कर्मचारी अधिकारों और प्रक्रियात्मक न्याय को लेकर पटना हाई कोर्ट ने एक बड़ा और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने करीब 13 साल पहले नौकरी से बर्खास्त की गई एक महिला जूनियर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर को तुरंत सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने उन्हें नौकरी से बाहर रहने की इस लंबी अवधि (13 वर्ष) के लिए 50 फीसदी बकाया वेतन (back wages) और अन्य भत्ते देने का भी निर्देश दिया है।
चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि 13 साल के लंबे अंतराल के बाद किसी कर्मचारी के खिलाफ नए सिरे से विभागीय जांच शुरू करना “क्रूर” होगा और यह उसे व्यावहारिक न्याय से पूरी तरह वंचित कर देगा।
2011 में हुई थी नियुक्ति, 2013 में मिली बर्खास्तगी
यह पूरा विवाद अभिनिता नाम की महिला इंजीनियर से जुड़ा है, जिन्होंने 10 सितंबर 2011 को बिहार राज्य विद्युत बोर्ड (अब बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कंपनी लिमिटेड) में जूनियर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के रूप में अपना कार्यभार संभाला था। उनकी पोस्टिंग पटना विद्युत आपूर्ति उपक्रम (PESU) कंट्रोल रूम में की गई थी। हालांकि, एक साल के भीतर ही अक्टूबर 2012 में उन पर ड्यूटी से बिना सूचना के गायब रहने और अनुशासनहीनता के आरोप लगाते हुए कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया।
इसके बाद प्रशासनिक आधार पर उनका तबादला उत्तर बिहार पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड में कर दिया गया। बिजली कंपनी का आरोप था कि उन्होंने नए स्थान पर कार्यभार नहीं संभाला, जिसे उनके खिलाफ एक और बड़ी अनुशासनहीनता माना गया। आखिरकार, 14 मार्च 2013 को उन्हें निलंबित कर दिया गया और 26 जून 2013 को उनके बर्खास्तगी के आदेश पर मुहर लगा दी गई। दिसंबर 2014 में अपीलीय प्राधिकारी ने भी उनकी याचिका खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।
क्यों अमान्य घोषित हुई बर्खास्तगी की कार्रवाई?
हाई कोर्ट ने मामले की समीक्षा करते हुए पाया कि इस विभागीय कार्रवाई की शुरुआत में ही एक बड़ी कानूनी और प्रक्रियात्मक खामी थी। साल 2012 में अभिनिता के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने वाले अधिकारी ‘विशेष कार्य अधिकारी (प्रशासन)’ थे, जिनके पास ऐसा करने का कानूनी अधिकार ही नहीं था। कोर्ट ने उन्हें एक ‘अक्षम प्राधिकारी’ माना, जिसके पास इस मामले में क्षेत्राधिकार नहीं था।
आमतौर पर प्रशासनिक नियमों के तहत यदि कोई विभागीय जांच प्रक्रियात्मक खामी के कारण रद्द होती है, तो मामले को दोबारा सक्षम प्राधिकारी के पास भेजा जाता है ताकि वह नए सिरे से जांच कर सके। लेकिन इस मामले में समय के लंबे अंतराल को देखते हुए खंडपीठ ने एक अलग रास्ता चुना।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“इतने लंबे समय (13 वर्ष) के बाद दोबारा सक्षम प्राधिकारी के पास जांच के लिए मामला भेजना याचिकाकर्ता के प्रति अनुचित होगा और इससे उन्हें मिलने वाली व्यावहारिक राहत पूरी तरह खत्म हो जाएगी।”
वेतन और राहत के बीच कोर्ट ने बिठाया संतुलन
अदालत ने महिला इंजीनियर की बहाली का आदेश तो दिया, लेकिन उन्हें पूरा बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया। इससे पहले जून 2025 में हाई कोर्ट की एक एकल पीठ (single-judge bench) ने अभिनिता को पूर्ण वेतन और सभी सेवा लाभों के साथ बहाल करने का निर्देश दिया था।
इस फैसले में संशोधन करते हुए खंडपीठ ने साफ किया कि नौकरी पर बहाली और बकाया वेतन पाना दो अलग-अलग राहतें हैं। बकाया वेतन का निर्धारण मामले की परिस्थितियों और दोनों पक्षों के हितों में संतुलन बनाकर किया जाना चाहिए। कोर्ट ने माना कि चूंकि नियोक्ता (बिजली कंपनी) द्वारा की गई जांच प्रक्रियात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण थी, इसलिए न्याय का तकाजा यही कहता है कि महिला इंजीनियर को उनका 50 प्रतिशत वेतन और भत्ते दिए जाएं।
अदालत में दोनों पक्षों की दलीलें
सुनवाई के दौरान कोर्ट रूम में दोनों पक्षों के बीच तीखी कानूनी बहस देखने को मिली:
- बिजली कंपनी का तर्क: बिजली कंपनी का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील वाई. वी. गिरी ने दलील दी कि चूंकि बर्खास्तगी प्रक्रियात्मक खामी के कारण रद्द हुई है, इसलिए मामले को फिर से जांच के लिए भेजा जाना चाहिए था। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि याचिकाकर्ता ने जांच शुरू करने वाले अधिकारी के अधिकार क्षेत्र को 14 साल बाद चुनौती दी है। इसके अलावा, उन्होंने दलील दी कि महिला इंजीनियर ने यह साबित नहीं किया कि वह इन 13 वर्षों में कहीं और काम नहीं कर रही थीं, इसलिए वे वित्तीय लाभों की हकदार नहीं हैं।
- इंजीनियर का पक्ष: महिला इंजीनियर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील उमेश प्रसाद सिंह ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल के खिलाफ की गई पूरी कार्रवाई दुर्भावनापूर्ण थी, जिसने उन्हें लंबे समय तक मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया। उन्होंने कहा कि चूंकि जांच शुरू करने का मूल आदेश ही अवैध था, इसलिए इसके बाद जारी किए गए बर्खास्तगी और अपील खारिज होने के आदेशों की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं है।
पटना हाई कोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक खामियों को सुधारने और एक दशक से अधिक समय से न्याय की उम्मीद लगाए बैठी महिला कर्मचारी को राहत देने के बीच एक बेहतरीन कानूनी संतुलन पेश करता है।

