केस के रिकॉर्ड खो जाने से अंतहीन जांच को सही नहीं ठहराया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने 18 साल पुराने लंबित आपराधिक मामले में किया हस्तक्षेप

आपराधिक मामलों की जांच पूरी करने में लगभग दो दशकों की अत्यधिक देरी पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि त्वरित सुनवाई के अधिकार की रक्षा के लिए संवैधानिक अदालतों को हस्तक्षेप करना ही होगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने गुजरात हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज करते हुए यह निर्णय दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने साल 2007 से लंबित एक आपराधिक शिकायत में पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केस के रिकॉर्ड खो जाने को आधार बनाकर जांच को अनिश्चितकाल के लिए लंबित नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने गुजरात सरकार और भिलोड़ा पुलिस स्टेशन को छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने का कड़ा निर्देश दिया है।

मामले की पृष्ठभूमि

इस विवाद की शुरुआत 14 सितंबर 2007 को हुई थी, जब अपीलकर्ताओं के पिता (मूल शिकायतकर्ता) ने भिलोड़ा के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास (जेएमएफसी) के समक्ष एक आपराधिक शिकायत दर्ज कराई थी। यह शिकायत प्रतिवादी संख्या 1 से 4 के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 120बी, 406, 420, 463, 468, 471 और 114 के तहत दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि भिलोड़ा गांव में स्थित सर्वे नंबर 761 की संपत्ति उनकी स्व-अर्जित संपत्ति थी, जिसे उन्होंने 11 दिसंबर 1975 को खरीदा था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि जब वह 5 फरवरी 2002 से 21 मार्च 2002 के बीच हज यात्रा पर गए हुए थे, तब आरोपियों ने उनके जाली हस्ताक्षर कर एक फर्जी बंटवारा विलेख (पार्टीशन डीड) और फर्जी बिक्री विलेख (सेल डीड) तैयार कर लिया और उसके आधार पर राजस्व रिकॉर्ड में अपने नाम दर्ज करवा लिए।

इसके बाद अगले कई वर्षों तक मूल शिकायतकर्ता को अपनी शिकायत पर कार्रवाई के लिए विभिन्न स्तरों पर कानूनी संघर्ष करना पड़ा:

  • 10 अक्टूबर 2014 को पुलिस ने जेएमएफसी के समक्ष “सी-समरी” रिपोर्ट पेश की, जिसे मजिस्ट्रेट ने खारिज कर दिया और पुलिस को 60 दिनों के भीतर आगे की जांच पूरी करने का निर्देश दिया।
  • इसके बाद शिकायतकर्ता की याचिका पर सुनवाई करते हुए गुजरात हाईकोर्ट ने 20 जुलाई 2017 को छह सप्ताह के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया। कोर्ट ने इस बात को भी रिकॉर्ड पर लिया कि जांच के दौरान जब्त की गई कुछ सामग्री पुलिस हिरासत से गायब हो गई थी।
  • 29 अगस्त 2017 को एक फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) रिपोर्ट तैयार की गई, जिसे 27 नवंबर 2017 को जेएमएफसी को भेजा गया। इस रिपोर्ट में पुष्टि की गई कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के जाली हस्ताक्षर किए थे और फर्जी दस्तावेज तैयार किए थे। इस आधार पर जेएमएफसी ने पुलिस को आगे की कार्रवाई और विस्तृत जांच करने का निर्देश दिया।
  • जांच में लगातार हो रही देरी के कारण शिकायतकर्ता ने 21 जनवरी 2018 को फिर से जेएमएफसी के समक्ष आवेदन किया, जिस पर मजिस्ट्रेट ने जांच अधिकारी को 10 दिनों के भीतर जांच की स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया।
  • 14 सितंबर 2022 को अतिरिक्त न्यायिक मजिस्ट्रेट, भिलोड़ा ने एक बार फिर जांच अधिकारी को जांच पूरी कर कानून के अनुसार चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश दिया।
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इन तमाम न्यायिक निर्देशों के बावजूद पुलिस द्वारा कोई अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं की गई। हारकर मूल शिकायतकर्ता ने गुजरात हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने का निर्देश देने की मांग की। हालांकि, 26 जून 2025 को हाईकोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि चूंकि जेएमएफसी पहले ही ऐसा आदेश दे चुके हैं, इसलिए शिकायतकर्ता को मजिस्ट्रेट कोर्ट के समक्ष ही उचित कार्यवाही शुरू करनी चाहिए थी और अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट के हस्तक्षेप का कोई मामला नहीं बनता है। इस बीच मूल शिकायतकर्ता का निधन हो गया, जिसके बाद उनके उत्तराधिकारियों (अपीलकर्ताओं) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

गुजरात सरकार ने जांच में हुई इस भारी देरी का बचाव करते हुए अपनी कठिनाइयों को कोर्ट के सामने रखा। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि जांच के दौरान जब्त की गई सामग्रियों को एफएसएल जांच के लिए भेजा गया था, जिसने शिकायतकर्ता के हस्ताक्षरों के फर्जी होने की पुष्टि की थी। इसके बाद एक विस्तृत रिपोर्ट और मूल केस डायरी भिलोड़ा पुलिस स्टेशन के जावक नंबर 564/15 के जरिए जेएमएफसी कोर्ट भेजी गई थी, लेकिन ये महत्वपूर्ण दस्तावेज रास्ते में ही कहीं खो गए और कभी जेएमएफसी कोर्ट तक नहीं पहुंच पाए।

राज्य सरकार ने यह भी कहा कि 20 जुलाई 2017 को हाईकोर्ट द्वारा दोबारा जांच के आदेश दिए जाने के बाद भी मूल दस्तावेज पूरी तरह से लापता रहे। हालांकि, जिम्मेदार पुलिस अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्यवाही की गई और कानून के अनुसार कार्रवाई भी की गई, लेकिन मूल केस रिकॉर्ड की अनुपस्थिति और गवाहों का सुराग न मिलने के कारण जांच को किसी तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचाया जा सका।

कोर्ट का विश्लेषण

मामले के तथ्यों का आकलन करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जांच में हुई अत्यधिक देरी और हाईकोर्ट द्वारा हस्तक्षेप करने से इनकार किए जाने पर कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने इस स्थिति पर गंभीर खेद जताते हुए टिप्पणी की:

“मौजूदा मामला एक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है जहां निचली अदालतों का दरवाजा बार-बार खटखटाने के बावजूद, आपराधिक शिकायत की जांच में लगभग दो दशकों की अत्यधिक देरी हुई है, जो इस अदालत को हस्तक्षेप करने के लिए मजबूर करती है।”

इस स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कानून के स्थापित सिद्धांत का उल्लेख किया और कहा:

“देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के बराबर है।”

इसके साथ ही पीठ ने स्पष्ट किया कि:

“त्वरित सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से आंतरिक रूप से जुड़ा हुआ है।” और जांच का समय पर पूरा होना इस अधिकार का एक अनिवार्य हिस्सा है।

सुप्रीम कोर्ट ने त्वरित जांच और न्यायिक निगरानी के विकास को समझाने के लिए अपने एक पूर्व फैसले रॉबर्ट लालचुंगनुंगा चोंगथू बनाम बिहार राज्य (2025 एससीसी ऑनलाइन एससी 2511) का हवाला दिया। इस फैसले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:

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“इस न्यायालय के विभिन्न फैसलों में त्वरित सुनवाई के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 21 के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में रेखांकित किया गया है। जांच को समय पर पूरा करना इसी का एक हिस्सा है।”

कोर्ट ने त्वरित जांच की आवश्यकता पर आगे टिप्पणी करते हुए कहा:

“इसके अलावा, यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि त्वरित जांच के इस पहलू को सीआरपीसी में भी वैधानिक मान्यता मिली है, जो निश्चित रूप से जांच, सुनवाई और अपील के चरणों के लिए विस्तृत प्रक्रिया निर्धारित करने वाली व्यापक संहिता है। यह कहा जाना चाहिए कि त्वरित जांच की वैधानिक मान्यता एक पूर्व-संवैधानिक प्रावधान है।”

“भारतीय संदर्भ में उपरोक्त चर्चा से निकलने वाला अपरिहार्य निष्कर्ष यह है कि पिछले कुछ वर्षों में विधायी समझ का विकास हुआ है और आपराधिक प्रक्रिया बिना किसी समयसीमा और न्यूनतम न्यायिक हस्तक्षेप के दौर से निकलकर उत्तरोत्तर अधिक निगरानी और समय पर जांच पूरी करने की आवश्यकता को मान्यता देने की ओर बढ़ी है। यह सच हो सकता है कि सीआरपीसी में कोई सख्त समयसीमा प्रदान नहीं की गई है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि जांच उचित समय में पूरी की जानी चाहिए।”

जांच में अत्यधिक देरी होने पर अदालतों के कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने अपने पिछले फैसले से उद्धृत किया:

“आपराधिक कानून की मशीनरी के सुचारू संचालन के लिए कारणों का होना अत्यंत आवश्यक है। वे न्याय प्रणाली में निष्पक्षता, पारदर्शिता और जवाबदेही की आधारशिला हैं। यदि न्यायालय को लगता है या आरोपी आरोप लगाता है (जाहिर तौर पर सबूतों और आरोपों को साबित करने के कारणों के साथ) कि प्रथम सूचना रिपोर्ट और अंतिम चार्जशीट के बीच एक बड़ा अंतर है, तो वह जांच एजेंसी से स्पष्टीकरण मांगने और खुद को संतुष्ट करने के लिए बाध्य है।”

अनंतकाल तक चलने वाली जांच की सीमाओं को तय करते हुए पीठ ने माना:

“हालांकि यह सर्वविदित और स्वीकृत है कि जांच की प्रक्रिया में कई उतार-चढ़ाव होते हैं और इसलिए कोई सख्त समयसीमा तय करना व्यावहारिक नहीं है, साथ ही इस निर्णय के पहले हिस्से में की गई चर्चा से यह स्पष्ट रूप से स्थापित होता है कि जांच अंतहीन रूप से जारी नहीं रह सकती। आरोपी के लिए यह उम्मीद करना अनुचित नहीं है कि एक निश्चित समय के बाद उसे अपने खिलाफ लगे आरोपों के बारे में स्पष्टता मिले, जिससे उसे अपना बचाव तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिल सके। यदि किसी विशेष अपराध की जांच ऐसी अवधि तक जारी रही है जो अनुचित रूप से लंबी लगती है, वह भी बिना किसी पर्याप्त कारण के, जैसा कि इस मामले में है, तो आरोपी या शिकायतकर्ता दोनों ही जांच की स्थिति जानने के लिए या आरोपी द्वारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाए जाने पर कार्यवाही को रद्द कराने के लिए बीएनएसएस की धारा 528/सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख करने के लिए स्वतंत्र होंगे। यह स्पष्ट किया जाता है कि जांच पूरी होने में देरी केवल एक आधार के रूप में कार्य करेगी, और यदि अदालत अपने विवेक से इस आवेदन पर विचार करने का निर्णय लेती है, तो अन्य आधारों पर भी विचार करना होगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि हाईकोर्ट द्वारा दोबारा जांच के आदेश दिए जाने के बाद भी करीब एक दशक का समय बीत चुका है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि पुलिस गवाहों का पता लगाने में असमर्थ थी, तो उन्हें जांच को अंतहीन रूप से लंबित छोड़ने के बजाय जेएमएफसी के समक्ष मामले को बंद करने की रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) दाखिल करनी चाहिए थी।

दस्तावेजों के खोने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:

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“इस तरह की घटनाएं, जहां सक्रिय जांच के दौरान केस के रिकॉर्ड खो जाते हैं, उन्हें अत्यंत गंभीरता से लिया जाना चाहिए। इसके अलावा, ऐसी घटनाएं आपराधिक न्याय प्रणाली की मूल आत्मा पर प्रहार करती हैं, जिससे वास्तविक शिकायतें भी प्रभावहीन हो जाती हैं।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह निष्कर्ष निकाला कि:

“जब ऐसी लंबी जांच के मामले संवैधानिक अदालतों के संज्ञान में लाए जाते हैं, तो वे मूक दर्शक बनकर नहीं रह सकतीं।” और ऐसे असाधारण मामलों में गुजरात हाईकोर्ट को अपनी विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए हस्तक्षेप करना चाहिए था।

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने गुजरात सरकार और भिलोड़ा पुलिस स्टेशन को निर्देश दिया है कि वे आज से छह सप्ताह के भीतर अपनी जांच पूरी करें और सभी उपलब्ध साक्ष्यों (या साक्ष्यों की अनुपस्थिति) के साथ जेएमएफसी कोर्ट के समक्ष अंतिम रिपोर्ट पेश करें।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात सरकार को एक हलफनामा दाखिल कर निम्नलिखित जानकारियां देने का निर्देश दिया है:

  1. लापरवाह पुलिस अधिकारी के खिलाफ क्या विशिष्ट कार्रवाई की गई है, वह कार्यवाही वर्तमान में किस चरण में है और क्या उसे तार्किक परिणति तक पहुंचाया गया है;
  2. जेएमएफसी के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, दस्तावेजों के खोने के बाद रिकॉर्ड को दोबारा तैयार करने या गवाहों को खोजने में आ रही असमर्थता के बारे में जेएमएफसी कोर्ट को समय पर सूचित क्यों नहीं किया गया; और
  3. छह सप्ताह के भीतर जांच पूरी करने के निर्देश के पालन की क्या स्थिति है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को आगे की सुनवाई के लिए 14 जुलाई 2026 को दोपहर 2:00 बजे आंशिक रूप से सुने गए (पार्ट-हर्ड) मामले के रूप में सूचीबद्ध किया है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: साहिल अब्दुलसत्तार मंसूरी और अन्य बनाम सफिमहम्मद फकीरभाई मंसूरी और अन्य
वाद संख्या: एसएलपी (क्रिमिनल) संख्या 17479/2025
पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह
निर्णय की तिथि: 4 जून, 2026

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