के भाई अशरफ को शिकस्त दी थी, जिसके बाद से दोनों पक्षों में गहरा विवाद चल रहा था।

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