बिहार के 1983 के जघन्य जमालपुर कोदई नरसंहार मामले में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपीलकर्ताओं की याचिकाओं को खारिज करते हुए उनकी उम्रकैद की सजा बरकरार रखी है। अदालत ने इस ऐतिहासिक फैसले में व्यवस्था दी कि भारतीय दंड संहिता की धारा 149 के तहत यदि किसी गैरकानूनी सभा का ‘समान उद्देश्य’ स्थापित हो जाता है, तो भीड़ का प्रत्येक सदस्य सामूहिक हिंसक कृत्यों के लिए प्रतिनिधि रूप से समान रूप से उत्तरदायी होगा। इस निर्णय का दूरगामी महत्व यह है कि यह स्पष्ट करता है कि दंगाइयों की हिंसक भीड़ का हिस्सा बनने वाले लोग घटना स्थल पर ‘सिर्फ मौजूदगी’ या ‘पूर्व-नियोजन की कमी’ का बहाना बनाकर अपने कानूनी दायित्व से बच नहीं सकते।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला होली के त्योहार के दिन 29 मार्च 1983 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट थाना क्षेत्र के जमालपुर कोदई गांव में हुई भीषण हिंसा से जुड़ा है। इसकी जड़ें पुरानी रंजिश और पंपिंग सेट के विवाद में थीं, जो तब और गहरा गई जब पीड़ित पक्ष ने खेसारी की फसल की कथित लूट से जुड़े एक पुराने आपराधिक मामले को वापस लेने से इनकार कर दिया।
घटना के दिन घातक हथियारों (जैसे लाठी, भाला, गड़ासा और फरसा) से लैस लगभग 58 लोगों की उग्र भीड़ ने चंद्रशेखर चौधरी के घर को घेर लिया। पीड़ित महंत इंद्रदेव ज्योति ने अपने परिवार को बचाने के लिए अपनी लाइसेंसशुदा बंदूक और रिवॉल्वर निकाली। तभी तत्कालीन अंचल अधिकारी (सर्कल ऑफिसर) जगन्नाथ रविदास वहां पहुंचे और उन्होंने बलपूर्वक पीड़ित से उनके हथियार छीन लिए। इसके बाद उन्होंने उन हथियारों को हिंसक भीड़ के सामने प्रदर्शित किया, जिससे हमलावरों का हौसला बढ़ गया।
इसके तुरंत बाद भीड़ ने घर में आग लगा दी। जलते घर से खेतों की ओर जान बचाकर भाग रहे लोगों को खदेड़कर बेरहमी से पीटा गया। इस बर्बर हमले में महंत इंद्रदेव ज्योति, ब्रज भूषण चौधरी, डॉ. इंद्रानंद मिश्रा, ललन उर्फ रवि भूषण चौधरी और अनिल कुमार झा की मौत हो गई, जबकि महिलाओं और बच्चों सहित कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हो गए।
पुलिस जांच के बाद निचली अदालत ने 1989 में साक्ष्यों के अभाव में 18 आरोपियों को बरी कर दिया, जबकि शेष आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। अंचल अधिकारी जगन्नाथ रविदास को उकसाने और भीड़ को बढ़ावा देने का दोषी पाया गया। पटना हाईकोर्ट ने 2017 में इस फैसले की पुष्टि की, जिसके खिलाफ दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलील दी कि अभियोजन पक्ष ने मामले को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया है और इसमें कई बेकसूर लोगों को फंसाया गया है। उन्होंने तर्क किया कि कई आरोपी वहां सिर्फ मूकदर्शक के रूप में खड़े थे और उनका मुख्य हमलावरों के साथ कोई ‘समान उद्देश्य’ नहीं था। यह भी तर्क दिया गया कि यह घटना पहले से तय नहीं थी, बल्कि अचानक उपजे विवाद का नतीजा थी, इसलिए धारा 149 के तहत सजा देना गलत है।
दूसरी ओर, बिहार राज्य के वकीलों ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के निर्णयों का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि घायल चश्मदीदों के लगातार और विस्तृत बयानों से साफ है कि सभी आरोपियों की सक्रिय भागीदारी और उनका साझा आपराधिक इरादा पूरी तरह स्थापित था।
न्यायालय का विश्लेषण और निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं के तर्कों को पूरी तरह खारिज कर दिया। जस्टिस संजय करोल ने निर्णय लिखते हुए उल्लेख किया कि घायल गवाहों के बयानों में पूरी स्पष्टता और निरंतरता है, जिसकी पुष्टि स्वतंत्र गवाहों और डॉक्टरों की मेडिकल रिपोर्ट से भी होती है।
आईपीसी की धारा 149 की व्याख्या करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एक बार जब गैरकानूनी सभा का समान उद्देश्य साबित हो जाता है, तो प्रत्येक दोषी की विशिष्ट भूमिका या व्यक्तिगत प्रहार को अलग से साबित करना आवश्यक नहीं रह जाता। न्यायालय ने कहा:
“एक बार जब गैरकानूनी सभा का समान उद्देश्य स्थापित हो जाता है, तो उसका प्रत्येक सदस्य उस समान उद्देश्य को पूरा करने में किए गए कृत्यों के लिए प्रतिनिधि रूप से उत्तरदायी बन जाता है। वर्तमान मामले के तथ्यों में आईपीसी की धारा 149 के तहत परिकल्पित दायित्व पूरी तरह लागू होता है।”
न्यायालय ने बचाव पक्ष द्वारा पेश किए गए संतोष बनाम मध्य प्रदेश राज्य, कर्नाटक राज्य बनाम चिक्काहोट्टप्पा और अन्य, असम राज्य बनाम बरगा देवानी और अन्य, तथा अनूप लाल यादव बनाम बिहार राज्य जैसे न्यायिक उदाहरणों को अप्रासंगिक बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने माना कि किसी भी प्रकार की पुरानी रंजिश या तात्कालिक विवाद इतने बड़े पैमाने पर घातक हथियारों से लैस गैरकानूनी सभा बनाने और पांच लोगों की बेरहमी से हत्या करने को न्यायसंगत नहीं ठहरा सकता।
पूर्व अंचल अधिकारी जगन्नाथ रविदास के संबंध में कोर्ट ने सहमति जताई कि उन्होंने ऐन वक्त पर पीड़ितों को निहत्था करके भीड़ को उकसाने और अपराध को आसान बनाने का काम किया था। इस जघन्य कृत्य पर क्षोभ व्यक्त करते हुए न्यायालय ने टिप्पणी की:
“इस घटना की क्रूरता, जिसमें एक ही परिवार के पांच लोगों ने अपनी जान गंवाई और महिलाओं तथा बच्चों सहित कई अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए, न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर देती है। निचली अदालतों ने बिल्कुल सही कहा है कि यह मामला किसी भी तरह की गलत सहानुभूति या नरमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता।”
न्यायालय का निर्णय और निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए पटना हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखा।
नाबालिग होने के दावों (किशोर न्याय कानून के तहत) के संबंध में, न्यायालय ने पाया कि अपीलकर्ता संख्या 21 (रामाधार राय), 34 (विद्या नंद राय) और 38 (रामानंद राय) घटना के समय नाबालिग थे। कोर्ट ने उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा का फैसला ‘किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015’ के तहत किशोर न्याय बोर्ड को सौंप दिया। आरोपी जुगत लाल राय उर्फ निर्मल राय को भी पूर्व आदेश के तहत यह लाभ दिया गया।
बाकी सभी जीवित और वयस्क दोषियों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- सभी अपीलें खारिज की जाती हैं और सजा बरकरार रखी जाती है।
- सभी जीवित वयस्क दोषियों को तत्काल संबंधित निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है ताकि वे अपनी शेष उम्रकैद की सजा पूरी कर सकें।
- इन जीवित दोषियों के जमानत बांड तत्काल रद्द किए जाते हैं।
- सभी लंबित आवेदनों का निपटारा किया जाता है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: महेंद्र राय उर्फ हरेंद्र नारायण सिंह और अन्य आदि बनाम बिहार राज्य
मामला संख्या : क्रिमिनल अपील संख्या 563-564 ऑफ़ 2020
पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह
तारीख: 26 मई, 2026

