दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पति-पत्नी द्वारा एक-दूसरे पर लगाए गए क्रूरता के अलग-अलग आरोपों को आपसी सहमति से विवाह विच्छेद का आधार नहीं माना जा सकता। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए फैमिली कोर्ट के मार्च 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें दोनों पक्षों के बीच चल रहे विवादित तलाक के मुकदमे को आपसी सहमति से तलाक की डिक्री में बदल दिया गया था।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को मूल विवादित मुकदमे को दोबारा बहाल करने, जरूरी कानूनी बिंदु तय करने, दोनों पक्षों को अपने साक्ष्य पेश करने की अनुमति देने और गुण-दोष के आधार पर मामले का निपटारा करने का निर्देश दिया है।
पीठ ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि महज इसलिए कि दोनों जीवनसाथी अलग-अलग तौर पर शादी को खत्म करना चाहते हैं, इसे हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13B के तहत आपसी सहमति की कानूनी परिभाषा के दायरे में नहीं लाया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि एक पक्ष क्रूरता के आधार पर तलाक मांग सकता है, जबकि वह दूसरे पक्ष द्वारा लगाए गए आरोपों और आचरण का पूरी तरह विरोध भी कर रहा हो। ऐसी स्थिति में, दोनों पक्षों का अंतिम उद्देश्य भले ही शादी को खत्म करना हो, लेकिन उनके विरोधी दावे अदालती मुकदमे के जुझारू स्वरूप को बनाए रखते हैं।
यह मामला जनवरी 2023 में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई एक शादी से जुड़ा है। इस दंपती की कोई संतान नहीं थी और दोनों जनवरी 2024 से ही अलग रह रहे थे।
पति ने बाद में फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक का मुकदमा दायर किया था। पत्नी ने कोर्ट में पेश होकर अपना लिखित बयान दर्ज कराया और साथ ही धारा 23A के तहत एक काउंटर-क्लेम दायर कर पति पर क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की।
मार्च 2025 में, फैमिली कोर्ट ने पत्नी का लिखित बयान और काउंटर-क्लेम रिकॉर्ड पर लिया। कोर्ट ने उसी दिन दोनों पक्षों के इस मुकदमे को धारा 13B के तहत आपसी सहमति से तलाक के रूप में मंजूर कर लिया। इस फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर कर तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट क्रूरता के आरोपों वाले विवादित मामले को आपसी सहमति के तलाक में नहीं बदल सकता था।
पत्नी की ओर से पेश वकील अंकित गुप्ता ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने धारा 13(1)(ia) के तहत दायर और विवादित मुकदमे में धारा 13B के तहत आपसी सहमति की डिक्री देकर अपने अधिकार क्षेत्र का पूरी तरह उल्लंघन किया है। गुप्ता ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक की अनिवार्य कानूनी शर्तें इस मामले में गायब थीं। केवल इसलिए कि पति-पत्नी ने अलग-अलग याचिकाओं में एक-दूसरे पर आरोप लगाते हुए तलाक मांगा था, कोर्ट आपसी सहमति की कल्पना नहीं कर सकता। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रक्रिया में सुलह का कोई प्रयास नहीं किया गया और न ही पक्षों को साक्ष्य पेश करने या आरोपों पर बहस का अवसर दिया गया।
इसके विपरीत, पति का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील अन्नू शर्मा ने दलील दी कि इस अपील में कोई दम नहीं है और फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। शर्मा ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने सही दर्ज किया था कि दोनों पक्ष जनवरी 2024 से अलग रह रहे हैं और उनके बीच कोई वैवाहिक संबंध शेष नहीं बचा है। ऐसी स्थिति में, जहां सुलह की कोई गुंजाइश नहीं थी, फैमिली कोर्ट का मुकदमेबाजी को लंबा खींचने के बजाय जल्द खत्म करने का निर्णय पूरी तरह उचित था।
अपने निर्णय में हाईकोर्ट ने दोष-आधारित और सहमति-आधारित तलाक के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट किया। पीठ ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 दोष-आधारित तलाक से संबंधित है, जिसमें कोर्ट को एक पक्ष द्वारा दूसरे पर लगाए गए वैवाहिक अपराधों की न्यायिक जांच करनी होती है। वहीं, धारा 13B आपसी सहमति से संबंधित है, जहां डिक्री का आधार किसी पक्ष की गलती नहीं, बल्कि दोनों पक्षों का विवाह समाप्त करने का साझा निर्णय होता है।
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि जहां क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका कोई भी एक पक्ष अकेले दायर कर सकता है, वहीं आपसी सहमति से तलाक के लिए दोनों पक्षों द्वारा संयुक्त याचिका दायर करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति का निर्णय साझा होना चाहिए और यह सहमति उस समय भी बनी रहनी चाहिए जब कोर्ट अंतिम डिक्री पारित कर रहा हो। संयुक्त याचिका और उसके बाद दूसरे प्रस्ताव की यह दोहरी कानूनी आवश्यकता यह सुनिश्चित करने के लिए है कि दोनों पक्षों की सहमति वास्तविक, स्वैच्छिक और कार्यवाही के अंत तक बनी रहे।

