‘घर के अंदर गोकशी लोक व्यवस्था को खतरा नहीं’, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शामली के दो युवकों पर से हटाया NSA

व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रशासनिक शक्तियों की सीमा को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बड़ा और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश के शामली जिले के दो निवासियों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA – रासुका) के तहत की गई नजरबंदी की कार्रवाई को रद्द कर दिया है।

जस्टिस राजीव मिश्रा और डॉ. अजय कुमार की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि कथित गोकशी की घटना किसी सार्वजनिक स्थल पर नहीं, बल्कि एक निजी घर की चारदीवारी के भीतर हुई थी। इसके साथ ही, इस घटना में केवल एक गोवंश शामिल था, जिससे समाज में किसी भी प्रकार की हिंसा या सार्वजनिक अशांति नहीं फैली। इस आधार पर कोर्ट ने दोनों आरोपियों—ईशम (उर्फ इसम) और समीर—को तत्काल रिहा करने का आदेश जारी किया है।

हाईकोर्ट का रुख: ‘पब्लिक ऑर्डर’ और ‘प्राइवेट एक्ट’ में अंतर

अदालत ने 26 मई को दिए अपने फैसले में एक निजी अपराध और सार्वजनिक व्यवस्था को बिगाड़ने वाले कृत्य के बीच के अंतर को रेखांकित किया। कोर्ट ने दोनों याचियों द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि किसी बंद घर के भीतर होने वाला कृत्य ‘पब्लिक ऑर्डर’ (सार्वजनिक व्यवस्था) के लिए खतरा नहीं माना जा सकता, जिसके लिए रासुका जैसी सख्त धाराएं लागू की जाएं।

खंडपीठ ने अपने आदेश में कहा, “तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करने के बाद, हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत पारित किया गया हिरासत आदेश न तो कानूनन सही है और न ही तथ्यों के आधार पर। इसलिए इसे खारिज किया जाता है।”

अप्रैल 2025 की छापेमारी से शुरू हुआ था मामला

इस पूरे मामले की शुरुआत 23 अप्रैल 2025 को हुई थी, जब शामली पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि एक स्थानीय घर में गोकशी की जा रही है।

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पुलिस ने मौके पर छापेमारी कर एक कटा हुआ सिर, पैर, खाल और मांस बरामद किया था। बाद में पशु चिकित्सक द्वारा की गई वैज्ञानिक जांच में पुष्टि हुई कि बरामद किया गया मांस गोमांस था। इस छापेमारी के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ उत्तर प्रदेश गो-वध निवारण अधिनियम, 1955 की धारा 3, 5A और 8 के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर दोनों को जेल भेज दिया था।

कैसे लगा NSA? स्थानीय पुलिस की रिपोर्ट और DM का फैसला

जब दोनों आरोपी जेल में बंद थे, तब स्थानीय थाना प्रभारी ने पुलिस अधीक्षक (SP) को एक रिपोर्ट भेजी। इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि इस घटना के कारण इलाके में पांच से छह दिनों तक तनाव का माहौल बना रहा। स्थानीय प्रशासन का कहना था कि इस कृत्य से हिंदू समुदाय की भावनाएं आहत हुईं, जिससे आम जनता में भारी असंतोष और बेचैनी फैल गई और जनजीवन प्रभावित हुआ।

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इस रिपोर्ट को आधार बनाते हुए, शामली के जिलाधिकारी (DM) ने 7 जुलाई 2025 को एनएसए (NSA) की धारा 3(2) के तहत विशेष आदेश जारी कर दोनों आरोपियों को 12 महीने के लिए हिरासत में रखने का निर्देश दिया था।

अब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस प्रशासनिक आदेश को पूरी तरह से अवैध और अतार्किक पाते हुए खारिज कर दिया है, जिससे दोनों आरोपियों की तुरंत रिहाई का रास्ता साफ हो गया है।

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