दिग्गज टेक कंपनी गूगल (Google) को दिल्ली हाईकोर्ट से एक बड़ा कानूनी झटका लगा है। अदालत ने देश के नामी सैनिटरीवेयर ब्रांड हिंडवेयर (Hindware Ltd) के ट्रेडमार्क को विज्ञापन कीवर्ड (Keywords) के रूप में उसकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों को बेचने के मामले में गूगल पर 30 लाख रुपये का हर्जाना लगाया है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि गूगल एडवर्ड्स (Google AdWords) कार्यक्रम के जरिए किसी स्थापित ब्रांड के नाम को प्रतिस्पर्धियों को बेचना ट्रेडमार्क अधिनियम के तहत “अनुचित लाभ” उठाने की श्रेणी में आता है। इसके लिए गूगल को सूचना प्रौद्योगिकी (IT) कानून के तहत मिलने वाली किसी भी तरह की कानूनी सुरक्षा (Safe Harbour) नहीं दी जा सकती।
यह फैसला जस्टिस मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने हिंडवेयर लिमिटेड द्वारा दायर दो अलग-अलग मुकदमों की सुनवाई के दौरान सुनाया। कोर्ट ने गूगल एलएलसी (Google LLC) और गूगल इंडिया (Google India) को तत्काल प्रभाव से ‘Hindware’, ‘Hindware Sanitaryware’, ‘Hindware Sanitary’, या ‘Hindware Sanitaryware India’ जैसे रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क का उपयोग विज्ञापन कीवर्ड के रूप में करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है।
न्यायाधीश ने दोनों मुकदमों में 15-15 लाख रुपये (कुल 30 लाख रुपये) का सांकेतिक हर्जाना मंजूर किया है, जिसका भुगतान गूगल को आठ सप्ताह के भीतर करना होगा। इसके अलावा, हिंडवेयर मुकदमेबाजी का वास्तविक खर्च भी वसूलने की हकदार होगी, जिसके लिए कोर्ट ने कंपनी को दो महीने के भीतर अपनी ‘बिल ऑफ कॉस्ट’ (खर्चों का विवरण) जमा करने का निर्देश दिया है।
ग्राहकों को ‘हाईजैक’ करने का व्यावसायिक खेल
इस पूरे मामले ने यह उजागर किया है कि कैसे गूगल का बेहद मुनाफेदार एडवर्ड्स सिस्टम राष्ट्रीय ट्रेडमार्क कानूनों के आड़े आता है। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि गूगल का एडवर्ड्स कार्यक्रम विशुद्ध रूप से एक व्यावसायिक उपक्रम है। इसका मुख्य उद्देश्य सर्च इंजन पर आने वाले ट्रैफिक का इस्तेमाल करके प्रायोजित विज्ञापनों (Sponsored Links) को दिखाना और विज्ञापनदाताओं से मोटी रकम वसूलना है।
जब कोई यूजर गूगल पर ‘हिंडवेयर’ ब्रांड की खोज करता है, तो गूगल के इस सिस्टम के चलते हिंडवेयर के प्रतिद्वंदियों के विज्ञापन सबसे ऊपर दिखाई देने लगते हैं। अदालत ने इस प्रक्रिया को “अनुचित व्यापार व्यवहार” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि गूगल ने हिंडवेयर के नाम और बाजार में उसकी साख का सीधा फायदा उठाकर अपने खुद के विज्ञापन राजस्व को बढ़ाने का प्रयास किया। सबसे गंभीर बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया के लिए गूगल ने कभी भी हिंडवेयर से कोई पूर्व अनुमति या सहमति नहीं ली थी।
आईटी कानून की धारा 79 के तहत नहीं मिलेगी सुरक्षा
इस कानूनी लड़ाई में गूगल का सबसे बड़ा बचाव यह था कि वह केवल एक डिजिटल मध्यस्थ (Intermediary) है। गूगल ने आईटी अधिनियम की धारा 79(1) के तहत ‘सेफ हार्बर’ (सुरक्षित ठिकाना) की मांग की थी, जो डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को उनके प्लेटफॉर्म पर मौजूद किसी तीसरे पक्ष (Third-party) की गतिविधि या कंटेंट की कानूनी जिम्मेदारी से बचाता है।
हालांकि, दिल्ली हाईकोर्ट ने गूगल की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि कीवर्ड्स की नीलामी करना और उन्हें ब्रांड्स के सीधे प्रतिस्पर्धियों को बेचना कोई निष्क्रिय (Passive) सेवा नहीं है। यह सक्रिय रूप से किया जाने वाला व्यावसायिक प्रचार (Active Commercial Promotion) है, इसलिए इस मामले में गूगल को किसी भी सुरक्षा का लाभ नहीं मिल सकता।
मुनाफे के लिए बदली गई थी खुद की पॉलिसी
फैसले के दौरान अदालत ने गूगल के इतिहास का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने नोट किया कि साल 2009 तक भारत में गूगल की खुद की नीति किसी भी ट्रेडमार्क को कीवर्ड के रूप में उपयोग करने की अनुमति नहीं देती थी। लेकिन बाद में गूगल ने जानबूझकर अपनी व्यावसायिक नीतियों में बदलाव किया ताकि ट्रेडमार्क वाले शब्दों के जरिए विज्ञापन बाजार से अधिकतम व्यावसायिक लाभ कमाया जा सके।

